
DRDO Hypersonic Scramjet Engine Test Successful: दुनिया में लगातार बढ़ते सुरक्षा खतरों को देखते हुए भारत लगातार अपने आपको सैन्य रूप से मजबूत करने में लगा हुआ है. हाइपरसोनिक मिसाइलों के इस युग में भारत अब तक इस तकनीक से महरुम था. लेकिन आज शुक्रवार को भारत ने इस कमी को आखिरकार पाट ही लिया. DRDO ने शुक्रवार को स्क्रैमजेट इंजन का सफल और लंबी अवधि का ग्राउंड टेस्ट किया. इस टेस्ट को भारत की रक्षा क्षमताओं के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है.
अब भारत भी बनने जा रहा ‘अजेय’
DRDO ने बयान जारी करके इस सफल टेस्ट के बारे में जानकारी दी. एजेंसी ने बताया कि यह टेस्ट डीआरडीओ की हैदराबाद स्थित प्रयोगशाला DRDL ने किया. करीब 12 मिनट से अधिक समय तक चले इस परीक्षण ने यह साबित कर दिया कि भारत अब हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक के बेहद नजदीक पहुंच चुका है. यह वही तकनीक है जो किसी भी देश को दुश्मन के लिए लगभग ‘अजेय’ बना देती है.
मौत बनकर दुश्मन पर झपटती है ये मिसाइल
हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलें ध्वनि की गति से पांच गुना ज्यादा, यानी करीब 6,000 किलोमीटर प्रति घंटे से भी अधिक रफ्तार से उड़ान भर सकती हैं. यह स्पीड इतनी तेज होती है कि किसी भी मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम के लिए उन्हें रोक पाना बेहद मुश्किल हो जाता है. यही वजह है कि अमेरिका, चीन और रूस जैसे देश पहले से ही इस तकनीक पर काम कर रहे हैं. अब भारत भी इसी एलीट क्लब में शामिल होने की ओर बढ़ रहा है.
हजारों डिग्री टेंपरेचर में भी इंजन रहेगा ठंडा
DRDO ने बताया कि इस टेस्ट की सबसे बड़ी खासियत इसमें एक्टिवली कूल्ड स्क्रैमजेट इंजन का इस्तेमाल करना रहा. ऐसे में हाइपरसोनिक स्पीड पर उड़ान के दौरान इंजन और मिसाइल का तापमान हजारों डिग्री तक पहुंच सकता है. ऐसे में अगर कूलिंग सिस्टम फेल हो जाए, तो पूरा सिस्टम नष्ट हो सकता है. यही वजह है कि DRDO ने इसमें एक्टिव कूलिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया. साथ ही साबित कर दिया कि भारत ने एक बड़ी तकनीकी चुनौती पर काबू पा लिया है.
दुश्मन के ठिकाने कम समय में होंगे स्वाहा
डिफेंस एक्सपर्टों के मुताबिक, यह टेस्ट भारत के लिए एक ‘गेम चेंजर’ है. दरअसल हाइपरसोनिक मिसाइलें दुश्मन के महत्वपूर्ण ठिकानों, रडार स्टेशनों, एयरबेस और कमांड सेंटरों को बहुत कम समय में निशाना बना सकती हैं. इससे दुश्मन को जवाब देने का मौका तक नहीं मिलता है. यही वजह है कि चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ तनावपूर्ण हालात में यह टेस्ट भारत की डिटरेंस पावर यानी डर पैदा करने वाली ताकत को कई गुना बढ़ा देती है.
स्वदेशी तकनीक से की गई विकसित
स्क्रैमजेट इंजन और उससे जुड़ी टेस्ट फैसिलिटी पूरी तरह स्वदेशी रूप से विकसित की गई है. इसमें भारतीय उद्योग और वैज्ञानिकों की बड़ी भूमिका रही है. इससे न केवल आयात पर निर्भरता कम होगी, बल्कि भविष्य में भारत इस तकनीक का निर्यातक भी बन सकता है. लिहाजा यह टेस्ट भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति को भी मजबूती प्रदान करने वाला माना जा रहा है.
रक्षामंत्री ने दी वैज्ञानिकों को बधाई
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और डीआरडीओ प्रमुख डॉ. समीर वी कामत ने इस उपलब्धि को देश के लिए मील का पत्थर बताया है. यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत अब अगली पीढ़ी की युद्ध तकनीक में तेजी से आगे बढ़ रहा है. यह टेस्ट सिर्फ एक वैज्ञानिक सफलता नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक सुरक्षा के लिए एक मजबूत ढाल भी बनने वाला है.
