Gaza Board of Peace: गाजा संकट के बीच प्रस्तावित गाजा बोर्ड ऑफ पीस में भारत को शामिल होने का न्योता मिलने को भारत के लिए एक अहम कूटनीतिक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और मानवीय संकट के बीच अब ये सवाल उठ रहा है कि भारत के लिए गाजा बोर्ड ऑफ पीस का न्योता एक अवसर है या फिर एक ऐसा जाल जो उसकी संतुलित विदेश नीति को चुनौती दे सकता है. आइए समझते है…
अंतरराष्ट्रीय जानकारों की माने तो यदि भारत गाजा बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होता है तो उसका किरदार मुख्य रूप से एक मध्यस्थ का हो सकता है. भारत काफी लंबे समय से इजरायल और फिलिस्तीन दोनों के साथ सवाद बनाए रखने वाला देश रहा है. ऐसे में भारत से अपेक्षा की जा सकती है कि वह संघर्षविराम, मानवीय सहायता, आपूर्ति, पुनर्निर्माण की रूपरेखा और राजनीतिक संवाद को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाए. इसके अलावा, भारत संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों के अपने अनुभव के आधार पर ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में भी अपना योगदान दे सकता है.

भारत के सामने क्या-क्या होंगी चुनौतियां
अंतरराष्ट्रीय जानकारों की माने तो भारत की ये भूमिका उतनी भी आसान नहीं होगी. बोर्ड में शामिल होने का मतलब होगा नियमित कूटनीतिक सक्रियता, पक्षों के बीच संतुलन साधना और संभवतः कुछ संवेदनशील मुद्दों पर स्पष्ट रुख अपनाना. यह भारत को उन बहुपक्षीय निर्णयों से भी जोड़ सकता है जिनके परिणाम क्षेत्रीय राजनीति पर दूरगामी असर डालें. और यहीं से भारत के लिए जोखिम का पहलू उभरता है.
दुनियाभर में भारत की विदेश नीति की एक खास पहचान यह रही है कि वह कई जटिल और वैश्विक मुद्दों में रणनीतिक दूरी बनाए रखता है. चाहे वह यूक्रेन-रूस युद्ध हो या पश्चिम एशिया के आंतरिक टकराव. गाजा बोर्ड ऑफ पीस में सक्रिय भागीदारी भारत की विदेश नीति कि इस पहचान से आंशिक रूप से अलग कदम मानी जा सकती है. अगर भरत किसी एक पक्ष के ज्यादा करीब दिखता है, तो इससे उसके इजरायल के साथ रणनीतिक रिश्तों या अरब देशों के साथ ऊर्जा और श्रमिक सहयोग पर असर पड़ सकता है. साथ ही, घरेलू स्तर पर भी इस मुद्दे पर विपक्ष राजनीति कर सकता है और सामाजिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आ सकती हैं. फिर भी समर्थकों का मानना है कि यह भारत के लिए एक कूटनीतिक अवसर है जहां वह खुद को केवल अलग रहने वाले देश के बजाय समाधान में योगदान देने वाले वैश्विक खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर सकता है. सवाल यही है कि क्या भारत इस संतुलन को साध पाएगा या फिर यह न्योता एक जटिल कूटनीतिक परीक्षा साबित होगा.
बोर्ड में शामिल होने के लिए कई देशों ने भरी हामी
इस बीच आपको बता दें कि अमेरिक ने कई देशों को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रस्तावित बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का निमंत्रण भेजा है. इन आमंत्रित देशों में से हंगरी और वियतनाम ने आधिकारिक तौर पर इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है. हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन, जो यूरोप में ट्रम्प के सबसे मजबूत समर्थकों में गिने जाते हैं ने बोर्ड में शामिल होने की पुष्टि की है. हंगरी के विदेश मंत्री पीटर सिज्जार्टो ने राज्य रेडियो को बताया कि उनका देश इस पहल का हिस्सा बनेगा. इसी तरह, वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव तो लैम ने भी निमंत्रण स्वीकार कर लिया है यह जानकारी विदेश मंत्रालय के एक बयान में दी गई.
इसी तरह, ऑस्ट्रेलिया को भी आमंत्रित किया गया है. ऑस्ट्रेलिया के उप प्रधानमंत्री रिचर्ड मार्ल्स ने कहा कि उनका देश अमेरिका के साथ बातचीत करेगा ताकि यह समझा जा सके कि इस बोर्ड की भूमिका क्या होंगी. इसके अलाव जॉर्डन, ग्रीस, साइप्रस और पाकिस्तान ने भी पुष्टि की है कि उन्हें निमंत्रण मिला है. कनाडा, तुर्किये, मिस्र, पैराग्वे, अर्जेंटीना और अल्बानिया पहले ही इस बारे में जानकारी दे चुके हैं. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि कुल कितने देशों को आमंत्रित किया गया है.
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1 अरब डॉलर देने वाले देशों को मिलेगी स्थायी सदस्यता
मामले से जुड़े एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, बोर्ड के चार्टर को अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है. अधिकारी ने बताया कि जो देश 1 अरब डॉलर का योगदान देंगे उन्हें बोर्ड में स्थायी सदस्यता मिलेगी जबकि बिना योगदान के सदस्यता तीन साल के कार्यकाल तक सीमित होगी. जुटाई गई यह राशि गाजा के पुनर्निर्माण में इस्तेमाल की जाएगी. सूत्रों की माने तो अमेरिका आने वाले दिनों में बोर्ड के सदस्यों की आधिकारिक सूची जारी करेगा.
