केरल में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) लगभग पूरा हो चुका है। अब बीएलओ को सिर्फ कुछ सुनवाई नोटिस बांटने हैं, वो भी बहुत कम संख्या में. इसी बीच तिरुवनंतपुरम से मिली खबर के मुताबिक, 4 जनवरी को एक मीडिया हाउस ने रिपोर्ट छापी थी कि केरल में एक युवा महिला बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) पर इतना कार्यभार था कि उसकी जान चली गई. लेकिन केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने 5 जनवरी को साफ-साफ कहा कि ये खबर गलत और भ्रामक है. असल तथ्य कुछ और ही हैं.
मतदाताओं का दबाव कम
मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार, केरल में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है. अब बीएलओ के पास केवल सुनवाई नोटिस वितरित करने का कार्य शेष है, जो औसतन प्रति बूथ बहुत ही कम संख्या में मतदाताओं से जुड़ा होता है. साथ ही राज्य में मतदान केंद्रों का युक्तिकरण पूरा कर लिया गया है, जिसके तहत 5,003 नए मतदान केंद्र बनाए गए हैं. इससे मतदाताओं का दबाव कम हुआ है और प्रति बूथ मतदाताओं की संख्या 1,200 से कम रखी गई है. इसके अलावा, नए बीएलओ की नियुक्ति भी की गई है ताकि कार्यभार और कम हो सके.
बीएलओ को अन्य सभी सरकारी कार्यों से पूरी तरह मुक्त रखा गया है
निर्वाचन आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान बीएलओ को अन्य सभी सरकारी कार्यों से पूरी तरह मुक्त रखा गया है. बीएलओ की सुविधा को ध्यान में रखते हुए आयोग ने समय-सीमा में भी छूट दी, जिससे वे अपना कार्य अधिक सहजता से कर सकें. मानसिक तनाव कम करने के लिए ‘जॉयथॉन’ जैसे कार्यक्रम आयोजित किए गए और उत्कृष्ट कार्य करने वाले बीएलओ को प्रोत्साहित करने के लिए ‘बीएलओ ऑफ द डे’ जैसे सोशल मीडिया अभियान भी शुरू किए गए.
अतिरिक्त सहायता व्यवस्था की गई है
बीएलओ चुनाव प्रक्रिया की जमीनी कड़ी होते हैं, जो सीधे जनता से संपर्क करते हैं और लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं. उनके कार्यभार को देखते हुए अतिरिक्त सहायता व्यवस्था भी की गई. राज्यभर में जिला प्रशासन ने एनसीसी, एनएसएस और एमएसडब्ल्यू के छात्र स्वयंसेवकों को तैनात किया, जिन्होंने तकनीकी कार्यों और डाटा एंट्री में मदद की. कई जिलों में स्वयंसेवकों ने सप्ताहांत में 5 से 6 घंटे देकर डिजिटाइजेशन का काम आसान बनाया.
बीएलओ को बार-बार घर-घर जाने की जरूरत कम
डिजिटाइजेशन के लिए सामुदायिक मॉडल भी अपनाया गया. तेज इंटरनेट वाले स्थानों पर केंद्रीकृत कैंप लगाए गए, जहां बीएलओ व्यक्तिगत मोबाइल फोन से डाटा अपलोड करने के बजाय तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से सामूहिक रूप से फॉर्म अपलोड कर सके. इसके अलावा, बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) की नियुक्ति के नियमों में भी ढील दी गई ताकि राजनीतिक दल सहायता केंद्र बना सकें और फॉर्म सही तरीके से भरे जा सकें. इससे बीएलओ को बार-बार घर-घर जाने की जरूरत कम हुई.
वार्षिक मानदेय बढ़ाकर 12,000 रुपए कर दिया है
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने यह भी कहा कि स्कूल शिक्षकों को बीएलओ नियुक्त करना कोई प्राथमिक नीति नहीं, बल्कि प्रशासनिक आवश्यकता है. जब पर्याप्त संख्या में अन्य श्रेणी-तीन सरकारी कर्मचारी उपलब्ध नहीं होते, तभी शिक्षकों को यह जिम्मेदारी दी जाती है. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 13बी(2) के तहत बीएलओ का कार्य एक संवैधानिक दायित्व है. इसे मान्यता देते हुए निर्वाचन आयोग ने हाल ही में बीएलओ का वार्षिक मानदेय बढ़ाकर 12,000 रुपए कर दिया है.
बीएलओ अनीश जॉर्ज की आत्महत्या
कन्नूर में बीएलओ अनीश जॉर्ज की आत्महत्या को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की गई है. कन्नूर जिला कलेक्टर की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के अनुसार, उनकी मृत्यु को सीधे तौर पर कार्यदबाव से जोड़ने का कोई प्रमाण नहीं मिला है. रिपोर्ट में बताया गया है कि अनीश ने 1,065 में से 825 फॉर्म पहले ही वितरित कर दिए थे और उन्होंने अतिरिक्त सहायता के प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया था.
भ्रामक सूचनाएं न फैलाएं
कोल्लम जिले के थलावूर गांव से जुड़ी खबर की जांच के बाद यह भी सामने आया है कि पथनापुरम विधानसभा क्षेत्र के किसी भी गांव से किसी बीएलओ ने कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई है.
निर्वाचन आयोग ने कहा कि बीएलओ द्वारा हर घर जाने की प्रक्रिया का उद्देश्य बुजुर्गों और असहाय मतदाताओं तक पंजीकरण सुविधा पहुंचाना है ताकि उन्हें सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें. आयोग ने मीडिया से अपील की है कि वे भ्रामक सूचनाएं न फैलाएं. (इनपुट आईएएनएस से)
