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Mohan Bhagwat’s speech on 100 years of RSS: भले ही मोदी सरकार भारत को दुनिया की महाशक्ति बनाने की कोशिश कर रही है. लेकिन RSS ऐसा नहीं चाहता. आखिर उसे देश के वैश्विक महाशक्ति बनने से क्या दिक्कत है? इस मुद्दे पर अब आरएसएस के मुखिया डॉक्टर मोहन भागवत ने खुद राज खोला है. उन्होंने कहा कि हम दुनिया की महाशक्ति बनना नहीं चाहते. महाशक्तियां अक्सर डर और दबाव से राज करती हैं. वे दूसरों पर प्रभुत्व जमाती हैं, जो कि ठीक तरीका नहीं है. 

‘ऐसी शक्ति नहीं बनना चाहते जो भय से शासन करे’

डॉक्टर भागवत ने कहा, ‘हम ऐसी शक्ति नहीं बनना चाहते जो भय से शासन करे. इसके बजाय हम ‘विश्वदेव’ या विश्वगुरु बनना चाहते हैं. जो अपनी मिसाल, चरित्र, मूल्यों और व्यवहार से दुनिया को प्रेरित करे. वह दुनिया को नेतृत्व दे और साथ लेकर चले.’ 

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उन्होंने कहा कि भारत धर्म-प्राण देश है. यहां रहने वाले हम सब एक हैं. हिंदू शब्द संज्ञा नहीं बल्कि विशेषण है. देश में रहने वाले सभी हिंदू हैं. यह हमारी जीवनशैली और स्वभाव है, जिसे हम लोग सदियों से जीते आए हैं. 

आरएसएस के कार्यक्रम में शामिल हुए सलमान खान

डॉक्टर भागवत मुंबई के वर्ली स्थित नेहरू सेंटर में शनिवार को आयोजित ‘मुंबई व्याख्यानमाला’ को संबोधित कर रहे थे. यह कार्यक्रम आरएसएस के 100 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित किया गया था. कार्यक्रम का विषय ‘100 वर्ष की संघ यात्रा – नए क्षितिज’ था. अपने लंबे संबोधन में आरएसएस मुखिया ने संघ की प्रकृति, उद्देश्य और भारत की वैश्विक भूमिका पर विस्तार से बात की.

उनके इस संबोधन को सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग नेहरू सेंटर में पहुंचे थे. इनमें गीतकार प्रसून जोशी और बॉलीवुड स्टार सलमान खान भी शामिल थे. वे दोनों अग्रिम पंक्ति में बैठे हुए थे. मोहन भागवत के आने के बाद जब वंदे मातरम गायन हुआ तो बाकी लोगों के साथ सम्मान में सलमान खान भी खड़े हुए. मोहन भागवत के भाषण के दौरान वे पूरे समय ध्यान से उनका संबोधन सुनते रहे. 

हम कोई पैरामिलिट्री या राजनीतिक संगठन नहीं- भागवत

संघ की अनोखी पहचान के बारे में बताते हुए मोहन भागवत ने कहा कि इसे दूर से या ऊपरी तौर पर देखने से गलतफहमियां पैदा होती हैं. लोग इसे पैरामिलिटरी संगठन या राजनीतिक दल समझ लेते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है. उन्होंने कहा कि जिस तरह चीनी की मिठास चखने से पता चलती है, व्याख्यान में सुनने से नहीं. उसी तरह संघ का काम भी अनुभव से समझा जा सकता है.

डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ से जुड़े लोग राजनीति में सक्रिय हो सकते हैं लेकिन आरएसएस कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है. भाजपा में कई स्वयंसेवक हैं, लेकिन संघ स्वयं राजनीति या सत्ता की होड़ में नहीं है. उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना किसी विरोध या प्रतिक्रिया में नहीं हुई. यह संगठन किसी से प्रतिस्पर्धा भी नहीं करता है.

‘संघ का एकमात्र लक्ष्य पूरे समाज को संगठित करना’ 

संघ का एकमात्र लक्ष्य बिना किसी विरोध के पूरे समाज को संगठित करना है. आरएसएस को लोकप्रियता, शक्ति या पावर की जरूरत नहीं है. यह यह केवल भले कामों को सही तरीके से चलाने में सहयोग देता है.

अपने संबोधन में भागवत ने संघ के ‘पंच परिवर्तन’ अभियान का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि यह अभियान समाज की सज्जन शक्तियों को सक्रिय और समन्वित करने का प्रयास है. इसके जरिए नागरिक अनुशासन, कर्तव्यपालन और घरेलू संस्कृति पर गर्व की भावना को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है.

‘चाहते हैं कि भारत फिर से विश्व का नेतृ्त्व करे’

उन्होंने कहा कि संघ के स्वयंसेवक बिना किसी सरकारी सहायता के 1.3 लाख से अधिक सेवा कार्य चला रहे हैं. दुनिया को हमारा संदेश साफ है. हम चाहते हैं कि प्राचीनतम सभ्यता के रूप में भारत फिर से विश्व का नेतृत्व करें. हम यह काम दादागिरी या भाषणों से नहीं, बल्कि उदाहरण से दुनिया को करके दिखाएंगे. हमारी यह यात्रा बाहरी प्रभुत्व की नहीं बल्कि सेवा, एकता और आंतरिक नेतृत्व की है.