यूपी में इन दिनों एक ब्राह्मण भोज की बड़ी चर्चा है. इतनी कि दिल्ली तक लोग बातें कर रहे हैं. बढ़ती सर्दी में एक रोज भाजपा के 40 एमएलए और एमएलसी देर रात डिनर में साथ क्या बैठे, कई तरह के सवाल पैदा हो गए. लखनऊ की इस भोज पार्टी में ज्यादातर नेता ब्राह्मण समुदाय से थे. यूपी की सियासत गरमा गई. विधानसभा सत्र के बीच ब्राह्मण नेताओं का जुटना कई तरह के मैसेज देने लगा. ब्राह्मणों की नाराजगी, ब्राह्मण vs ठाकुर, ब्राह्मणों के मन में क्या है, ऐसी तमाम बातें. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी इस तरह की बैठक से नाराज दिखे. उन्होंने पार्टी के सभी नेताओं से कास्ट पॉलिटिक्स से दूर रहने की नसीहत दी. यह सब ऐसे समय में हो रहा जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद लखनऊ जाकर पार्टी के तीन दिग्गज नेताओं- पंडित दीनदयाल उपाध्याय, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की विशाल प्रतिमाओं का अनावरण करते हैं. यह संयोग ही कहा जाएगा कि तीनों ब्राह्मण समुदाय से आते हैं.
भोज का मुद्दा गरमाया तो भाजपा की स्टेट लीडरशिप ने मैसेज दिया है कि ऐसी जातिगत बैठक भविष्य में नहीं होनी चाहिए. हालांकि भोज में गए नेता कहते रहे कि यह अनौपचारिक बैठक थी. विपक्ष ने इसमें यह कहकर तड़का लगाया कि पार्टी के ब्राह्मण विधायकों के बीच ‘नाराजगी’ है. विपक्षी नेता कहने लगे कि ब्राह्मण नेता अपने भविष्य के बारे में सोच रहे हैं, प्लान बनाने के लिए साथ आना पड़ा. यह बैठक शाम 7 बजे के आसपास शुरू हुई थी और आधी रात तक चली. भाजपा में ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय की पॉलिटिक्स नई बात नहीं है. अक्सर इसकी चर्चा होती रहती है. जब योगी आदित्यनाथ पहली बार सीएम बने तो दिनेश शर्मा का डिप्टी बनाया जाना, दूसरी बार बृजेश पाठक को डिप्टी बनाने को इसी समीकरण से जोड़ा गया था.
तब क्षत्रिय विधायक बैठे थे
अब नए विवाद पर कोई खुलकर तो नहीं बताएगा कि क्या बात हुई और क्यों? गौर करने वाली बात यह है कि इसी तरह की क्षत्रिय विधायकों की जुटान लखनऊ में मॉनसून सत्र के दौरान हुई थी. अखिलेश यादव ने इशारे में लिट्टी-चोखा पर चुटकी ली. उधर, यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि लखनऊ में जब सभी नेता होते हैं तो ऐसी बैठकें होती हैं इसे जाति से नहीं जोड़ना चाहिए. पिछले 10 वर्षों में मोदी-शाह के दौर में उभरी भाजपा ने कुछ हद तक जातीय राजनीति को सीमित तो किया है. हालांकि एक तबका आज भी विकास की जगह जाति देखकर ही वोट करता है. कम से कम यूपी-बिहार में यह समीकरण अंदरखाने भाजपा भी सेट करती है.
भाजपा राज में ‘बाटी-चोखा’ भी नहीं केवल ‘माटी-धोखा’ खाने को मिलता है।
अब बात ‘हाता नहीं भाता’ से बहुत आगे निकल गयी है।
जब बात उपेक्षा से तिरस्कार तक पहुँच जाती है तो कोई भी समाज सह नहीं पाता है। ‘सत्ता’ अथवा ‘मान’, जब केवल ये ही दो विकल्प शेष रह जाते हैं तो स्वाभिमानी समाज…
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) December 25, 2025
भोज की मेजबानी करने वाले विधायक पीएन पाठक ने मौर्य की बात दोहराई. बोले- यह सिर्फ एक कम्युनिटी डिनर था. सब लोग साथ बैठकर लिट्टी-चोखा खाना चाहते थे इसलिए मैंने उन्हें बुलाया था. हमने राज्य में चल रहे SIR और अपने इलाकों में विकास के कामों पर चर्चा की. हम सब राज्य सरकार के काम से संतुष्ट हैं. पाठक कुशीनगर का प्रतिनिधित्व करते हैं.
