यह मामला कर्नाटक के एक डॉक्टर लोकेश बी एच से जुड़ा है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कर्नाटक हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उनके खिलाफ चल रहे आपराधिक केस को रद्द करने की मांग ठुकरा दी गई थी. उनके खिलाफ शिकायत एक महिला ने की है जो खुद को उनकी लिव-इन पार्टनर बताती है.
सुप्रीम कोर्ट में उठा बड़ा सवाल
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन के सिंह की बेंच ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि मुख्य सवाल यह है कि क्या शादी जैसी प्रकृति वाले लिव-इन रिश्ते में रह रहा कोई पुरुष भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए या भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धारा के तहत आरोपी बनाया जा सकता है.
धारा 498ए के अनुसार अगर पति या उसके रिश्तेदार किसी महिला के साथ क्रूरता करते हैं, जिसमें दहेज की मांग भी शामिल है तो उन्हें सजा हो सकती है. इस कानून में साफ तौर पर पति और पत्नी का जिक्र है. अदालत ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है. अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से भी मदद करने को कहा गया है. साथ ही वकील नीना नरीमन को अदालत का सहयोगी नियुक्त किया गया है.
डॉक्टर का पक्ष क्या है?
लोकेश की ओर से पेश वरिष्ठ वकील संजय नूली ने दलील दी कि हाई कोर्ट ने कानून की गलत व्याख्या की है. उनका कहना है कि धारा 498ए सिर्फ पति के खिलाफ पत्नी की शिकायत पर लागू होती है. इसे लिव-इन रिश्ते पर लागू नहीं किया जा सकता है.
क्या है पूरा मामला?
डॉ. लोकेश एक हृदय रोग विशेषज्ञ हैं. उनकी शादी फरवरी 2000 में नवीन नाम की महिला से हुई थी. बाद में तीर्था नाम की एक महिला ने आरोप लगाया कि उसकी शादी लोकेश से 2010 में हुई थी. तीर्था ने 2015 में पुलिस में कई शिकायतें दर्ज कराईं लेकिन वे बंद कर दी गईं. 2016 में उसने फिर शिकायत की और आरोप लगाया कि लोकेश ने दहेज की मांग करते हुए उसे जलाने की कोशिश की थी. हालांकि जिस दिन की घटना बताई गई उस दिन अस्पताल की ओर से प्रमाण दिया गया कि लोकेश अपनी ड्यूटी पर मौजूद थे. बाद में तीर्था ने घरेलू हिंसा का केस भी दर्ज कराया.
परिवार अदालत में मामला लंबित
लोकेश ने बेंगलुरु की फैमिली कोर्ट में याचिका दाखिल की है. इसमें उन्होंने कहा है कि उनका तीर्था से कोई वैवाहिक संबंध नहीं है. यह मामला अभी भी विचाराधीन है. साल 2023 में पुलिस ने लोकेश के खिलाफ कथित तौर पर दहेज मांगने और जलाने की कोशिश के आरोप में चार्जशीट दाखिल की है. उन्होंने इसे हाई कोर्ट में चुनौती दी लेकिन हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी.
बता दें, अब सुप्रीम कोर्ट इस अहम कानूनी सवाल पर फैसला करेगा कि क्या लिव-इन रिश्ते को धारा 498ए के तहत शादी जैसा माना जा सकता है या नहीं. इस फैसले का असर भविष्य में ऐसे कई मामलों पर पड़ सकता है. अदालत के अगले कदम पर सबकी नजरें टिकी हैं.
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