General Naravane Book: संसद में राहुल गांधी पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की जिस किताब का अंश पढ़ना चाह रहे थे, वह अब तक पब्लिश ही नहीं हुई है. सरकार की तरफ से गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा के तमाम नेता यही कहते रहे कि जो किताब अभी पब्लिश नहीं हुई, उसका हवाला कैसे दिया जा सकता है? ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या ऐसा कोई कानून या नियम है जो वरिष्ठ सैन्य अफसरों को रिटायरमेंट के बाद गुप्त जानकारी या लीडरशिप के अहम फैसलों की जानकारी साझा करने से रोकता है.
1. एक रिपोर्ट के मुताबिक सेना के वरिष्ठ अधिकारी जिनके पास गुप्त जानकारी होती है वे ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत नियमों से बंधे होते हैं. इसके तहत क्लासिफाइड सामग्री को सार्वजनिक होने से रोकने के लिए रिटायरमेंट के बाद भी किताब या किसी दूसरे रूप में जानकारी के पब्लिकेशन पर रोक होती है.
2. हालांकि कमर्शियल या प्राइवेट नौकरी करने के लिए आम तौर पर एक साल का ‘कूलिंग-ऑफ’ पीरियड होता है, लेकिन सीक्रेट जानकारी पब्लिश करने के लिए सरकार से पहले मंजूरी लेना जरूरी है. 
3. जनरल नरवणे 31 दिसंबर 2019 से 30 अप्रैल 2022 तक सेना प्रमुख थे. उनकी आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ साल 2020 में भारत और चीन के बीच LAC गतिरोध और अग्निपथ योजना के बारे में संवेदनशील डिटेल्स के संबंध में रक्षा मंत्रालय से मंजूरी मिलने में देरी के कारण अभी तक पब्लिश नहीं हुई है.
4. यह किताब जनवरी 2024 में आने वाली थी लेकिन सेना और रक्षा मंत्रालय ने पब्लिशर से कहा कि जब तक वे इसके कंटेंट की समीक्षा न कर लें, तब तक इसे आगे न बढ़ाएं.
5. किताब कब तक आ पाएगी? इस बारे में पब्लिशर, लेखक या मंत्रालय की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.
… तो रोक ली जाएगी पेंशन
अगर तय नियमों और कानूनों का उल्लंघन किया जाता है तो सरकार कानूनी कार्रवाई कर सकती है और CCS (पेंशन) नियमों के तहत ऐसे उल्लंघन पर सैन्य अफसर की पेंशन का कुछ हिस्सा या पूरी पेंशन रोकी जा सकती है. एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगर यह आत्मकथा पब्लिश होती है तो चीन के साथ LAC की स्थिति बिगड़ सकती है.
मई-जून 2020 में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच पूर्वी लद्दाख और सिक्किम में LAC पर हिंसक झड़प हुई थी, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण 15 जून 2020 को गलवान घाटी में हुई झड़प थी. इसमें 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो गई थी. चीनी पक्ष की ओर भी नुकसान हुआ था. यह दशकों में सबसे भयानक संघर्ष था जिससे बड़े पैमाने पर सैनिकों की तैनाती बढ़ गई थी.
