
DNA Analysis: क्या सरकार प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई भी एक खास नजरिए से करती है. क्या प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई भी तुष्टीकरण वाले एंगल से होती है. अब हम इसी खास नजरिए का विश्लेषण करेंगे. बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हो रही हिंसा के खिलाफ पूरे देश में आक्रोश है. देशभर में लोग सड़क पर उतर कर हिंदुओं को निशाना बनाए जाने पर अपनी नाराजगी जता रहे हैं. जिस तरह बांग्लादेंश में हिंदुओं को चुन-चुन कर निशाना बनाया जा रहा है, पहचान कर उनके घरों में आग लगाई जा रही. उसके खिलाफ आज देश के कई राज्यों में लोग सड़क पर उतरे. प्रदर्शन देशभर में हुए, लेकिन प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज सिर्फ पश्चिम बंगाल में हुआ. सही सुना आपने हिंदुओं के खिलाफ हो रही हिंसा का विरोध करने उतरे प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज हुआ. इसलिए आज खबर प्रदर्शन नहीं प्रदर्शनकारियों पर हुआ लाठीचार्ज है.
प्रदर्शन में साधु संत
इस प्रदर्शन में पश्चिम बंगाल के आम लोग थे. साधु-संत थे. वो सिर्फ कोलकाता में बांग्लादेश के डिप्टी हाई कमीशन को अपना विरोध दर्ज कराना चाहते थे. लेकिन ममता बनर्जी की पुलिस ने पहले उन्हें रोका और फिर लाठीचार्ज किया. भगवा पहने एक संत पुलिसवालों के सामने हाथ जोड़ रहे थे. शायद वो पुलिसवालों को कहना चाहते हैं हमारी बात सुन लिजिए. हम यहां उपद्रव करने नहीं आए हैं. सिर्फ अपनी बात बांग्लादेश के राजनयिकों तक पहुंचाने आए हैं. सोचिए जिन संतों के सामने सनातनधर्मी आस्था से हाथ जोड़ते हैं वो संत पुलिस के सामने हाथ जोड़ रहे हैं. साधु-संत पुलिस के सामने हाथ क्यों जोड़ रहे थे. सिर्फ इसलिए क्योंकि वो अपने आक्रोश से बांग्लादेश के राजनयिकों को परिचित करा सकें. लेकिन ममता बनर्जी की पुलिस ने क्या किया, उनपर लाठी चलाया. चुन-चुन कर संतों को निशाना बनाया गया. हम फिर दोहरा रहे हैं आज खबर प्रदर्शन नहीं है. क्योंकि प्रदर्शन तो देश में होते ही है. आज खबर प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज है. सोचिए भगवा पहने संतों पर लाठीचार्ज का आदेश किसने दिया होगा. किसे युनूस सरकार के खिलाफ हो रहा प्रदर्शन चुभा होगा, वो कौन है जो नहीं चाहता की बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या और उनके घर जलाने के खिलाफ लोगों का आक्रोश सड़क पर दिखे.
लाठीचार्ज क्यों?
सोचिए प्रदर्शन को रोकने और प्रदर्शनकारियों पर लाठी चलाने का आदेश कहां से आया होगा और जिसने भी ये आदेश दिया होगा उसका एजेंडा क्या होगा. आज यही सवाल प्रमुख है. अब जो हम बताने जा रहे है उसे ध्यान से समझिए. कोलकाता में इसी साल मार्च से लेकर अक्टूबर तक गाजा के समर्थन में कई प्रदर्शन हुए. प्रदर्शन में गाजा समर्थक कथित लिबरल और गाजा के वैचारिक बंधु कट्टरपंथियों की भीड़ उमड़ती थी. कोलकाता में ट्रैफिक थम जाता था. भड़काऊं नारेबाजी और बवाल भी हुआ. लेकिन पुलिस ने लाठीचार्ज नहीं किया. सोचिए आखिर ऐसा क्यों हुआ होगा. अगर प्रदर्शनकारियों को कंट्रोल करना, हंगामा रोकना की पुलिस का मकसद था तो गाजा समर्थकों के प्रदर्शन पर भी लाठीचार्ज करना चाहिए था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. फिर साधु संतों पर लाठीचार्ज क्यों हुआ. समझिए. लाठीचार्ज का फैसला एजेंडा देखकर हुआ. ममता बनर्जी सरकार ने एजेंडा देखकर ये फैसला किया की किसपर लाठीचार्ज करना है और किसपर लाठीचार्ज नहीं करना है. इसलिए मोहम्मद युनूस की सरकार की हिंदू विरोधी नीतियों के खिलाफ प्रोटेस्ट कर रहे साधु-संतों और हिंदूओं पर तो लाठीचार्ज होता है. लेकिन गाजा को लेकर कोलकाता में उपद्रव कर रहे कथित लिबरल और कट्टरपंथियों के सामने पुलिस विनम्र नजर आती है.
