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नई दिल्ली: क्या धूम्रपान (Smoking) करने से कोरोना (Coronavirus) का खतरा कम होता है? आपने देखा होगा कि पिछले डेढ़ साल में इस तरह की कई स्टडी सामने आई हैं, जिनमें ये दावा किया गया है कि सिगरेट पीने वालों को दूसरे लोगों की तुलना में संक्रमण का खतरा कम होता है. एक अध्ययन में ये दावा भी किया गया है कि धूम्रपान करने वालों को अगर कोरोना हो भी गया, तब भी उनके अस्पताल जाने की नौबत नहीं आती. तो इन तमाम अध्ययन और शोध की सच्चाई क्या है? कहीं इसके पीछे सिगरेट बनाने वाली कंपनियां तो नहीं हैं? आज हम आपको यही बताएंगे.

इंडिया में 12 करोड़ लोग करते हैं धूम्रपान

तंबाकू का उत्पादन करने वाली सरकारी कंपनी ITC की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 12 करोड़ लोग धूम्रपान करते हैं. पूरी दुनिया में धूम्रपान करने वाले लोगों में से 12 प्रतिशत अकेले भारत में मौजूद हैं. ये स्थिति तब है जब धूम्रपान को लेकर टीवी पर कोई विज्ञापन भारत में प्रकाशित नहीं होता. फिल्मों में भी इसे लेकर कई तरह की सावधानियां बरती जाती हैं. उदाहरण के लिए अगर फिल्म के किसी दृश्य में धूम्रपान करते हुए दिखाया जाता है तो नीचे छोटे छोटे अक्षरों में ये चेतावनी लिखी होती है कि धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और इससे कैंसर से हो सकता है. और ये चेतावनी सिर्फ लोगों को डराने के लिए नहीं है.

हर साल 10 लाख मौतों का कारण सिर्फ तंबाकू

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की 2019 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर साल 10 लाख लोगों की मौत तंबाकू के सेवन से होती है. जबकि कोरोना वायरस से पिछले डेढ़ वर्ष में लगभग 3 लाख लोगों की मौत हुई है. अगर पूरी दुनिया की बात करें तो हर साल 80 लाख लोग धूम्रपान की वजह से मर जाते हैं. इनमें से 70 लाख लोग वो होते हैं, जो धूम्रपान करते हैं, और 10 लाख वो होते हैं, जो धूम्रपान नहीं करते लेकिन धूम्रपान करने वाले लोगों के सम्पर्क में रहते हैं. डॉक्टर इसे पैसिव स्मोकिंग (Passive Smoking) कहते हैं. क्योंकि इन लोगों के शरीर में धुआं जाता है, जिससे इनके फेफड़े कमजोर होते हैं.

लोगों को गुमराह कर रही सिगरेट कंपनियां?

धूम्रपान और तंबाकू के सेवन को बढ़ावा देना कानूनन अपराध भी है. लेकिन इसके बावजूद कई अध्ययन में बात कही गई है कि स्मोकिंग करने वालों को कोरोना का खतरा कम होता है तो इन तमाम स्टडी का सच क्या है? कहीं इन अध्यनों की मदद से सिगरेट बनाने वाली कंपनियां अपने लाभ के लिए आपको गुमराह तो नहीं कर रही हैं? इसे समझने के लिए आपको ब्रिटेन के एक मशहूर अखबार समूह द्वारा अप्रैल 2020 में प्रकाशित हुए उस आर्टिकल को पढ़ना होगा, जिसमें लिखा है कि 28 शोध ऐसा दावा करते हैं कि धूम्रपान करने वालों को कोरोना का खतरा कम होता है और अगर कोई व्यक्ति संक्रमित होता भी है तो उसके अस्पताल जाने की नौबत नहीं आती. 

