Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर दोहराया किया है कि आपसी सहमति से बने संबंधों के बिगड़ने की सूरत में उस हरेक केस में ‘शादी का झांसा देकर रेप’ नहीं माना जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि अदालतों को IPC की धारा 376(2)(n) के तहत दायर वास्तविक मामलों की पहचान करने में बहुत सावधान और सतर्क रहना चाहिए.
कोर्ट को सतर्क रहने की जरूरत
जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने कहा कि रेप का मामला तभी बन सकता है, जब यह साबित हो कि आरोपी ने सिर्फ सेक्सुअल रिलेशन के लिए सहमति पाने के मकसद से महिला से शादी का वादा किया हो जबकि उस वायदे को पूरा करने का उसका कोई इरादा न हो और इसी वादे के चलते महिला ने अपनी सहमति दी हो. सुप्रीम कोर्ट यही बात पुराने फैसलों में भी कह चुका है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोर्ट को यह देखना चाहिए कि कहीं उसके पास आया मुकदमा दो वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंध के बिगड़ने के चलते तो नहीं आया है.
प्रेमी के खिलाफ रेप की FIR खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर छत्तीसगढ़ की एक महिला वकील द्वारा पूर्व प्रेमी के खिलाफ रेप के आरोपों से जुड़ी FIR खारिज कर दी. इस केस में महिला पहले से शादीशुदा थी. उसका 10 साल का बच्चा भी था. कोर्ट ने कहा कि जब महिला के आरोपी के साथ संबंध बने तब भी उसके अपने पति के साथ तलाक की कार्यवाही लंबित थी. ऐसे में वो वो हिंदू मैरिज एक्ट के तहत दूसरी शादी नहीं कर सकती थी. यही बात महिला ने अपने प्रेमी को भी बता दी थी. इसलिए, मान भी लें कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा किया था, तब भी ऐसा वादा कानून मान्य नहीं था, क्योंकि शिकायतकर्ता स्वयं उस समय शादी करने के योग्य नहीं थी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस केस में महिला कोई भोली या नासमझ महिला नहीं है जो अपने फैसले खुद न ले सके. ऐसे में इस केस में शादी का झांसा देकर रेप का आरोप लगाना गलत है.
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आपसी सम्बंध बिगड़े तो पुलिस को घसीटना ठीक नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असल में यह दोनों पक्षों की सहमति से बने सम्बंध का मामला था जो बाद में बिगड़ गया. ऐसे मामलों में दोनों पक्षों को संयम बरतना चाहिए था और अपने निजी रिश्ते के बिगड़ने को आपराधिक मामला बनाकर पुलिस को इसमें नहीं घसीटना चाहिए था.
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