साधुओं पर लाठीचार्ज
हमारी लोकतंत्रिक व्यवस्था में देश के सभी नागरिकों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है. यानी कोई भी व्यक्ति तय नियम का पालन करते हुए प्रदर्शन कर सकता है. इस नियम को बंगाल पुलिस तब तो मानती है जब वक्फ प्रेमी लोग सड़क पर उतरते हैं. लेकिन जैसे ही हिंदुओं का प्रदर्शन शुरू होता है. भीड़ ज्यादा दिखती है तो बंगाल पुलिस डंडे भांजने लगती है. साधु-संतों पर लाठीचार्ज और एक खास वर्ग के प्रदर्शनकारियों पर नरमी. इससे पुलिस और पुलिस को कंट्रोल करनेवाली सरकार का नजरिया समझा जा सकता है. पश्चिम बंगाल सरकार का ये विशेष एकपक्षिय नजरिया पहली बार नहीं दिखा है. हाल के दिनों में अनेकों बार ये विशेष एकपक्षीय नजरिया दिखा है. इसी साल अप्रैल के महीने में पश्चिम बंगाल में वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ पश्चिम बंगाल में उग्र प्रदर्शन हुए थे. किसी एक शहर में नहीं पूरे पश्चिम बंगाल में हिंसक प्रदर्शन हुए थे. आपको जानकर आश्चर्य होगा की वक्फ कानून के खिलाफ हुए प्रदर्शन के दौरान भी पश्चिम बंगाल की पुलिस विनम्र बनी रही. प्रदर्शनकारियों को उपद्रव की खुली छूट थी. पुलिस मूकदर्शक बनी रही.
पुलिस का रवैया
मुर्शिदाबाद में तो उपद्रवियों ने जो हंगामा किया उसे पूरे देश ने देखा. जब पूरा मुर्शिदाबाद आग की लपटों में झुसलने लगा तब पुलिस का एक्शन दिखा. यहां हम आपको ममता बनर्जी की पुलिस के इस विशेष एकपक्षीय नजरिए पर थोड़ा विस्तार से जानकारी शेयर करते हैं. अप्रैल के महीने में वक्फ कानून के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों ने दक्षिण 24 परगना के अमताला में पुलिस की गाड़ी में तोड़फोड़ की. पता है पुलिस ने क्या किया. लाठी नहीं चलाई, रबर की गोलियां या आंसू गैस गोले नहीं चलाए. पुलिसवाले चुपचाप खड़े रहे. विनम्रता की प्रतिमूर्ति बने रहे. वहीं अगस्त के महीने में जब कोलकाता में नबन्ना अभियान वाला प्रदर्शन हुआ तब ममता बनर्जी की उसी पुलिस ने लाठियां चलाई, प्रदर्शनकारियों को पीटा. सोचिए जहां प्रदर्शनकारी हमला कर रहे थे, वहां पुलिस खामोश रहती है और जहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन होता है वहां पुलिस लाठी चलाती है. आखिर ऐसा क्यों होता है. ये एकबार नहीं हुआ. दक्षिण 24 परगना जिले के भांगर में अप्रैल के महीने में वक्फ कानून के खिलाफ हुए प्रदर्शन में इसी पश्चिम बंगाल पुलिस पर ईंट-पत्थर फेंके गए. पुलिसवालों पर हमला हुआ. पुलिसवालों ने क्या किया, शांत बने रहे. एकदम पत्थर की मूर्ति की तरह बिना किसी भाव के ख़ड़े रहे. लेकिन उसी पश्चिम बंगाल में डायमंड बार्डर के सतगछिया में जब बांग्लादेश में हिंदुओं पर हिंसा के खिलाफ प्रदर्शन हुआ तो पश्चिम बंगाल की पुलिस फिल्मी सिंघल बन गई. प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया गया. मुर्शिदाबाद, दक्षिण 24 परगना, कोलकाता और दूसरे भी कई शहर हैं. पश्चिम बंगाल पुलिस के इस एजेंडा देखकर किए गए लाठीचार्ज की लिस्ट लंबी है. समय कम है इसलिए हमने आपको सिर्फ चुनिंदा घटनाएं ही बनाई. ये घटनाएं साफ-साफ बताती हैं कि पश्चिम बंगाल में पुलिस हालात देखकर, हिंसक प्रदर्शन को देखकर या हिंसा की आशंका से प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई नहीं करती है. पुलिस एजेंडा देखकर कार्रवाई करती है.
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पुलिस पर सवाल
श्री रामकृष्ण परमहंस ने कहा है कि आध्यात्मिकता अपने आप विनम्रता की ओर ले जाती है. जब फूल फल बनता है, तो उसकी पंखुड़ियां अपने आप गिर जाती हैं. जब व्यक्ति आध्यात्मिक बनता है, तो अहंकार धीरे-धीरे अपने आप विलीन हो जाता है. आज कोलकाता में जब भगवा वस्त्र पहने एक साधु ने पुलिसवालों के सामने हाथ जोड़ा तो ये उनकी विनम्रता थी. ये आध्यात्मिकता की ताकत थी. ये साक्ष्य था कि सनातन का भाव सद्भाव है. लेकिन विनम्रता को समझने के लिए जो समझदारी चाहिए शायद वो पश्चिम बंगाल प्रशासन के पास नहीं है. इस तस्वीर में वही पश्चिम बंगाल की पुलिस उपद्रवियों के सामने नतमस्तक नज़र आ रही है. ये वही उपद्रवी हैं जो वक्फ कानून के खिलाफ सड़क हंगामा कर रहे थे. यही पश्चिम बंगाल सरकार का एजेंडावादी चेहरा खुलकर सामने आ जाता है. ममता बनर्जी की पुलिस विनम्र सनातनी संत पर तो लाठीचार्ज करती है. लेकिन कट्टरपंथी उपद्रवियों के सामने नतमस्तक हो जाती है. यानी पश्चिम बंगाल में पुलिस की लाठी हिंदू-मुसलमान का फर्क करती है. समझिए हिंदू-मुसलमान में फर्क करनेवाला ये नजरिया ऊपर से नीचे की तरफ आता है. अगर सरकार की सोच में हिंदू-मुसलमान नहीं होता तो शायद पुलिस को भगवा पहने संत की विनम्रता और कट्टरपंथियों के उपद्रव में फर्क नजर आता. तब यकीनन पुलिस संत के सामने नतमस्तक होती और उपद्रवियों पर लाठीचार्ज करती.