28 में से 22 शोध सिर्फ चीन में ही हुई हैं

लेकिन इन सभी 28 स्टडी का सच क्या है? वो समझिए इनमें में 22 स्टडी सिर्फ चीन में हुईं. क्यों हुई. इसका भी कारण है? पूरी दुनिया में तंबाकू का सबसे ज्यादा उत्पादन चीन में होता है. चीन तंबाकू का वर्ल्ड लार्जेस्ट प्रोड्यूसर है. इसके अलावा चीन में तंबाकू का सेवन भी पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा होता है. दुनियाभर में हर तीन में एक सिगरेट चीन में ही पी जाती है. चीन में तंबाकू उद्योग वर्ष 2028 तक 929 बिलियन युआन यानी 10 लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा. अब आप खुद सोचिए कि क्या इन स्टडी पर आंखें बन्द करके विश्वास किया जा सकता है?

मशहूर मेडिकल जर्नल ने किया खुलासा

इसे आप एक और उदाहरण से समझ सकते हैं. हाल ही में मशहूर मेडिकल जर्नल यूरोपीय रेस्पिरेटरी जर्नल (European Respiratory Journal) में एक रिसर्च प्रकाशित हुई थी, जिसमें ये दावा किया गया था कि सिगरेट पीने वालों को कोरोना का खतरा कम होता है. पूरी दुनिया में इस रिसर्च को प्रमुखता से दिखाया गया. लेकिन अब इस मेडिकल जर्नल ने ये रिसर्च पेपर अपनी वेबसाइट से हटा लिया है. और पता है क्यों? क्योंकि इस रिसर्च पेपर के प्रकाशित होने के बाद इस मेडिकल जर्नल को पता चला कि इसे लिखने वाले 5 लेखकों में से दो लेखकों के संबंध तंबाकू उद्योग से जुड़ी बड़ी कंपनियों से थे. इन कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए इस तरह का रिसर्च पेपर छापा गया. सोचिए सिगरेट बनाने वाली कंपनियां अपने फायदे के लिए इस तरह की स्टडी करवाती हैं और लोग गुमराह होते हैं.

आपदा में भी कंपनी देख रही अपना फायदा

पूरी दुनिया में तंबाकू उद्योग 932 बिलियन डॉलर यानी 70 लाख करोड़ रुपये का है. जो वर्ष 2028 तक 1 हजार 73 बिलियन डॉलर यानी 80 लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा. यानी कई देशों की कुल GDP से भी बड़ा ये उद्योग हो जाएगा. अब आप खुद सोचिए कि अगर लोग कोरोना के डर से धूम्रपान छोड़ने लगेंगे तो क्या ऐसा मुमकिन हो पाएगा? ऐसा नहीं होगा. अगर तंबाकू उद्योग को नई ऊंचाइयों पर ले जाना है तो इन कंपनियों के लिए जरूरी है कि लोग धूम्रपान करते रहें. और वो धूम्रपान करना ना छोड़ें इसलिए इस तरह की स्टडी की मदद ली जाती है और लोग भ्रमित होते हैं. इसे आप कुछ और बातों से समझ सकते हैं.

रिसर्च पेपर को फंडिंग करती हैं कंपनियां

धूम्रपान से जुड़ी जिन 28 अध्ययन का जिक्र ब्रिटेन के एक अखबार समूह ने किया है, उनमें से 3 अध्ययन अमेरिका में हुए. दुनिया की सबसे बड़ी सिगरेट कंपनी फिलिप मॉरिस इंटरनेशनल (Philip Morris International) अमेरिका की ही एक कंपनी है. इस कंपनी पर इस तरह के कई आरोप लग चुके हैं कि ये मेडिकल रिसर्च को फंड करती है और लोगों को गुमराह करती है. इसे कुछ उदाहरणों से समझिए.

