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जब से कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने 1995 की यह तस्वीर शेयर कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संगठन क्षमता की प्रशंसा की है, काफी कुछ कहा सुना जा चुका है. कांग्रेस में खलबली है, उधर भाजपा चुटकी ले रही है. मौका मिला है तो राहुल गांधी पर ताने भी कस रही है. गुजरात में केशुभाई पटेल के शपथ ग्रहण समारोह की इस ऐतिहासिक तस्वीर में आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लालकृष्ण आडवाणी के ठीक सामने जमीन पर बैठे दिखाई दे रहे हैं. अगल-बगल भाजपा के कई बड़े नेता बैठे हैं. इनके नाम भी आप जानते ही होंगे लेकिन शायद कम लोगों को पता होगा कि इस तस्वीर में एक शख्स ऐसा था जो उस दिन मायूस था. उसकी राजनीतिक पारी का यह एक तरह से अवसान था. कौन था वो?

पहले यह जान लीजिए कि उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात भाजपा में संगठन महामंत्री थे. संघ से आए मोदी तब तक अपनी करीब 8 साल की सक्रिय राजनीति में भाजपा को नई पहचान दिलाने में सफल हो रहे थे. आडवाणी की रथ यात्रा से हिंदुत्व की लहर के साथ मोदी के रणनीतिक और सांगठनिक कुशलता सबको दिख रही थी. संघ की अनुशासन वाली संस्कृति को मानते हुए मोदी उस दिन अपने वरिष्ठ नेताओं के सामने जमीन पर बैठे थे. इतने साल बाद अब दिग्विजय सिंह को इस पर आश्चर्य हो रहा है. 

खैर, अब उस नेता की बात करते हैं जो 14 मार्च 1995 को गांधीनगर की इस सभा में उदास था. तस्वीर एक बार फिर गौर से देखिए. आडवाणी के दाहिनी तरफ जो नेता बैठे हैं उनका नाम है छबीलदास मेहता. इनके बारे में जानने से पहले उस समय की गुजरात पॉलिटिक्स को समझना जरूरी है. एक साल पहले फरवरी 1994 में एक दिन सुबह गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को कार्डिएक अरेस्ट आया और उन्हें बचाया नहीं जा सका. पहली बार गुजरात मॉडल की चर्चा उन्हीं के समय से शुरू हो गई थी. चिमनभाई जनता दल (गुजरात) के चुनाव चिन्ह पर जीते थे. पहले उन्होंने भाजपा की मदद से गठबंधन सरकार चलाई फिर गठबंधन टूटा तो कांग्रेस के साथ दोस्ती कर ली. बाद में उन्होंने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया.

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हालांकि चिमनभाई के समर्थक कांग्रेस के प्रति वफादार नहीं हो पाए थे. चिमनभाई की मौत हुई तो कांग्रेस लीडरशिप ने नई रणनीति बनाई. चिमनभाई की पत्नी को माना जा रहा था कि सीएम बनाया जाएगा. वह उस समय कांग्रेस के कोटे से राज्यसभा सांसद थीं. एक और कैंडिडेट था जो मौजूदा सरकार में वित्तमंत्री के पद पर था. वह थे छबीलदास मेहता. वह कार्यवाहक मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले चुके थे. हालांकि अंदरखाने में छबीलदास vs उर्मिलाबेन पटेल की रेस चलने लगी थी. यह किस्सा काफी मशहूर है कि तत्कालीन पीएम नरसिम्हा राव के विश्वासपात्र ज्योतिषी चंद्रास्वामी की मदद से छबीलदास गुजरात के सीएम बने रहे. उधर, उर्मिलाबेन फिर से राज्यसभा पहुंचीं और केंद्र में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी सौंपी गई. 

छबीलदास मेहता आजादी की लड़ाई में भी शामिल थे. अलग गुजरात स्टेट की मांग के लिए हुए आंदोलन में वह शामिल थे. प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से कांग्रेस में गए. विधायक बने और 1973 में मंत्री भी बन गए. कांग्रेस ने टिकट काटा तो 1980 में वह जनता पार्टी में चले गए थे. जनता दल (गुजरात) का विलय कांग्रेस में हुआ तो वह भी कांग्रेसी हो गए. 1995 में कांग्रेस हारी तो छबीलदास की सियासत ढलान पर चली गई. अगला चुनाव हार गए. 2001 में शरद पवार की पार्टी में चले गए. 2002 में फिर हार गए. 2008 में उनका निधन हो गया.