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वैसे तो पार्टी में टूट और चुनावों में शिवसेना (यूबीटी) के खस्ताहाल प्रदर्शन को देखें तो उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का गठबंधन जरूरी लगता है. हालांकि बीएमसी चुनाव के लिहाज से यह एक सियासी मजबूरी भी है. और हां, केवल उद्धव ठाकरे के लिए नहीं लगभग सभी पार्टियों के लिए. यह देश के सबसे नगर निगम पर हुकूमत की लड़ाई है और यहां 30 पर्सेंट का गणित ही काम करता है. 

विधानसभा या लोकसभा चुनावों के उलट मुंबई के बीएमसी चुनाव वार्ड-वार्ड के हिसाब से लड़े जाते हैं. यहां वोटर शायद ही कभी किसी एक पार्टी के लिए एकजुट होते होंगे. पिछले दो दशकों के चुनाव नतीजे यही बताते हैं कि मुंबई ने लगातार बंटे हुए फैसले दिए हैं. ऐसे में पार्टियों को सीधे लोकप्रिय सपोर्ट के इंतजार में बैठना नहीं होता बल्कि गठबंधन, सीट शेयरिंग और तालमेल पर निर्भर रहना पड़ता है. 

गठबंधन की बेचैनी क्यों?

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इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले चार BMC चुनावों के डेटा से पता चलता है कि 2002 के बाद किसी भी पार्टी ने 30 प्रतिशत वोट शेयर का आंकड़ा पार नहीं किया है. ऐसे में बीएमसी चुनाव के नतीजे बड़े जनादेश पर नहीं बल्कि इस पर ज्यादा निर्भर करता है कि कौन सा समूह वोटों के बंटवारे को रोक पाता है और मामूली बढ़त को सीटों में तब्दील कर सकता है. यह बंटे हुए वोटों का गणित ही है जो गठबंधन के लिए पार्टियों को बेचैन कर देता है. 

मुंबई के वोटर अपनी मर्जी से वोट देते आ रहे हैं. 2002 के चुनाव में शिवसेना 28.10 प्रतिशत वोटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. कांग्रेस ठीक पीछे थी. उसे 26.48 प्रतिशत वोट मिले थे. 15 साल के बाद 2017 में स्थिति वैसी ही थी. तमाम राजनीतिक बदलाव और समीकरण बदले लेकिन किसी भी पार्टी ने 30 प्रतिशत का आंकड़ा पार नहीं किया. 

30 पर्सेंट का ढक्कन क्यों लगा है?

इसकी वजह यह है कि मुंबई में हर जगह वोटिंग एक जैसी नहीं होती है. शहर के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग मुद्दे होते हैं. ऐसे में वहां के लोगों का वोटिंग पैटर्न भी अलग होता है. इसमें भाषा, आय का स्तर, धर्म और पेशा जैसे मुद्दे वोटर के फैसले पर असर डालते हैं. इस कारण BMC चुनावों में गठबंधन की भूमिका बढ़ जाती है. कुल वोट शेयर में छोटे-मोटे बदलाव भी कई वार्डों में नतीजे बदलने की ताकत रखते हैं. 

– कई वर्षों तक शिवसेना बीएमसी में प्रमुख ताकत थी लेकिन वोट शेयर से पता चलता है कि इसके समर्थन का आधार ज्याद नहीं बढ़ा. 
– 2002 में पार्टी को 28.10 प्रतिशत वोट मिले थे. 
– 2017 में भी यह नहीं बदला और 28.29 प्रतिशत वोट मिले. 
– 2007 और 2012 के चुनावों में शिवसेना की हिस्सेदारी घटकर लगभग 22 प्रतिशत रह गई थी. 
– इसके बावजूद शिवसेना ने बड़ी संख्या में सीटें जीतीं. 2002 में 97 और 2007 और 2017 दोनों में 84 सीटें. 
– ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि इसके खिलाफ वोट कई पार्टियों में बंट गए थे और लंबे समय तक बीजेपी के साथ इसका तालमेल बना रहा. 

2017 के बाद क्या हुआ

भाजपा और शिवसेना ने 2017 के बीएमसी चुनावों के लिए अपना गठबंधन खत्म करने का फैसला किया. पूरे शहर में अकेले चुनाव लड़ने के बावजूद दोनों 30 प्रतिशत वोट शेयर का आंकड़ा पार नहीं कर पाए. 