वर्ष 1970 में इस कंपनी ने जर्मनी में एक रिसर्च लैबोरेट्री खरीदी. फिर वर्ष 1972 में एक कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया, जिसका मकसद था धूम्रपान के समर्थन में लोगों की राय बनाना. इसके बाद वर्ष 1988 में इस कम्पनी के द्वारा CIAR यानी द सेंटर फॉर इनडोर एयर रिसर्च का गठन किया. CIAR के गठन का मकसद था तंबाकू से जुड़े ऐसे विश्वयनीय अध्ययन और रिसर्च को फंड करना और स्पोंसर करना, जिससे इस कंपनी को लाभ होता हो. जब CIAR को खत्म किया गया तो इस कंपनी ने दूसरे नाम से एक और संस्था का गठन किया, जिसका काम भी यही था.

1981 में हुई थी पैसिव स्मोकिंग की रिसर्च

अगर कुछ वर्ष पीछे जाएं तो ऐसी कई घटनाएं मिलती हैं, जिनसे पता चलता है कि तंबाकू कंपनियों ने अपने फायदे के लिए वैज्ञानिक अध्ययनों में भी हेरफेर किए हैं. जैसे धूम्रपान का चलन जब काफी बढ़ गया और इस तरह की रिसर्च आईं कि धूम्रपान से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है तो इन वैज्ञानिक अध्ययनों को बड़ी तंबाकू कंपनियों ने निशाना बनाया. वर्ष 1981 में डॉक्टर ताकेशी हिरयामा (Takeshi Hirayama) द्वारा एक अध्ययन किया गया था, जिसमें बताया गया था कि पैसिव स्मोकिंग यानी धूम्रपान के दौरान पास में खड़े रहने से और उसका धुआं अन्दर लेने से लंग कैंसर हो सकता है.

फायदे के लिए विज्ञान का गलत इस्तेमाल

पैसिव स्मोकिंग को लेकर ये दुनिया का सबसे विश्वसनीय अध्ययन है और आज भी बड़े-बड़े वैज्ञानिक अपने रिसर्च पेपर में इस स्टडी का उल्लेख करते हैं. ऐसा माना जाता है कि इसे स्टडी से तंबाकू उद्योग को काफी नुकसान हुआ. हालांकि इस स्टडी को भी इन कंपनियों ने झूठलाने की कई कोशिशें की. जैसे- एक रिसर्च पेपर प्रकाशित हुआ था, जिसमें ये दावा किया गया कि पैसिव स्मोकिंग से कैंसर नहीं होता. हालांकि बाद में पता चला कि इस रिसर्च पेपर को कोविंगटन और बर्लिंग (Covington & Burling) नाम की एक लॉ फर्म से फंडिंग मिली थी, जो तंबाकू कंपनियों के लिए काम करती है. ये अमेरिका की एक बड़ी लॉ फर्म है. दुनिया इसे Manipulation of Science यानी अपने स्वार्थ के लिए विज्ञान के साथ हेराफेरी. और ऐसा सिर्फ तंबाकू कंपनियां ही नहीं करती हैं. बल्कि कई बड़ी कंपनियां विज्ञान का गलत इस्तेंमाल करके और प्रायोजित रिसर्च करा के लोगों को गुमराह करती हैं. इसे भी आप कुछ उदाहरणों से समझिए. 

कोका कोला कंपनी ने भी की यही हरकत

कोका कोला (Coca Cola) ने एक ऐसे रिसर्च पेपर को फंड किया था, जिसमें ये बताया गया था कि व्यायाम करने से ही लोग अपना वजन घटा सकते हैं. सॉफ्ट ड्रिंक (Soft Drinks) से वजन का कोई लेना देना नहीं है. इसके अलावा हेल्थ ड्रिंक (Health Drink) बनाने वाली एक अमेरिकी कंपनी ने एक रिसर्च पेपर को प्रकाशित करवाया, जिसमें ये कहा गया था कि इस कंपनी की ड्रिंक पीने से दिल की बीमारियां नहीं होती. हालांकि बाद में पता चला कि इस कंपनी ने ये वैज्ञानिक शोध छपवाने के लिए 35 मिलियन डॉलर यानी 265 करोड़ रुपये खर्च किए थे.

