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बंगाल में सीपीआई (एम) ने अपने 34 साल के राज में धर्म से जुड़े सवालों को हमेशा नजरअंदाज ही किया. एक तरह से उसे अनसुलझा ही छोड़ दिया. बंगाल की जनता में आगे भगवाकरण बढ़ने लग. धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ पश्चिम बंगाल में राम नवमी और हनुमान जयंती के समय हिंसा की घटनाएं होने लगीं. एक टर्म उभरकर सामने आया- रिएक्टिव सेलिब्रेशन. लेफ्ट और लिबरल ताकतें सामाजिक-धार्मिक सवालों को सुलझाने में नाकाम रहीं. जैसे-जैसे बंगाल में लेफ्ट पार्टियां कमजोर पड़ने लगीं, उस राजनीतिक खालीपन को दक्षिणपंथ ने कवर किया. लेफ्ट की पहचान धुंधली होने लगी. दरअसल, राजनीति में धर्म की एंट्री की यहां अलग कहानी है. 

लेफ्ट राज के दौरान बंगाल ने धार्मिक मामलों में सरकारी हिस्सेदारी को लगभग नगण्य रखा था. हालांकि हाल के दशक में सरकार चला रही तृणमूल कांग्रेस इसमें पीछे नहीं रही. ममता बनर्जी की सरकार पर ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ और ‘तुष्टिकरण की पॉलिटिक्स’ का सहारा लेने के आरोप लगते रहे. 

धर्म के नाम पर हिंसा कम लेकिन…

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1947 के सांप्रदायिक दंगों और कुछ इलाकों में कभी-कभी होने वाले आपसी झगड़ों के बावजूद हाल के दशकों में पश्चिम बंगाल में धर्म के नाम पर नफरत फैलाने की बड़ी घटनाएं नहीं हुई हैं. एक्सपर्ट कहते हैं कि राइट विंग के लिए बंगाल चुनावी फायदे के लिए एक नया मैदान है. सवाल यह उठता है- अगर बंगाल उत्तर प्रदेश से अलग है तो वहां राइट विंग के सेंध लगाने की बात क्यों होती है. देश में अब भी चर्चा होती रहती है कि बंगाल में ममता के किले को हिंदुत्व की राजनीति ढहाने में सफल नहीं हो पाई है. वैसे, टैगोर और दूसरे मिले-जुले उदारवाद के रीति-रिवाजों में पले-बढ़े आम बंगाली आम तौर पर धार्मिक कट्टरपंथ से दूर ही रहते हैं. 

ऐसे में धर्म के नाम पर हाथ में तलवारें, लाठियां, त्रिशूल लिए बच्चों को धार्मिक जुलूस में चलते देखना जरूर चौंकाता है. बंगाल के पब्लिक कल्चर में धर्म के लिए जगह बढ़ती ही जा रही है. 

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कुछ साल पहले बंगाल में एनआरसी का मुद्दा काफी चर्चा में था. गैर-मुसलमानों को भरोसा दिलाया गया कि उन्हें डरने की जरूरत नहीं है. हौवा यह बनाया गया कि ‘बाहरी’ के लिए अब रहना मुश्किल है. कौन था बाहरी? बंगाली समाज सर्वसमावेशी और बौद्धिक झुकाव के लिए मशहूर है लेकिन अब अंदर ही अंदर सांप्रदायिक तनाव बढ़ा दिखता है. ताजा उदाहरण, मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद’ के निर्माण का शोर है. 

बंगाल की राजनीति को समझने वाले बताते हैं कि एक दशक पहले तक राज्य की पॉलिटिक्स में धर्म का इस्तेमाल इतना नहीं होता था जैसा अब हो रहा है. हालांकि पॉलिटिकल गुटबाजी और उसके चलते अलग-अलग तरह के पॉलिटिकल झगड़े बंगाल के कल्चर में जरूर थे. 

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यहां नक्सल मूवमेंट में हिंसा को खुलकर अपनाया गया. पुलिस के मुखबिर तब युवा नक्सलियों को सीक्रेट मीटिंग के लिए किसी इलाके में आते देखते थे तो अधिकारियों को बता देते थे. ऐसे नक्सली को ‘बाहरी’ कहा जाता था. इसे लेखिका महाश्वेता देवी ने अपने नॉवेल ‘हजार चुराशीर मा’ में बहुत अच्छे से उकेरा है. नॉवेल में जिक्र आता है कि ‘बाहरी’ युवाओं को पुलिस ने एनकाउंटर में बेरहमी से मार डाला. 
(ए. शेखर पुरकायस्थ और शुभेंद्र भौमिक के लेख से साभार)