आज का समीकरण

मौजूदा राजनीतिक माहौल में स्थिति बदल गई है. एकनाथ शिंदे की शिवसेना बनने और पारंपरिक मराठी वोटर्स के एकजुट न होने के कारण उद्धव ठाकरे की शिवसेना को मुकाबले में बने रहने के लिए नए गठबंधन की सख्त जरूरत है. यही वजह है कि राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के साथ हाथ मिलाना उनके लिए जरूरी हो गया था. हालांकि इससे उद्धव को जीत की गारंटी नहीं मिलने वाली, बस इतना जरूर होगा कि इससे वोटों का नुकसान रोका जा सकेगा. 

मनसे का असर

2012 में मनसे के उदय को टर्निंग प्वाइंट बताया जाता है. उस साल राज ठाकरे की पार्टी को 20.67 प्रतिशत वोट मिले थे लेकिन सीटें केवल 28 ही मिलीं. ऐसे में यह सत्ता में नहीं आई. हालांकि इसने शिवसेना के सपोर्ट बेस में सेंध लगाकर कई वार्डों में नतीजों को बदल दिया था. 2017 तक मनसे का वोट शेयर तेजी से घटकर 8 प्रतिशत रह गया और सीटों की संख्या घटकर सात रह गई. इस गिरावट का सबसे बड़ा फायदा शिवसेना को नहीं बल्कि बीजेपी को हुआ. 

बीएमसी चुनाव में भाजपा का समीकरण

करीब 15 वर्षों तक भाजपा मुंबई के नगर निगम चुनावों में छोटी पार्टी थी. 2002 और 2012 के बीच उसका वोट शेयर 9 प्रतिशत से कम रहा. उसकी सीटें भी 28 से 35 के बीच ही आईं. मुंबई में वह हमेशा शिवसेना के साये में रही. 2017 में सीन बदला जब भाजपा ने शिवसेना के साये से बाहर निकलकर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया. 

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एक ही चुनाव में उसका वोट शेयर बढ़कर 27.32 प्रतिशत हो गया और सीटों की संख्या 82 पहुंच गई. यह शिवसेना से केवल 2 कम थी. यह किसी भी BMC चुनाव में देखा गया सबसे बड़ा बदलाव था. जो बात सबसे अलग थी, वह यह कि बीजेपी ने ये नतीजे बिना किसी औपचारिक गठबंधन के हासिल किए थे. हालांकि इसकी वजह कई थी. कांग्रेस और NCP का प्रदर्शन घटा था, मनसे के वोटों में भारी गिरावट देखी गई और कई वार्डों में वोटों के बंटवारे का फायदा मिला. 

भाजपा के लिए शिंदे अनिवार्य क्यों?

फिर भी यह इतना नहीं था कि मनचाहा नतीजा दे सके. केंद्र और राज्य की सत्ता में होने के बावजूद भाजपा शिवसेना को सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर हटा नहीं पाई और न ही 30 प्रतिशत वोट शेयर का ढक्कन ही खोल पाई. इसी वजह से अपनी मौजूदा मजबूती के बाद भी भाजपा मुंबई पर कंट्रोल के लिए एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ गठबंधन की जरूरत महसूस करती है. 

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बीएमसी के 20 साल बताते हैं कि मुंबई शायद ही कभी किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत देती है. 227 सदस्यों वाले नगर निगम पर अकेले शासन करने के लिए जरूरी आधे से ज्यादा सीटों का आंकड़ा कोई भी पार्टी पार नहीं कर पाई है. चुनाव आमतौर पर इस बात से तय होते हैं कि पार्टियां बटे हुए वोटों को कितनी अच्छी तरह से मैनेज करती हैं, न कि इस बात से कि कुल मिलाकर कौन सबसे ज्यादा लोकप्रिय है. 

ठाकरे भाइयों के साथ आने से उन्हें वोटों के बंटवारे को कम करने में मदद मिल सकती है. इससे कड़ी टक्कर वाले वार्डों में इनके जीतने के चांस बेहतर हो सकेंगे. हालांकि ध्यान रखना होगा कि 30 पर्सेंट का ढक्कन आज भी सभी पार्टियों पर लागू होता है. यहां तो गठबंधन ही सत्ता तक पहुंचा सकता है.