Indian Marriage Dispute: शादी का एक अनोखा लेकिन गंभीर मामला सामने आया है. एक पति-पत्नी ने शादी के बाद सिर्फ 65 दिन ही साथ बिताए लेकिन इसके बाद दोनों के बीच शुरू हुआ कानूनी झगड़ा पूरे 13 साल तक चलता रहा. इस दौरान दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ अलग-अलग अदालतों में करीब 40 केस दर्ज कराए थे.
क्या था मामला?
इस मामले में शादी जनवरी 2012 में हुई थी. शादी के 65 दिन बाद पत्नी ने पति का घर छोड़ दिया था. पत्नी ने पति और उसके परिवार पर प्रताड़ना के आरोप लगाए थे. तभी से दोनों अलग-अलग रह रहे हैं. दिल्ली व उत्तर प्रदेश की फैमिली कोर्ट और हाई कोर्ट में एक-दूसरे के खिलाफ कई केस करते रहे थे.
मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
यह मामला आखिरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. मंगलवार को जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने इस पूरे मामले पर सख्त टिप्पणी की है. अदालत ने कहा कि दोनों ने अदालतों को लड़ाई का मैदान बना लिया है. न्याय व्यवस्था पर बोझ डाला है. इसी वजह से कोर्ट ने पति और पत्नी दोनों पर 10-10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया.
सुप्रीम कोर्ट ने दिया तलाक
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए दोनों को तलाक दे दिया है. साथ ही यह भी साफ कहा कि अब दोनों एक-दूसरे के खिलाफ कोई नया केस दाखिल नहीं कर पाएंगे. कोर्ट ने आदेश दिया कि जुर्माने की राशि सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन में जमा कराई जाए.
अदालत ने क्या कहा
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जब पति-पत्नी में तालमेल नहीं हो और वे बार-बार मुकदमे करें तो इससे किसी का भला नहीं होता है. कोर्ट ने यह भी कहा कि इतने सारे केस दर्ज करना सिर्फ बदला लेने जैसा लगता है. जजों ने साफ शब्दों में कहा कि झगड़ते पति-पत्नी अदालतों का इस्तेमाल अपने झगड़े निपटाने के लिए नहीं कर सकते है.
मुकदमों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी
कोर्ट ने चिंता जताई कि पिछले कुछ सालों में वैवाहिक मामलों में मुकदमों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है. खास तौर पर ट्रांसफर याचिकाओं की भरमार है जिनमें अक्सर एक पक्ष दूसरे के केस को दूसरी जगह ले जाने की मांग करता है. अदालत ने कहा कि परिवार के लोगों को चाहिए कि मामला कोर्ट तक पहुंचने से पहले ही सुलझाने की कोशिश कर लें.
बातचीत या मध्यस्थता का रास्ता
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर शुरुआत में ही बातचीत या मध्यस्थता का रास्ता अपनाया जाए. इससे हालात इतने बिगड़ने से बच सकते हैं. हालांकि जब एक बार आपराधिक मामलों की शुरुआत हो जाती है तो फिर रिश्ते जुड़ने की संभावना बहुत कम रह जाती है.
अदालत ने आखिर में कहा कि समाज के हित में कोशिश यही होनी चाहिए कि शादियां बचें. अगर रिश्ता पूरी तरह टूट चुका हो और उसे जोड़ने की कोई उम्मीद न हो, तो बेहतर है कि समय रहते शादी खत्म कर दी जाए. ताकि दोनों पक्षों की परेशानी और लंबी कानूनी लड़ाई खत्म हो सके.
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