यह घटना हर भारतीय के लिए जितनी हृदयविदारक है उतनी शर्मनाक भी. कानून हाथ में लेने और लिंचिंग मानसिकता वाली पीढ़ी को कौन समझाएगा? दूसरी बात, क्या हम अपने ही लोगों को पहचानते नहीं? दिल्ली हो या कोई दूसरा उत्तर भारत का शहर यह शिकायत कई साल से रही है कि पूर्वोत्तर के छात्रों और युवाओं का मजाक बनाया जाता है. एंजेल चकमा अब इस दुनिया में नहीं हैं. उनके सपोर्ट में जो आक्रोश देखा जा रहा है, उसमें एक नारा यह भी है- हम भारतीय हैं, हमें ‘चीनी’ कहना बंद कीजिए. देहरादून में मारे गए त्रिपुरा के 24 साल के एंजेल चकमा की कहानी दिल को झकझोर देगी. उसने नौकरी मिलते ही अपने बुजुर्ग हो रहे फौजी पिता से कहा था कि पापा आपने हमारे लिए बहुत किया. अब आराम कीजिए.
त्रिपुरा के रहने वाले 24 साल के एंजेल चकमा का बचपन कई राज्यों में बीता था. उसके पिता बीएसएफ हेड कांस्टेबल रहे हैं और उनकी पोस्टिंग एक शहर से दूसरे शहर में होती रहती थी. बिलखते हुए घरवालों ने बताया है कि बार-बार जगह बदलने से एंजेल के बचपन पर सकारात्मक असर हुआ और वह मिलनसार, जमीन से जुड़ा और कम उम्र से ही जिंदगी की अनिश्चितताओं को लेकर जागरूक हो गया था.
घरवाले यह सोचकर और भी दुखी हैं कि एंजेल बिल्कुल शांत रहता था. वह बिल्कुल भी झगड़ा नहीं करता था. शायद ही उसने कभी किसी से बहस या झगड़ा किया होगा. अब प्रदर्शनकारी एंजेल चकमा के लिए इंसाफ की मांग कर रहे हैं. इस महीने की शुरुआत में देहरादून में कुछ लोगों ने एंजेल पर हमला किया. पुलिस ने नस्ली हमला मान रही है. कुल छह लोगों का समूह था. एंजेल को गंभीर चोट आई और उनकी मौत हो गई.
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