इसी तरह डेरी इंडस्ट्री (Dairy Industry) से जुड़ी कंपनियों ने इस तरह की रिसर्च को फंड किया, जिनमें ये बात कही गई कि दूध और चीज के सेवन कोलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता. इसके अलावा शराब बनाने वाली कंपनियों ने वैज्ञानिकों के सहारे इस तरह की रिसर्च प्रकाशित करवाईं कि रेड वाइन दिल के लिए अच्छी होती है. यही नहीं कच्चे तेल का उत्पादन करने वाली कंपनियां भी पैसों के बल पर इस तरह की रिसर्च छपवा चुकी हैं, जो कच्चे तेल से ग्लोबल वॉर्मिंग के खतरे को गलत बताती हैं.

आंख मूंदकर विश्वास करना अब बंद कीजिए

सरल शब्दों में कहें तो बड़ी कंपनियां नहीं चाहती कि उनकी मुनाफा रुके और इसीलिए वो विज्ञान का सहारा लेती हैं. आज धूम्रपान को लेकर भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. धूम्रपान करने वाले लोगों को ऐसी प्रायोजित रिसर्च गुमराह करती हैं और उन्हें झूठी तसल्ली देती हैं. इसीलिए आज हम आपसे ये कह रहे हैं कि इन तमाम रिसर्च पर आपकों आंखें बन्द करके विश्वास नहीं करना है. हम आपको ऐसे दो कारण बताते हैं, जो इन स्टडी पर गम्भीर प्रश्न खड़े करते हैं.

पहला कारण- ज्यादातर अध्ययन में सैम्पल साइज बहुत छोटा है. अगर किसी अध्ययन को पूरी दुनिया के लिए आधार माना जाता है तो जरूरी है कि उस अध्ययन में सभी जेंडर, उम्र, देश, धर्म, जाति और सभी तबके के लोगों को शामिल किया जाए. जबकि ऐसा बहुत कम होता है. सोचिए एक रिसर्च अमेरिका में 500 लोगों पर हुई, जो कहती है कि धूम्रपान से कोरोना नहीं होता. तो यहां ये समझना जरूरी है कि 500 लोगों के सैम्पल साइज से भारत के 135 करोड़ लोगों को ये नहीं कहा जा सकता कि धूम्रपान कोरोना में लाभकारी है. ये हानिकारक है.

रिसर्च में शामिल अधिकतर लोग पश्चिमी देश के

दूसरा कारण- ज्यादातर रिसर्च WEIRD सैम्पल्स आधारित होती हैं. वीयर्ड का अर्थ है, वेस्टर्न, एजुकेशन,इंडस्ट्राइलाइज, रिच और डोमेस्टिक सोसाइटी. यानी इन रिसर्च में जिन लोगों को शामिल किया जाता है उनमें अधिकतर पश्चिमी देशों से होते हैं. 2006 से 2010 के बीच साइकोलॉजी जर्नल (Psychology Journals) द्वारा प्रकाशित की गई एक रिपोर्ट में बताया गया है कि इन रिसर्च में 90 प्रतिशत वॉलेंटियर्स ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूरोप, अमेरिका और न्यू ज़ीलैंड से होते हैं. अफ्रीका, एशिया, मध्य और दक्षिण अमेरिका और पश्चिम एशिया से सिर्फ 3 वॉलेंटियर हिस्सा ले पाते हैं.

सरल शब्दों में कहें तो जिन स्टडी के बारे में आप पढ़ कर आप खुश होते हैं कि आपको कोरोना नहीं होगा क्योंकि आप धूम्रपान करते हैं तो ये स्टडी तंबाकू कंपनियों से प्रभावित भी हो सकती हैं. इसलिए इन पर आंखें बन्द करके विश्वास ना करें.

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