आम बजट 2026-27 में इस बार सरकार महत्वपूर्ण बंदरगाह चाबहार के लिए फंड का ऐलान नहीं किया है, जबकि पिछले वर्षों में हर बार 100 करोड़ रुपये इस परियोजना के नाम अलॉट हुए हैं. इसको लेकर विपक्षी नेता भी केंद्र सरकार को घेर रहे हैं, क्योंकि ईरान और अमेरिका में चल रहे तनाव के बीच चाबहार के लिए कोई पैसा ना रखना सरकार पर कई सवाल खड़े रहा है.
चाबहार क्या है और क्यों अहम है?
चाबहार पोर्ट ईरान के दक्षिण-पूर्वी इलाके में मौजूद एक बहुत अहम समुद्री बंदरगाह है. यह ईरान का इकलौता बंदरगाह है जो सीधे हिंद महासागर से जुड़ता है, इसलिए इसकी रणनीतिक अहमियत बहुत ज्यादा मानी जाती है. यह बंदरगाह भारतीय सामान को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचाने में मदद करता है, खासकर उन देशों तक जहां भारत का जमीन से रास्ता नहीं है.

चाबहार भारत के लिए ‘गेटवे टू सेंट्रल एशिया’
अगर आप यह सोच रहे हैं कि बंदरगाह ईरान का है तो फिर भारत के लिए अहम क्यों है और भारत यहां इतनी बड़ी तादाद में पैसा क्यों लगा रहा है? तो इसका जवाब है कि भारत से पश्चिम एशिया या यूरोप जाने वाले कई रूट्स पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति से प्रभावित होते हैं, लेकिन चाबहार इस परेशानी को पार करने का बेहतरीन विकल्प देता है. भारत ने इस पोर्ट के एक हिस्से के विकास और संचालन में सहयोग किया है. क्योंकि यहां से सामान पहले ईरान के अंदरूनी इलाकों तक जाता है, फिर सड़क और रेल नेटवर्क की मदद से अफगानिस्तान और आगे मध्य एशियाई देशों तक पहुंचता है. इसे एक तरह से भारत के लिए ‘गेटवे टू सेंट्रल एशिया’ कहा जाता है.
चाबहार और भारत का रिश्ता कितना पुराना?
चाबहार में भारत की हिस्सेदारी को दो दशक से भी ज्यादा हो चुके हैं. बंदरगाह पर चर्चा 2002 में शुरू हुई, जब हसन रूहानी – जो उस समय राष्ट्रपति सैयद मोहम्मद खातमी के अधीन ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे – ने अपने भारतीय समकक्ष ब्रजेश मिश्रा से बातचीत की. अगले साल राष्ट्रपति खातमी की भारत यात्रा के दौरान उन्होंने और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सहयोग के लिए एक रोडमैप पर दस्तखत किए, जिसमें चाबहार को प्रमुख परियोजनाओं में से एक के रूप में पहचाना गया.
भारत हटा तो चीन की होगी बल्ले-बल्ले
मामला सिर्फ बजट का नहीं है, इसके पीछे बड़ी जियो-पॉलिटिक्स चल रही है. क्योंकि चाबहार से सिर्फ 170Km की दूरी पर पाकिस्तान में चीन का ‘ग्वादर पोर्ट’ मौजूद है. यानी एक ही समुद्री इलाके में भारत और चीन की रणनीतिक मौजूदगी है. ऐसे में अगर भारत इस परियोजना से पीछे हटता है तो चीन का क्षेत्रीय कंट्रोल और मजबूत हो जाएगा.
चीन को मिलेगा बड़ा मौका
इसके अलावा चीन अपने वैश्विक प्लान ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के जरिए पहले से ही पाकिस्तान और ईरान के साथ बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है. चीन का मकसद BRI के जरिए दुनियाभर में रास्तों पर पकड़ बनाना है और ग्वादर भी इसी योजना का हिस्सा है. अगर भारत चाबहार में धीमा पड़ता है, तो ईरान में निवेश और प्रभाव बढ़ाने का मौका चीन को मिल सकता है.
भारत ने क्यों अलॉट नहीं किया पैसा?
अब अगर बात करें कि आखिर भारत ने इतने महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट के लिए पैसा अलॉट क्यों नहीं किया तो इसका जवाब अंतर्राष्ट्रीय राजनीति हो सकता है. यह तो सभी जानते हैं कि अमेरिका और ईरान इन दिनों एक दूसरे के दुश्मन बने बैठे हैं. अमेरिका ने ईरान पर कई तरह की पाबंदियां भी लगा रखी हैं. ईरान पर अमेरिकी पाबंदियों की वजह से वहां किसी भी बड़े निवेश में कानूनी या वित्तीय जोखिम बढ़ जाता है. ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगा कि भारत इस अहम परियोजना से पीछे हट गया और ना ही यह फैसला पैसे की कमी से जुड़ा है, बल्कि कूटनीति, सुरक्षा और रणनीति से जुड़ा बताया जा रहा है.
क्या कहते हैं दिग्गज?
सामरिक मामलों के दिग्गज ब्रह्मा चेलानी ने भी कहा है कि यह कदम इस अहम परियोजना से मुंह मोड़ लेना नहीं है, बल्कि भू-राजनीति से प्रेरित एक विराम हो सकता है. एक पोस्ट में चेलानी ने लिखा,’चाबहार बंदरगाह अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का भारत का एकमात्र व्यवहार्य मार्ग है जो पाकिस्तान को बाईपास करता है. भारत के हटने से लगभग निश्चित रूप से चीन के लिए एक खाली जगह बन जाएगी. इसलिए भारत के 2026-27 के बजट में चाबहार के लिए धन का अभाव रणनीतिक पीछे हटने के बजाय एक सामरिक रोक को दर्शाता है, क्योंकि वाशिंगटन ने भारत को 26 अप्रैल तक परिचालन बंद करने या प्रतिबंधों का सामना करने की समय सीमा दी है.’
2018 में US ने छूट दी, 2025 में ले ली वापस
अमेरिका अक्सर ईरान पर तरह-तरह की पाबंदियां लगाता रहता है और ये पाबंदियां सिर्फ ईरान तक महदूद नहीं रहती हैं, बल्कि कोई देश या कंपनी उसके साथ व्यापार करेगी तो उसे अमेरिकी सजा (फाइन, बैन, बैंकिंग रोक) झेलनी पड़ सकती है. 2018 में अमेरिकी सरकार ने ईरान फ्रीडम एंड काउंटर -प्रोलिफर्लेशन एक्ट के तहत एक छूट दी थी ताकि भारत अपनी गतिविधियां जारी रख सके. हालांकि सितंबर 2025 में ट्रंप सरकार ने 2018 में भारत को मिली छूट वापस ले ली. इसका सीधा मतलब है कि अब चाबहार पोर्ट से जुड़ी कंपनियां या कोई देश अमेरिकी पाबंदियों के दायरे में आ सकते हैं.
