News in Brief

Impact of Uddhav-Raj Alliance on Maharashtra Politics: करीब 20 साल तक अलग-अलग राजनीति करने के बाद ठाकरे बंधु यानी उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक बार फिर साथ आ गए हैं. अब इसे चाहे उनकी मजबूरी कहा जाए या बदलते समय की जरूरत, लेकिन उनका साथ आना महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा भूचाल ले आया है. इस नए गठबंधन से जहां बीजेपी के नेतृत्व वाला महायुति गठबंधन खुश है. वहीं महाविकास आघाड़ी (MVA) का पतन अब तय हो गया है. 

बीजेपी को हराने के लिए MVA का गठन

यह वही MVA है, जिसकी स्थापना उद्धव ठाकरे ने 2019 में कांग्रेस और शरद पवार की NCP के साथ मिलकर की थी. इसका मकसद बीजेपी को सत्ता से बाहर रखना था. इस गठबंधन ने करीब ढाई साल तक राज्य में सरकार भी चलाई थी.हालांकि 2022 में शिवसेना और NCP में बगावत के बाद दोनों पार्टियां टूट गईं. इस घटना ने MVA को बड़ा नुकसान पहुंचाया. 

Add Zee News as a Preferred Source

टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक, इस झटके के बावजूद MVA ने 2024 के लोकसभा चुनाव में MVA ने जोरदार वापसी की. उसने महाराष्ट्र की 48 में से 30 सीटें जीत लीं. हालांकि ये खुशी ज्यादा देर नहीं चल पाई. उसी साल हुए असेंबली चुनाव में MVA बुरी तरह हार गया. उसे चुनाव में 288 में से केवल 46 सीटें ही मिल पाईं. 

शरद पवार ने मौका देख बदल लिया पैंतरा

ऐसे में अब ठाकरे बंधु का एक साथ आना MVA के ताबूत में आखिरी कील ठोकने जैसा हो सकता है. हालांकि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है. इसका नजारा भी राज्य में दिख रहा है. असल में महाराष्ट्र की राजनीति के माहिर खिलाड़ी शरद पवार ने ठाकरे भाइयों के साथ जाने के संकेत दे दिया है. जबकि कांग्रेस इस नए गठजोड़ से बाहर नजर आ रही है. इसकी वजह ये है कि राज ठाकरे की पार्टी MNS उत्तर भारतीयों के खिलाफ सख्त बयान देती रही है. जिसकी वजह से कांग्रेस उसके साथ जाना नहीं चाहती.

ऐसे में अब सवाल उठता है कि कांग्रेस अब आगे क्या करेगी? उसकी पहली परीक्षा 15 जनवरी को होने वाली है. जब महाराष्ट्र में बीएमसी समेत 29 नगर निगमों के चुनाव होंगे. कांग्रेस के सामने अजीब स्थिति इस वजह से है कि हाल में राज्य में हुए नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों में बीजेपी के नेतृत्व वाला महायुति गठबंधन को बड़ी जीत मिली है. जबकि कांग्रेस इन चुनावों में प्रमुख विपक्षी पार्टी बनकर उभरी है. ऐसे में उसे अलग होने के बाद फायदे-नुकसान दोनों का डर सता रहा है. 

कांग्रेस के लिए कितना नफा-नुकसान?

कांग्रेस फिलहाल उम्मीद कर रही है कि ठाकरे बंधुओं से अलग होकर चुनाव लड़ने के बावजूद उसे खास नुकसान नहीं होगा. उसके नेताओं का मानना है कि राज ठाकरे से दूरी बनाकर वे अल्पसंख्यकों, दलितों और प्रवासी मतदाताओं का समर्थन पा सकेंगे. इसके साथ ही वह बीएमसी पर लंबे समय से काबिज रही उद्धव ठाकरे के नेता पब्लिक में पनपी नाराजगी से भी खुद को बचाना चाहती है. 

लेकिन इसके साथ ही कांग्रेस नेताओं को एक बड़ा डर भी सता रहा है. उसे आशंका है कि विपक्ष के दोफाड़ होने से इसका सीधा फायदा बीजेपी को हो सकता है. इन चुनौतियों को पार कर अगर वह निकाय चुनावों में अच्छा प्रदर्शन कर जाती है तो आने वाले असेंबली चुनाव में एक बड़ी ताकत बनकर उभर सकती है. वहीं अगर उसका प्रदर्शन पहले से खराब रहा तो उसकी राजनीति और सिकुड़ सकती है.