पूर्व आर्मी चीफ जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब के कथित अंश में दावा किया जा रहा है कि उन्होंने 2020 में लद्दाख में चीनी टैंकरों को देख रक्षा मंत्री समेत केंद्रीय नेतृत्व से पूछा था. राहुल गांधी दावा कर रहे हैं कि उनसे कहा गया, ‘जो उचित समझो, वही करो.’ संसद के गेट पर विपक्ष के सांसद यही नारा लगाते रहे. क्या आप जानते हैं एक और आर्मी चीफ ने सीधे तत्कालीन प्रधानमंत्री से पूछा था और तब उन्हें कहा गया था, ‘आप चलिए, हम बताएंगे.’ हां, भारत की संसद पर 11 दिसंबर 2001 को पाकिस्तानी आतंकियों के हमले के बाद भारत सरकार ने ऑपरेशन पराक्रम की अनुमति दी. यह शांतिकाल में पाकिस्तान से लगती सीमा पर भारतीय सशस्त्रबलों की सबसे बड़ी तैनाती थी.
सेना की जबर्दस्त तैनाती के दौरान कई बैठकें हो रही थीं. एक मीटिंग में तत्कालीन आर्मी चीफ जनरल एस पद्मनाभन (अब रिटायर्ड) ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से कहा कि आपके आदेश क्या हैं? उस समय मौजूद एक अधिकारी के हवाले से यह जानकारी पब्लिक डोमेन में है कि पीएम ने कहा, ‘आप चलिए, हम बताएंगे.’ हालांकि सीमा पार से आतंकियों की खेप भेजने के लिए पाकिस्तान को सबक सिखाने का आदेश कभी नहीं आया. इसके कई कारण थे जिसमें अमेरिका का प्रेशर और भारत – पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध की भी आशंका थी जिसने संयम बरतने पर मजबूर किया. पाकिस्तान से लगती सीमा पर करीब 10 महीने तक सेना का जमावड़ा रहा. उसके बाद पलटन को बैरक में बुला लिया गया.
बाद में ऑपरेशन पराक्रम (Operation Parakram: The War Unfinished) पर रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल वीके सूद ने किताब लिखी. उसके हवाले से जून 2003 में एक मैगजीन में काफी कुछ प्रकाशित हुआ. कहा गया कि ऑपरेशन पराक्रम जब खत्म हुआ (16 अक्टूबर) तब तक इसका उलटा असर होने लगा था. भारत की मिलिट्री तैयारी को चुनौती देने के लिए मुशर्रफ का कद उनकी सेना में बढ़ गया था और भारत – पाकिस्तान के बीच अमेरिकी की भूमिका कुछ ज्यादा ही देखी जाने लगी.
किताब के लेखकों का मानना था कि 9/11 के बाद भारत के पास दो ऑप्शन थे – अफगानिस्तान में अमेरिकी उदाहरण को फॉलो कर पाकिस्तान पर हमला करना या उससे बात करना. अमेरिका पर निर्भर रहने से नतीजा यह हुआ कि अमेरिका का फेवर पाने के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच मुकाबला शुरू हो गया.
वैसे भी बॉर्डर पर भारत की ओर से यह एक असामान्य जमावड़ा था. इससे पहले कभी भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध का ऐलान नहीं किया गया था. भारतीय सेना प्रमुख जनरल एस. पद्मनाभन ने 11 जनवरी 2002 को मीडिया में घोषणा की थी कि युद्ध के लिए मोबिलाइजेशन पूरा हो गया है और सशस्त्र बल अब केंद्रीय नेतृत्व के आदेश का इंतजार कर रहे हैं. इससे पहले कभी सेना 10 लंबे महीनों तक ऐसे नहीं रही थी. इससे पहले कभी किसी मोबिलाइजेशन पर खुलकर बहस नहीं हुई थी – क्या युद्ध के अलावा कोई और मकसद भी था?
इससे पहले कभी किसी सेना प्रमुख (चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के चेयरमैन भी) ने ऑपरेशन के आधिकारिक टर्मिनेशन पर यह नहीं कहा था कि जब भी सेना को बुलाने की जरूरत हो तो कन्फ्यूजन से बचने के लिए उसकी भूमिका साफ तौर पर तय की जानी चाहिए. सवाल उठता है कि इस कन्फ्यूजन के लिए जिम्मेदार कौन था? किताब के को-ऑथर पूर्व वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ हैं. उन्हें काफी कुछ पता है. किताब से पता चलता है कि 18 दिसंबर 2001 को क्या हुआ था.
‘सेना के भरोसेमंद सूत्रों ने बताया था कि प्रधानमंत्री ने तीनों सेना प्रमुखों को बुलाया और उनसे पाकिस्तान के साथ युद्ध की तैयारी करने को कहा. जब जनरल पद्मनाभन ने पूछा कि सरकार युद्ध से क्या उम्मीद करती है तो कहा जाता है कि वाजपेयी ने कहा- वह बाद में बताएंगे. ऑपरेशन पराक्रम की शुरुआत कुछ इस तरह हुई जिसमें न तो युद्ध के राजनीतिक लक्ष्य तय किए गए और न ही सैन्य नेतृत्व ने उसे जानने के लिए ज्यादा जोर दिया. वैसे यह अविश्वसनीय लगता है लेकिन इस पर सैन्य नेतृत्व इससे नाखुश नहीं था.’
