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Supreme Court On Digital Arrest: डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों के रवैये पर सवाल खड़ा किया है. कोर्ट ने कहा कि बैंकों की मिलीगत या फिर उनकी लापरवाही के चलते ऐसे धोखाधड़ी भरे लेन-देन होते है. कई मामलो में बैंक अधिकारी फ्रॉड करने वाले लोगों से मिले रहते है. कोर्ट ने कहा कि गृह मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि डिजिटल फ्रॉड के ज़रिए 54 हज़ार करोड़ निकाले गए है. यह रकम सीधे तौर पर जनता के पैसों की डकैती है. यह कई राज्यों के बजट से भी ज़्यादा है. 

कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह RBI, बैंकों और दूरसंचार विभाग  जैसे संबंधित पक्षों से सलाह लेकर ऐसे मामलों से निपटने के लिए एक मानक प्रकिया (SOP) तैयार करे. कोर्ट ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों से निपटने और जहाँ संभव हो, वहाँ लोगों का खोया हुआ पैसा वापस दिलाने के लिए विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल  ज़रूरी है.

संदिग्ध लेन देन पर ग्राहकों को अलर्ट करें

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चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि बैंकों को हमेशा याद रखना चाहिए कि वो लोगों  की ओर से जमा की रकम के संरक्षक है. इस पैसे की सुरक्षा करना उनकी ज़िम्मेदारी बनती है. अगर उन्हें संदिग्ध लेन देन नज़र आए तो उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वो अपने ग्राहकों को समय रहते अलर्ट करें.

कोर्ट ने कहा कि अगर कोई रिटायर्ड व्यक्ति, जो आमतौर पर 10–20 हज़ार रुपये निकालता है , वो अचानक 25 लाख या 50 लाख रुपये का लेन-देन करने लगे, तो बैंक को तुरंत अलर्ट जारी करना चाहिए.

SOP देश भर में लागू करें

अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटारमणी ने कोर्ट को बताया कि RBI ने ऐसे मामलों से निपटने के लिए बैंकों के लिए एक मानक प्रक्रिया (SOP) पहले से तैयार की है, जिसके तहत संदिग्ध मामलों में खाते से पैसा निकालने पर अस्थायी रोक लगाई जा सकती है. कोर्ट ने गृह मंत्रालय को इस SOP को पूरे देश में लागू करने के निर्देश दिए.

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अदालतें बैंक की वसूली एजेंट बन गई

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि बैंक लोगों के पैसे की सुरक्षा से ज़्यादा अपने  मुनाफे पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं और इसी चलते अपराध से कमाए गए पैसों को आगे बढ़ाने का माध्यम बनते जा रहे हैं. 

चीफ जस्टिस ने कहा कि मुनाफा कमाने की होड़ में बैंक यह भूल रहे हैं कि वे जनता के पैसों के संरक्षक हैं. लोग भरोसे के कारण बैंक में पैसा जमा करते हैं, लेकिन अब बैंक जनता के लिए एक बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं. अदालतें बैंकों के लिए वसूली एजेंट की तरह काम कर रही हैं. बैंक लापरवाही से धोखेबाज लोगों को कर्ज़ देते हैं और फिर पैसा वसूलने के लिए NCLAT का सहारा लेते हैं.

पीड़ितो को मुआवजा दिया जाए

कोर्ट ने कहा है कि  RBI और  दूसरी संबंधित एजेंसी डिजिटल अरेस्ट मामलों में पीड़ितों को मुआवज़ा देने के लिए एक नीति तैयार करे.. कोर्ट ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट के पीड़ितों को मुआवज़ा देने में व्यावहारिक और उदार रवैया अपनाया जाना चाहिए. मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद तय की गई है.

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