उधर, डिनर में जाने का दावा करने वाले विधायक अनिल त्रिपाठी ने कहा, ‘हम वहां करीब चार घंटे तक थे. सामाजिक और राजनीतिक दोनों मुद्दों पर चर्चा हुई. हमारी सबसे बड़ी चिंताओं में से एक यह थी कि हमारे समुदाय ने राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है लेकिन आज ब्राह्मण समाज के लोगों को समाज में अपमानित किया जा रहा है.’ आगे उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह एक सामाजिक और आम चिंता थी, इसका सरकार के कामकाज से कोई लेना-देना नहीं है. सपा के प्रवक्ता क्या तंज कस रहे है, वह नीचे पढ़िए और सुनिए.
ब्राह्मण विधायकों ने इकट्ठा होकर अपना दुःख-दर्द साँझा किया एक-दूसरे से अपना रोना रोया, कि दरोगा कोतवाल नही सुन नहीं रहे, सरकार में अपमानित हो रहे है तथा जनता के कार्य नहीं हो पा रहे हैं, अपनी वेदनाओं को व्यक्त किया। तो ये बात ऊपर के लोगों को बहुत बुरी लगी और अब ब्राह्मण विधायक… pic.twitter.com/Qkek8M4nAc
— Pawan Pandey (@pawanpandeysp) December 26, 2025
मीडिया रिपोर्ट, विपक्ष, सोशल मीडिया पर कहा जा रहा है कि ब्राह्मणों को लगता है कि उनकी सुनवाई नहीं हो रही है. खैर, ज़ी न्यूज उत्तर प्रदेश के एडिटर रमेश चंद्र यूपी में ब्राह्मण वोटबैंक को महत्वपूर्ण बताते हुए कहते हैं कि यूपी एक ऐसा राज्य है जहां ब्राह्मण निर्णायक भूमिका निभाते हैं. उनकी संख्या अच्छी खासी है. दर्जनों विधानसभाओं में ब्राह्मण समुदाय ही जीत हार का फैसला करता है. पहले भी बहुगुणा, एनडी तिवारी से लेकर दिनेश शर्मा, ब्रृजेश पाठक तक सीएम-डिप्टी सीएम ब्राह्मण होते रहे हैं. जहां तक इस मीटिंग की बात है तो अलग-अलग बातें कही जा रही हैं. जो लोग बैठक में गए थे वे कह रहे हैं ब्राह्मण बच्चों को संस्कारी बनाने जैसे सामाजिक मसलों पर चर्चा हुई. कहा गया कि इसमें कोई रुकावट नहीं थी. कोई भी आ सकता था.
यूपी में ब्राह्मण पॉलिटिक्स
यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि पीएम ने लखनऊ आकर योगी सरकार की जमकर तारीफ की है. अब यह समझना जरूरी है कि यूपी की चुनावी राजनीति में ब्राह्मण असल में कितना दखल रखते हैं. यह समुदाय भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग और चुनावी जीत के लिए एक अहम रोल अदा करता है. दावा किया जाता है कि 60 से लेकर 150 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण वोटबैंक जीत हार तय करता है. इसमें भी अवध और पूर्वांचल बेल्ट में ब्राह्मण हावी हैं.
भाजपा के साथ जाने की वजह
यह समुदाय पहले कांग्रेस को वोट देता रहा. सतीश मिश्रा फैक्टर के चलते बसपा को भी वोट दे आया. राम मंदिर आंदोलन के बाद भाजपाई हुआ तो जुड़ता ही गया. एक रिपोर्ट के मुताबिक 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को करीब 80-82 प्रतिशत ब्राह्मणों का वोट मिला था. यह समुदाय प्रभावशाली नरैटिव बनाने की भी ताकत रखता है. ब्राह्मण समुदाय राष्ट्रवाद, 370, आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख, संघ से वैचारिक जुड़ाव के कारण भाजपा को वोट देता आ रहा है.
भाजपा का संतुलन
बीजेपी की रणनीति में हर जाति को साधने और संतुलन बनाने की रहती है. उसका नारा भी है- सबका साथ, सबका विकास. इसे बनाए रखने के लिए भाजपा सरकार और संगठन में ब्राह्मणों को महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व देती रही है. डिप्टी सीएम ब्राह्मण बनाया तो कई जिलों के अध्यक्ष भी.
