
Maharashtra Politics: महाराष्ट्र की सियायत में बड़ा बदलाव होने की कयास लगाई जा रही है. सूत्रों की मानें तो आज महाराष्ट्र को पहली महिला डिप्टी सीएम मिलने वाली है. 1960 में बने महाराष्ट्र में इससे पहले कोई भी महिला मुख्यमंत्री या डिप्टी सीएम नहीं हुई हैं. यहां तक कि महाराष्ट्र मंत्रिमंडल में गृह मंत्रालय या वित्त मंत्रालय जैसा पावरफुल मंत्रालय की कमान संभालते हुए भी नजर नहीं आई हैं. लेकिन अब महाराष्ट्र की सियासत यह बदलाव का इशारा कर रही है. अजित पवार के निधन ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक ऐसा शून्य पैदा कर दिया है जिसे भरना तो मुमकिन नहीं होगा, लेकिन राजनीति रुकती नहीं वह करवट लेती रहती है. अब सबकी निगाहें सुनेत्रा पवार पर हैं उनकी पत्नी हैं. राजनीति के जानकारों की मानें तो अब सुनेत्रा पवार, अजित पवार की राजनीतिक विरासत की मशाल थामने जा रही हैं.
शुक्रवार को एनसीपी के दोनों धड़ों में दिनभर बैठकों का दौर चला. जिसके बाद आज शाम यानी शनिवार दोपहर 2 बजे एनसीपी विधायक दल की बैठक विधानसभा में होगी. सूत्रों के मुताबिक इसी बैठक में सुनेत्रा पवार को एनसीपी विधायक दल का नेता जाएगा नेता चुना जाएगा. विधायक दल की बैठक के बाद इसका ऐलान हो सकता है. सुनेत्रा पवार शनिवार शाम 5 बजे उपमुख्यमंत्री की शपथ ले सकती हैं. अगर ऐसा होता है तो महाराष्ट्र की सियायत में बड़ा बदलाव होगा.
महाराष्ट्र की सियासत में ‘पवार’ शब्द सिर्फ एक सरनेम नहीं, बल्कि दांव-पेंच की एक पूरी यूनिवर्सिटी है. लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने यह साफ कर दिया है कि अब लड़ाई सिर्फ आंकड़ों और विधायकों की नहीं, बल्कि इमोशनल वेव की है. जब राजनीति के गलियारों में शक्ति का संतुलन डगमगाता है, तो अक्सर ‘इमोशनल कार्ड’ सबसे बड़ा ट्रंप कार्ड साबित होता है. भारतीय लोकतंत्र का इतिहास गवाह है कि जब-जब भावनाओं का ज्वार उठा है, बड़े-बड़े किलों के समीकरण ध्वस्त हो गए हैं. 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी लहर ने राजीव गांधी को प्रचंड बहुमत दिया था.
सहानुभूति की लहर सत्ता की नई ऑक्सीजन
महाराष्ट्र की सियासत में ‘पवार’ शब्द सिर्फ एक सरनेम नहीं बल्कि दांव-पेंच की पूरी यूनिवर्सिटी है. अजित पवार के निधन के बाद का दुख पार्टी के लिए एक राजनीतिक शक्ति में बदलता दिख रहा है. सुनेत्रा पवार का डिप्टी सीएम के रूप में शपथ लेना इस बात का संकेत है कि पार्टी फिलहाल किसी भी बाहरी या दूसरे चेहरे पर दांव लगाकर जोखिम नहीं लेना चाहती. भारतीय राजनीति में किसी बड़े नेता के निधन के बाद पैदा हुई सहानुभूति अक्सर चुनावी जीत की गारंटी बन जाती है. सुनेत्रा पवार के सामने सबसे बड़ा काम अब होगा इस ‘इमोशनल वेव’ को पार्टी की मजबूती में बदलना. पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए वे सिर्फ एक नेता नहीं बल्कि अजित दादा की यादों और उनके अधूरे कामों का चेहरा बनेंगी. यह भावनात्मक जुड़ाव वोटर्स को बांधे रखने के लिए जोड़ की तरह काम कर सकता है.
सुनेत्रा पवार के सामने खड़ी ‘अग्निपरीक्षा’
पद संभालना आसान है लेकिन पद को बचाए रखना और अजित पवार जैसा रसूख कायम करना सुनेत्रा पवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी. उनके सामने ये बड़ी चुनौती होगी-
पार्टी को टूटने से बचाना
अजित पवार महाराष्ट्र की सियासत के एक ऐसे नेता थे जिनका अपने विधायकों पर सीधा कंट्रोल माना जाता था. उनके जाने के बाद सुनेत्रा पवार के लिए सबसे पहली चुनौती विधायकों को यह भरोसा दिलाना है कि उनके नेतृत्व में उनका राजनीतिक भविष्य सुरक्षित है. परिवार का नाम भले ही सुनेत्रा के साथ है लेकिन नेतृत्व की चमक उन्हें खुद पैदा करनी होगी.
विधायकों की खरीद-फरोश्त
महाराष्ट्र की राजनीति में विधायकों का पाला बदलना बहुत ही आम बात है. विरोधी दल भी इस मौके का फायदा उठाकर नाराज विधायकों को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर सकते हैं. सुनेत्रा पवार को न केवल अपने विधायकों को भावनात्मक रूप से पार्टी से जोड़े रखना होगा बल्कि उन्हें साम, दाम, दंड, भेद जैसी ताकत से भी बचाना होगा.
