
आपको याद होगा 1990 के दशक में आतंकी घटनाएं बढ़ने से कश्मीर से बढ़ी संख्या में पंडितों का पलायन हुआ था. तब एक खतरा पैदा हो गया था कि चिनाब वैली में रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदू लोग चिनाब, डोडा आदि जगहों से पलायन न करने लगें. वहां भी मुस्लिम आबादी ज्यादा रहती है. ऐसे में एक अफसर ने रणनीति के तहत गांववालों को प्रशिक्षण देकर हथियार उपलब्ध कराए. इससे गांववालों में न सिर्फ सुरक्षा का भरोसा जगा बल्कि हथियार से ताकत भी मिली. अब एक बार फिर कश्मीर में सेना गांववालों को हथियार दे रही है. आखिर क्यों?
तब करीब 35 साल पहले विलेज डिफेंस कमेटियां बनाई गई थीं और गांववालों को हथियार देना शुरू किया गया था. Zee News के जम्मू-कश्मीर संवाददाता खालिद हुसैन ने जानकारी दी है कि यह पहल डीआईजी डोडा कुलदीप हुडा के दिमाग की उपज थी. उस इलाके का हिंदू समुदाय योद्धा ही रहा है. यहां से बड़ी संख्या में लोग फौज में थे. ऐसे में इन लोगों को हथियार देकर प्रशिक्षण दिया गया.
उन्होंने बताया कि 7-8 दिन की ट्रेनिंग हुई थी और थ्री नॉट थ्री बंदूक दी गई थी. हालांकि इस बार गांववालों को ऑटोमेटिक वेपंस दिए जा रहे हैं. हथियार वे अपने साथ, अपने घर में रख सकते हैं. हालांकि सबको ऑटोमेटिक हथियार नहीं दिए जा रहे हैं. जैसे 50 लोगों को हथियार दिया जा रहा है तो उसमें 2-3 भरोसे वाले लोगों को स्वचालित हथियार मिलेंगे, बाकियों को थ्री नॉट थ्री ही दिए जा रहे हैं.
Zee रिपोर्टर खालिद कहते हैं कि असल में खतरा भी रहता है. क्राइम के भी मामले भी सामने आ सकते हैं. ऐसे में जिन लोगों को हथियार दिए जा रहे हैं, उनकी पूरी तरह से जांच होती है. कठुआ, सांबा और उधमपुर वाले जो पूरे इलाके हैं, बैकवर्ड एरिया है. डोडा के जो इलाके पहाड़ी हैं और वहां हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग रहते हैं. हथियार देने की मुख्य वजह यह है कि आतंकियों का मूवमेंट हो तो स्थानीय लोग ही पहला एक्शन ले सकते हैं.
हमारे संवाददाता ने बताया है कि दो दिन पहले ही सांबा में एक ड्रोन दिखा तो गांव के किसी शख्स ने ही फायर किया था. बाद में फोर्स आई. अब गांव के लोगों को फिर से हथियार देकर सशक्त किया जा रहा है. पहले ये इलाके आतंकियों से मुक्त हो गए थे, अब थोड़ी हलचल बढ़ी है तो 1990 वाली रणनीति फिर से अपनाई जा रही है.
जी हां, डोडा जिले के गंडोह इलाके में आतंक विरोधी अभियानों को मजबूत करने के लिए सुरक्षा एजेंसियों ने गांव स्तर पर सुरक्षा ढांचे को मजबूत करना शुरू कर दिया है. इसी कड़ी में करीब 150 विलेज डिफेंस गार्ड्स (VDGs) को व्यापक गुरिल्ला युद्धक प्रशिक्षण दिया जा रहा है. यह प्रशिक्षण जम्मू-कश्मीर पुलिस और आर्मी के संयुक्त नेतृत्व में किया जा रहा है.
17 दुर्गम और पहाड़ी गांवों से आए पुरुष और महिला स्वयंसेवकों को ऑटोमैटिक राइफल चलाना, स्क्वॉड ड्रिल, माइनर टैक्टिक्स, अपनी रक्षा, बंकर बनाना और दुश्मन के हमलों को रोकने जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों की ट्रेनिंग दी जा रही है. ये सभी गांव घने जंगलों और ऊंचाई वाले इलाकों के पास बसे हैं, जहां इन दिनों सुरक्षा बल संदिग्ध आतंकी मूवमेंट के चलते व्यापक सर्च ऑपरेशन चला रहे हैं.
