Vande Mataram: देश का एक तबका जो राष्ट्रगीत गायन से दूरी बनाने के धार्मिक थ्योरी गढ़ता है. राष्ट्रगीत गायन से बचने के लिए अपने धार्मिक विश्वास को आगे कर देता है. वो अब सदमे में हैं, क्यों? क्योंकि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नए दिशानिर्देश जारी किए हैं कि अब राष्ट्रगीत गाना पड़ेगा. विशेष सरकारी कार्यक्रमों में वंदेमातरम का गायन अनिवार्य कर दिया गया है.
राष्ट्रगीत के सभी 6 अंतरे गाए जाएंगे
अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और अन्य आयोजनों में वंदे मातरम का गायन अनिवार्य है. अब राष्ट्रगीत के सभी 6 अंतरे गाए जाएंगे. राष्ट्रगीत गाने का समय भी तय कर दिया गया है अब 3 मिनट 10 सेकेंड वंदे मारतम का गायन पूरा करना होगा. अगर राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ साथ में गाए या बजाए जाएं, तो पहले वंदे मातरम गाया जाएगा. राष्ट्रगीत गायन के दौरान सावधान मुद्रा में खड़ा रहना होगा. सभी स्कूलों में दिन की शुरुआत राष्ट्रगीत से होगी.
वंदे मातरम के 150 साल हुई पूरे
इस साल वंदे मातरम के 150 साल पूरे हुए हैं. ये पहली बार है जब राष्ट्रगीत के गायन को लेकर विस्तार से प्रोटोकॉल जारी किया गया है. इस प्रोटोकॉल में कुछ चीजें रेखांकित करनी जरूरी है. पहले वंदे मारतम के दो छंद गाए जाते थे. लेकिन अब सभी 6 छंद गाना अनिवार्य होगा. राष्ट्रगान की तरह वंदे मारतम गायन का समय भी तय किया गया है. पहले समय तय नहीं था. अब राष्ट्रगीत गायन पर सावधान की मुद्रा में खड़ा होना. पहले ये अनिवार्य नहीं था.
पहले क्यों गाए जाते थे वंदे मारतम के 2 छंद?
पहले जब वंदे मारतम के 2 छंद गाए जाते थे तभी धार्मिक आवरण में इसका विरोध किया जाता था. अब सरकार ने राष्ट्रगीत के सभी 6 छंद के गायन को अनिवार्य कर दिया है तो सुनिए विरोध के सुर कैसे और तेज हो गए हैं. वहीं महात्मा गांधी ने कहा था कि वंदे मातरम बोलते ही खून में उबाल आ जाता है. यह गीत अहिंसा के साथ-साथ आत्मबलिदान की प्रेरणा देता है.
उस राष्ट्रगीत के विरोध में क्या तर्क दिए जा रहे हैं?
कोई स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की व्याख्या कर रहा है. कोई महंगाई, रोजगार के मुद्दे को वंदेमातरम से जोड़ रहा है. कोई अपनी धार्मिक पहचान के महत्व का महिमामंडन कर रहा है. मतलब राष्ट्रगीत के विरोध में अपनी-अपनी सुविधा के हिसाब से तर्क गढ़ लिए गए है. लेकिन इन दिखावटी तर्कों के पीछे मूल भावना धार्मिक है. ये भावना आज से नहीं है. धार्मिक आवरण में वंदेमातरम के विरोध का इतिहास जिन्ना वाली मुस्लिम लीग के जुड़ता है.
क्या हुआ साल 1937 में?
साल 1937 में जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग ने वंदे मातरम का विरोध किया था. 15 अक्टूबर 1937 को लखनऊ में मुस्लिम लीग के सम्मेलन में वंदे मातरम के खिलाफ प्रस्ताव पास हुआ था. उस प्रस्ताव में कहा गया था कि वंदेमातरम में मूर्तिपूजा और इस्लाम विरोधी भावनाओं का समावेश है. मुस्लिम लीग ने वंदे मातरम को राष्ट्रवाद के लिए हानिकारक बताया था. मुस्लिम लीग के विरोध के बाद 22 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने मूल गीत के छह पैरा में चार पैरा हटाने का फैसला लिया था.
कब से गाया जाता है अधूरा राष्ट्रगीत?
तब से आधा अधूरा राष्ट्रगीत ही गाया जा रहा है. हालांकि छोटी सोच वाले चंद कट्टरपंथियों की भावनाएं इससे भी आहत हो रही थी. आज भी वंदे मातरम के विरोध वाली मानसिकता में बदलाव नहीं आया है. सवाल ये है कि अब ये आहत भावना क्लब क्या करेगा. क्योंकि अब तो विशेष मौकों पर वंदे मातरम का गायन अनिवार्य कर दिया गया है.
क्या अफजाल अंसारी राष्ट्रगीत नहीं गाएंगे?
अगर संसद सत्र में राष्ट्रपति का अभिभाषण से पहले वंदेमातरम का गायन होगा तो क्या अफजाल अंसारी राष्ट्रगीत नहीं गाएंगे. एसटी हसन किसी सरकारी कार्यक्रम में शामिल हुए वहां वंदेमातरम का गायन हुआ तो क्या वो सावधान की मुद्रा में खड़े नहीं होंगे. स्कूलों में वंदेमातरम का गायन होगा तो आहत भावना गैंग क्या बच्चों को स्कूल नहीं भेजेगा. ये रोज राष्ट्रगीत के गायन के बाद भी बच्चों को स्कूल भेजेगा. ये सवाल बड़ा है, क्योंकि बार-बार ये नेता संविधान और नागरिक अधिकार की बात करते हैं.
कट्टरपंथियों को नहीं आती समझ
तंग दिमाग और बंद सोच वाले चंद कट्टरपंथियों को समझ नहीं आती. 14 अगस्त 1947 को संविधान सभा की पहली बैठक की शुरुआत इस गीत से हुई थी. वंदेमातरम का गायन सिर्फ एक गीत का गायन नहीं है. ये राष्ट्रगौरव का सम्मान है. स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान है. अपनी श्रेष्ठ परंपरा से जुड़ाव है. इसलिए अब सरकार ने विशेष अवसर पर वंदेमातरम गायन को अनिवार्य कर दिया है. जरूरत ये समझने की है कि राष्ट्रधर्म सबसे पहले आता है और राष्ट्रधर्म का पहला हर नागरिक का पहला कर्तव्य है.