क्या होगा अगर दोनों ‘पवार गुट’ एक हो गए?
इसी बीत राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा तेजी से उठ रही है कि क्या अजित पवार की पार्टी और शरद पवार की पार्टी एक होगी? दोनों पार्टियां फिर से एक होती है तो महाराष्ट्र की पूरी राजनीतिक तस्वीर बदल सकती है, जैसे-
अगर दोनों गुट एक हो जाते हैं तो यह गठबंधन फिर वह चाहे महायुति हो या महाविकास अघाड़ी के भीतर पावर बैलेंस को पूरी तरह बदल देगा.
जमीनी स्तर पर जो कार्यकर्ता पार्टी के अलग होने पर बंट गए थे उनके एक होने से संगठन की ताकत दोगुनी हो जाएगी.
पवार परिवार का एक होना मराठा राजनीति में उनके दबदबे को और बढ़ा सकता है.
शरद पवार का साया और अपनी पहचान
अगर दोनों पार्टियां एक हो जाती हैं तो सुनेत्रा पवार को शरद पवार के अनुभव और कद के बीच अपनी स्वतंत्र पहचान बनानी होगी. क्या वे केवल एक कार्यवाहक नेता बनकर रहेंगी या फिर अजित पवार की तरह अपने कड़े फैसलों के लिए जानी जाएंगी? यह उनके राजनीतिक भविष्य को तय करेगा.
सिर्फ लहर नहीं, क्षमता की परीक्षा
सहानुभूति की लहर सुनेत्रा पवार को डिप्टी सीएम की कुर्सी दिला सकती है लेकिन यह लहर हमेशा नहीं रहती. राजनीति के इस समंदर में असली चुनौती तब आएगी जब लहरें शांत होंगी. उन्हें साबित करना होगा कि वे केवल अजित पवार की पत्नी के तौर पर नहीं बल्कि एक कुशल प्रशासक के तौर पर महाराष्ट्र का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं. आने वाले कुछ महीने सियासत में यह तय करेंगे कि पवार परिवार की यह नई पारी महाराष्ट्र की सत्ता को किस दिशा में ले जाती है
सत्ता और विपक्ष के लिए भी चुनौती?
विपक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी इमोशनल वेव जो अजित पवार के जाने के बाद पैदा हुई है. महाराष्ट्र की सियासत हमेशा से भावनाओं से प्रभावित हुई है. सुनेत्रा पवार को मिलने वाली सहानुभूति विपक्ष के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा सकती है. इसके साथ ही महाराष्ट्र के इतिहास में पहली बार किसी महिला को इतने बड़े पद पर बिठाकर महायुति ने आधी आबादी को साधने का मास्टरस्ट्रोक के जैसे इस्तेमाल कर सकता है जिसकी काट खोजना विपक्ष के लिए टेढ़ी खीर होगा.
सत्ता पक्ष के लिए क्या खतरा?
भले ही सुनेत्रा पवार अभी सत्ता पक्ष के साथ हैं लेकिन उनके बढ़ते कद से गठबंधन के सहयोगियों में भी बेचैनी हो सकती है. अगर सुनेत्रा पवार अपनी नेतृत्व क्षमता साबित कर देती हैं तो भविष्य में शरद पवार और उनके गुट के साथ एक होने से महायुति के अन्य दलों बीजेपी और शिंदे सेना के लिए समीकरण बिगड़ सकते हैं.
भारत की सियासत में कब कब सहानुभूति ‘गेमचेंजर’ बनी
1984: राजीव गांधी की प्रचंड जीत
भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी सहानुभूति वाली जीत 1984 में दिखी. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में शोक और गुस्से का माहौल था. जिसके बाद मात्र 40 वर्ष की उम्र में राजीव गांधी राजनीति में आए और कांग्रेस ने 542 में से 411 सीटें जीतीं. यह आज तक का सबसे बड़ा चुनावी रिकॉर्ड है.
1991: राजीव गांधी का निधन और कांग्रेस की वापसी
1991 के लोकसभा चुनावों के दौरान पहले चरण का मतदान हो चुका था और रुझान कांग्रेस के पक्ष में नहीं थे. लेकिन दूसरे चरण से पहले राजीव गांधी की हत्या हो गई. चुनाव के अगले चरणों में सहानुभूति की ऐसी लहर चली कि कांग्रेस ने बहुमत के करीब पहुंचते हुए पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में सरकार बनाई.
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आंध्र प्रदेश: वाईएसआर का निधन और जगन का उदय
2009 में मुख्यमंत्री वाई.एस. राजशेखर रेड्डी (YSR) के हेलीकॉप्टर क्रैश में निधन ने आंध्र प्रदेश को हिला कर रख दिया था. उनके बेटे जगन मोहन रेड्डी ने अपनी ओदारपू यात्रा यानी शोक संतप्त परिवारों से मिलने के जरिए इस दुख को राजनीतिक ताकत में बदल दिया. जगन ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई और 2019 में सहानुभूति और अपनी मेहनत के दम पर क्लीन स्वीप करते हुए मुख्यमंत्री बने.
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