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उत्तर प्रदेश में फिल्म ‘घूसखोर…’ के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है. UP CM के निर्देश पर लखनऊ के हज़रतगंज थाने में ‘घूसखोर पंडत’ के डायरेक्टर और उनकी टीम के खिलाफ FIR दर्ज हुई. CM के निर्देश पर हजरतगंज पुलिस ने खुद संज्ञान लेकर केस दर्ज किया और जांच शुरू कर दी. FIR के मुताबिक फिल्म का टाइटल एक विशेष जाति को निशाना बनाकर उनको अपमानित करने के उद्देश्य से रखा गया है. FIR में ये भी कहा गया है कि इस फिल्म के माध्यम से समाज में मनमुटाव फैलाने, शांति व्यवस्था भंग करने और सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है.

वैसे तो इस फिल्म का कई राज्यों में विरोध हो रहा है. लोगों ने फिल्म के ख़िलाफ़ कोर्ट का भी रुख़ किया है. लेकिन उत्तर प्रदेश में मामला अलग है. यहां मुख्यमंत्री के निर्देश पर पुलिस ने खुद संज्ञान लेते हुए केस दर्ज किया. इससे पता चलता है कि यूपी में किसी भी जाति या समुदाय की भावनाओं को आहत करना बर्दाश्त नहीं है.

सामाजिक सौहार्द और शांति व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करने वाले तत्वों के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत कठोरतम कार्रवाई की जाएगी. ब्राह्मणों को बदनाम करने के किसी भी प्रयास को स्वीकार नहीं किया जाएगा. मनोरंजन के नाम पर या अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर जातिवादी फिल्मों को बढ़ावा देने की कोशिश कामयाब नहीं होगी.

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आज जब फिल्म का विरोध तेज़ हुआ, फिल्म के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया गया, तब जाकर नेटफ्लिक्स इंडिया ने फिल्म का टीजर और उससे जुड़ा सभी प्रमोशनल कंटेंट सोशल मीडिया अकाउंट्स और यूट्यूब से हटाया. साथ ही फिल्म बनाने वालों और फिल्म में काम करने वाले अभिनेता को भी सफाई देनी पड़ी. आपको उनका पक्ष भी सुनना चाहिए. फिल्म के लेखक और निर्माता नीरज पांडे के मुताबिक

ये फिल्म एक काल्पनिक पुलिस ड्रामा है और इसमें ‘पंडत’ शब्द का इस्तेमाल सिर्फ एक काल्पनिक किरदार के लिए आम बोलचाल के नाम के तौर पर किया गया है. इस कहानी का फोकस एक व्यक्ति के काम और उसके फैसलों पर है. इसका किसी भी जाति, धर्म या समुदाय से कोई संबंध नहीं है और न ही यह किसी का प्रतिनिधित्व करती है.

इसी तरह फिल्म में मुख्य किरदार निभाने वाले अभिनेता मनोज वाजपेयी की सफाई भी आई है. मनोज वाजपेयी ने भी इसी तरह की सफाई दी है कि उनका इरादा किसी की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं था.
लेकिन दोनों की सफाई में ये कहीं से नहीं बताया गया है कि आख़िर घूसखोर के आगे पंडत लिखने की क्या ज़रूरत है?

जब पंडित शब्द को एक जाति से जोड़ा जाता है तो फिर वो ये कैसे कह सकते हैं कि इस फिल्म का किसी भी जाति, धर्म या समुदाय से संबंध नहीं है? क्या क्रिएटिविटी के नाम पर किसी जाति या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाई जा सकती है? क्या क्रिएटिव फ्रीडम के नाम पर किसी जाति पर हमला करना ज़रूरी है? नीरज पांडे ने बिना किसी जाति को निशाना बनाए पहले भी हिट फिल्में दी हैं. उनकी फिल्मो की दर्शक तारीफ करते हैं. फिर इस बार जाति का ज़िक्र करने की क्या मजबूरी थी?

ब्राह्मण संगठन और साधु-संत तो फिल्म से नाराज हैं हीं, BSP प्रमुख मायावती ने भी इसका विरोध किया. मायावती ने इसे जातिसूचक फिल्म बताते हुए केंद्र सरकार से इस पर तुरंत प्रतिबंध लगाने की मांग की. इसके साथ ही उन्होंने लखनऊ पुलिस की तरफ से दर्ज की गई FIR को भी सही बताया है.

यानी क्रिएटिव फ्रीडम वाली दलील से अधिकतर लोग असहमत हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि योगी फोर्स की कार्रवाई और देशव्यापी विरोध के बाद नेटफ्लिक्स इस फिल्म को जाति के बंधन से दूर कर पूरी तरह लोगों के मनोरंजन के लिए पेश करेगी. पंडित के नाम पर जहर सिर्फ फिल्में नहीं फैला रही हैं. सिनेमा से अलग असली जिंदगी में भी ये जहर उगला जा रहा है. लखनऊ से करीब 40 किलोमीटर दूर देवा शरीफ दरगाह में एक युवक के साथ मारपीट की गई, उसका अपमान किया गया, उसके तिलक को जबरन धुलवाया गया.

देवा शरीफ दरगाह को हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बताया जाता है. लेकिन यहां जब एक हिंदू युवक गया तो उस पर अत्याचार किया गया. तिलक लगाने की वजह से उसकी पिटाई की गई. पानी डालकर उसका तिलक धुलवाया गया. वहां कई लोग मौजूद थे. लेकिन कोई बचाने नहीं आया. खुद पीड़ित ने अपनी जुबानी आपबीती सुनाई कि देवा शरीफ दरगाह में उसके साथ क्या हुआ. भाईचारे की बात करने वाले एक भी शख्स की आवाज इस घटना के विरोध में नहीं निकली

मारपीट का वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने आरोपी दुकानदार जावेद को हिरासत में ले लिया. लेकिन ये घटना दरगाह के बाहर हिंदू प्रतीकों से नफरत का सबसे बड़ा उदाहरण है. दरगाह में हिंदू-मुस्लिम भाईचारा के नाम पर दूसरे धर्म के लोगों को बुलाया तो जाता है लेकिन हिंदू तिलक से उनकी भावनाएं भड़क जाती हैं.