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Atal Bihari Vajpayee: पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी का मानना था कि राजनीति में विरोधी केवल शत्रु नहीं होते बल्कि मित्र भी हो सकते हैं. तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके बाजपेयी ने हमेशा विपक्षी दलों से सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने को प्राथमिकता दी थी. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी का मानना था कि राजनीति में विपक्ष केवल प्रतिद्वंद्वी होते हैं, शत्रु नहीं. उनका मानना था कि लोकतंत्र में विचारों का अंतर होना स्वाभाविक है लेकिन देश की स्थिरता और विकास के लिए संवाद और सहयोग आवश्यक हैं. उनका यह दृष्टिकोण भारतीय लोकतंत्र की स्थिरता और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण था. बाजपेयी का यह मानना था कि सरकारें आती जाती रहती हैं लेकिन लोकतंत्र और देश को हमेशा जीवित रहना चाहिए.

 सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण नहीं होना चाहिए: अटल बिहारी बाजपेयी

बाजपेयी का यह विचार 28 मई, 1996 को उनके द्वारा लाए गए विश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान स्पष्ट रूप से सामने आए थे. इस बहस में उन्होंने बताया था कि भाजपा ने हमेशा संकटों के समय विपक्षी दलों का सहयोग किया है. उन्होंने विशेष रूप से कांग्रेस के तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव का उदाहरण दिया था और कहा था कि जब उन्होंने उन्हें संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में भारत का दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के लिए भेजा था तो वो पाकिस्तानियों के लिए चौंकाने वाला था.

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बाजपेयी ने विश्वास प्रस्ताव पर अपने जवाब में कहा था कि देश में सांप्रदायिक या जातिगत आधार पर ध्रुवीकरण नहीं होना चाहिए. राजनीति को दो गुटों में विभाजित नहीं किया जाना चाहिए, जहां आपस में कोई संवाद न हो. उन्होंने यह भी कहा था कि सरकारों के बीच हमेशा संवाद और सहयोग की आवश्यकता होती है ताकि देश की समस्याओं का समाधान निकाला जा सके.

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अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए उन्होंने कहा था कि राजनीति का खेल चलता रहेगा, सरकारें आती जाएंगी, लेकिन लोकतंत्र हमेशा कायम रहना चाहिए. यह टिप्पणी आज भी वर्तमान की राजनीतिक में प्रासंगिक है, जहां सत्ताधारी भाजपा और मुख्य विपक्षी कांग्रेस पार्टी के बीच तीव्र प्रतिद्वंद्विता और व्यक्तिगत हमलों का सिलसिला देखने को मिलता है.