यह मामला मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत दिए जाने वाले तलाक-ए-हसन से जुड़ा है. याचिका दायर करने वाली महिला ने इस प्रक्रिया को चुनौती दी है. साथ ही कहा है कि इससे महिलाओं को सुरक्षा और भरण-पोषण की गारंटी नहीं मिलती है. सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे पूर्व जज की निगरानी में सुलह की प्रक्रिया के लिए भेजा है.
क्या है पूरा मामला
साल 2022 में इस मामले की शुरुआत हुई थी. महिला बेनजीर हीना के पति, जो पेशे से वकील हैं उन्होंने एक महीने के अंतर पर तीन बार तलाक कहकर तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया अपनाई. बाद में उन्होंने दूसरी शादी भी कर ली थी. बेनजीर हीना ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर तलाक-ए-हसन की वैधता पर सवाल उठाया था. उनका कहना है कि यह तरीका महिलाओं को असुरक्षित छोड़ देता है. कारण ये कि इसमें भरण-पोषण का साफ प्रावधान नहीं है. उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें तलाकनामा सीधे पति से नहीं बल्कि उनके वकील के जरिए मिला था. हीना ने कोर्ट को बताया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत उन्हें वैध तलाकनामा नहीं मिला है. इसलिए वह दोबारा शादी भी नहीं कर सकतीं हैं.
अदालत में क्या दलीलें दी गईं
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है. महिला की ओर से वरिष्ठ वकील रिजवान अहमद पेश हुए हैं, जबकि पति की तरफ से एमआर शमशाद ने पक्ष रखा है. पति के वकील का कहना था कि तलाक पूरी तरह वैध तरीके से दिया गया है. वहीं महिला के वकील ने कहा कि दूसरी बार तलाक की प्रक्रिया सही नहीं थी और इसे मान्य नहीं माना जा सकता है. दोनों पक्षों ने शरीयत और मुस्लिम पर्सनल लॉ की अलग-अलग व्याख्या पेश की है.
कोर्ट ने मध्यस्थता में भेजा
अदालत ने कहा कि वैवाहिक विवादों को आपसी बातचीत से सुलझाने की कोशिश होनी चाहिए. साथ ही तलाक-ए-हसन की वैधता जैसे बड़े सवाल पर भी विचार जरूरी है. इसी को देखते हुए कोर्ट ने मामले को पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस कुरियन जोसेफ के पास मध्यस्थता के लिए भेज दिया है. जस्टिस जोसेफ वही जज हैं जो 2017 में शायरा बानो मामले में पांच जजों की पीठ का हिस्सा थे. जिसने इंस्टेंट ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक करार दिया था.
एक और याचिका पर सख्ती
इसी मुद्दे से जुड़ी एक दूसरी याचिका दिल्ली की आसमा नाम की महिला ने दायर की है. उन्होंने भी तलाक-ए-हसन की वैधता को चुनौती दी है. कोर्ट ने पाया कि उनके पति मोहम्मद अंसार ने अदालत के नोटिस का जवाब नहीं दिया. इस पर सख्त रुख अपनाते हुए अदालत ने करावल नगर थाने के एसएचओ को आदेश दिया कि अगली सुनवाई पर अंसार को पेश किया जाए.
कोर्ट ने क्या साफ किया
सुनवाई के दौरान पति के वकील ने अनुरोध किया कि अदालत के आदेश से यह संदेश न जाए कि तलाक-ए-हसन अवैध है. इस पर पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि उसने अभी इस प्रक्रिया की वैधता पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है. फिलहाल आदेश सिर्फ इस उद्देश्य से दिया गया है कि दोनों पक्ष आपसी बातचीत से समाधान तलाश सकें.
क्यों अहम है यह मामला
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें तलाक-ए-हसन जैसे पारंपरिक तरीके की कानूनी स्थिति पर सवाल उठे हैं. साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि महिलाओं के अधिकार और भरण-पोषण जैसे मुद्दों को किस तरह सुरक्षित किया जाएगा.
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