‘शायद ऑपरेशन पराक्रम की नाकामी उसकी शुरुआत में ही थी. यह जानबूझकर सोचा-समझा कदम नहीं था बल्कि 13 दिसंबर 2001 को भारतीय संसद पर हुए आतंकवादी हमले पर एक जल्दबाजी में लिया गया रिएक्शन था. सरकार भावनाओं में बह गई क्योंकि देशवासियों का प्रेशर था कि भारत गंभीर है और कुछ बड़ा करने वाला है.’
आरएस यादव की 2013 में प्रकाशित किताब ‘भारत की विदेश नीति’ में लिखा है कि 11 सितंबर 2001 को अमेरिका स्थित विश्व व्यापार केंद्र पर हुए हमलों ने सारे विश्व में आतंकवाद के खतरे को फैलाने के साथ-साथ भारत के निकट पड़ोसी के घटनाक्रम को भी महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया. अमेरिका ने तालिबान की समाप्ति के लिए अफगानिस्तान पर हमला कर दिया. इस हमले के कारण जहां एक ओर पाकिस्तान में कट्टरवाद फिर पनपने लगा वहीं पाकिस्तान का अमेरिका के लिए महत्व बढ़ गया. इससे भारत में भी आतंकवादी गतिविधियों को बल मिला. 13 दिसम्बर 2001 को भारतीय संसद पर पाकिस्तान के दो आतंकवादी संगठनों लश्कर-ए-तैयबा एवं जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने हमला किया.
इस हमले की गंभीरता को देखते हुए भारतीय प्रधानमंत्री वाजपेयी ने ‘आर-पार की लड़ाई’ लड़ने की बात कही. गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी इसे ‘भारत के सम्पूर्ण राजनीतिक नेतृत्व को समाप्त करने’ का प्रयास कहा. इस हमले के बाद सर्वप्रथम भारत ने गैर-सैनिक विकल्पों का प्रयोग किया जिसमें प्रमुख थे रेल और बस सेवा बंद करना, भारतीय उच्चायुक्त को वापस बुलाना, भारतीय उच्चायोग में संख्या आधा करना, अंतरराष्ट्रीय वायु मार्ग बंद करना आदि. नियंत्रण रेखा पर बारूदी सुरंगें बिछाना शुरू किया गया जिससे अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर युद्ध की तैयारी की जा सके. एयरफोर्स को अलर्ट कर दिया गया. नौसेना की भी तैनाती को मंजूरी दे दी गई. इस प्रकार भारत की प्रथम प्रक्रिया के अंतर्गत पाकिस्तान स्थित आतंकवादी ठिकानों/प्रशिक्षण शिविरों पर सीधा आक्रमण करना था.
बाद में 18 दिसम्बर 2001 के संसद में अपने भाषण में गृहमंत्री आडवाणी का रुख नरम प्रतीत हुआ. भारत ने दिसम्बर 2001 में सीमा पर तैनाती के साथ ‘ऑपरेशन पराक्रम’ की शुरूआत की. यह ऑपरेशन भारत की ओर से पाकिस्तान को सबक सिखाने का एक फैसला था. शुरू में सीमापार आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों पर आक्रमण का विचार था, परंतु विशेषज्ञों की राय में न तो यह लाभप्रद था और न ही भारतीय सेना इसमें सक्षम थी. दूसरा विकल्प पाकिस्तान से सीधा युद्ध था वह भी इस क्षेत्र की सामरिक स्थिति के साथ निकट में ही अमेरिकी फौजों की तैनाती को देखकर सम्भव नहीं प्रतीत हुआ. शायद इसी कारण से दो बार युद्ध करने की तारीखें (5-6 जनवरी तथा 15 जून, 2000) निश्चित करने के बाद भी भारत ने युद्ध नहीं किया. यह कार्यक्रम एक ‘राजनीतिक राजनयिक’ कार्यवाही अधिक था जिससे पाकिस्तान की सरकार पर दबाव बढ़ाने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा भी इस ओर कदम उठाने को स्वीकार करना था.
जहां तक इस कार्यक्रम के प्रभाव का प्रश्न था पाकिस्तान पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा. शायद इसीलिए पाकिस्तान ने मई 2002 में चार दिनों में तीन प्रक्षेपास्त्रों का परीक्षण किया. अमेरिका द्वारा जैश-ए-मोहम्मद एवं लश्कर-ए-तोयबा पर प्रतिबन्ध लगाने के बाद पाकिस्तान ने लश्कर-ए-तैयबा की सम्पत्ति को जब्त कर लिया (24 दिसम्बर, 2001) और जैश-ए-मोहम्मद के मुखिया को कैद कर लिया (25 दिसम्बर, 2001). संसाधनों पर बढ़ते खर्च को देखते हुए कुछ फौजों को भी सीमा से बुलाना प्रारम्भ कर दिया. भारत को भी इस पूरे प्रकरण से अच्छे परिणाम प्राप्त नहीं हुए. अन्ततः 16 अक्टूबर को फौजों की वापसी की घोषणा कर दी गई. रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज की 20 अक्टूबर, 2002 में संसद में घोषणा के आधार पर भारत को सेना पर 8000 करोड़ तथा इसके अतिरिक्त सामान्य नागरिकों को मुआवजा देने पर 300 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े तथा 10 महीने चले इस अभियान में 387 लोगों को जानें गंवानी पड़ी. इसके साथ-साथ बहुत सारे उपकरणों को भी खुले में रखने से काफी नुकसान हुआ. इस प्रकार भारत का ऑपरेशन पराक्रम बिना कोई परिणाम प्राप्त किए विफल हो गया.
