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DNA Analysis: अमेरिकी रक्षा विभाग के मुताबिक इस ऑपरेशन में इस्लामिक स्टेट और उससे जुड़े गुटों के 20 से ज्यादा आतंकी मारे गए हैं और हथियारों का एक बड़ा डिपो तबाह किया गया है. नाईजीरिया की सरकार ने भी कबूला है कि अमेरिका को इन आतंकियों की लोकेशन नाईजीरियाई सेना ने मुहैया कराई थी.एक महीने के अंदर इस्लामिक आतंकवाद पर ये ट्रंप का दूसरा बड़ा वार है. 19 दिसंबर को अमेरिकी वायुसेना ने पूर्वी सीरिया में इस्लामिक स्टेट के आतंकियों पर हमला किया था और अब 26 दिसंबर को आतंकवाद पर ट्रंप के दूसरे एक्शन की खबर सामने आ गई है. नाईजीरिया में किए गए ऑपरेशन की जानकारी भी ट्रंप ने ही दुनिया के साथ साझा की है. इस्लामिक स्टेट के आतंक को ट्रंप का ये लेटेस्ट चैलेंज किन शब्दों में दिया गया ये भी आपको समझना चाहिए.

ट्रूथ पर ट्रंप ने क्या लिखा? 
अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म TRUTH SOCIAL पर ट्रंप ने लिखा है. आज मेरे आदेश पर अमेरिकी फौज ने नाईजीरिया में उन आतंकियों का नामो-निशान मिटा दिया है जो निर्दोष ईसाईयों को मार रहे थे. ट्रंप ने आतंकी हमले के साथ ईसाईयों का नाम जोड़कर ये संदेश भी दिया है कि उनकी कार्रवाई एक किस्म का धर्मयुद्ध है जिसका मकसद नाईजीरिया के ईसाई समुदाय को बचाना है. क्या वाकई ट्रंप एक धर्मयुद्ध लड़ रहे हैं या फिर इन हमलों के पीछे मकसद कुछ और है. इस सवाल का भी हम विश्लेषण करेंगे लेकिन उससे पहले हम आपको नाईजीरिया में मजहब के नाम पर चल रहे खून-खराबे के बारे में बताने जा रहे हैं.

ट्रंप क्या चाहते हैं?
नाईजीरिया में इस्लामिक स्टेट और बोको हराम के आतंकी पिछले 16 सालों से लगातार ईसाई समुदाय को निशाना बना रहे हैं. बीते 16 सालों में आतंकी हमलों की वजह से 53 हजार ईसाईयों की मौत हो चुकी है. तकरीबन 20 हजार ईसाई प्रार्थना स्थल और कब्रिस्तान तोड़ दिए गए हैं. इस दहशतगर्दी की वजह से नाईजीरिया के तकरीबन 1 करोड़ 60 लाख ईसाई विस्थापित हो गए हैं. संयुक्त राष्ट्र ने भी नाईजीरिया को विशेष चिंता वाला देश करार भी दिया है. यहां सवाल उठता है कि धर्म के आधार पर ईसाई समुदाय के नरसंहार का ये सिलसिला  2009 से चल रहा है लेकिन ट्रंप के अंदर ईसाईयों के लिए अचानक सहानुभूति क्यों जगी.  दरअसल इस्लामिक आतंकवाद पर प्रहार करके ट्रंप एक तीर से कई निशाने लगाना चाहते हैं. ईसाईयों को बचाने की कथित मुहिम का एक बड़ा मकसद अमेरिका के सबसे बड़े ईसाई वोटबैंक को लुभाना है. ट्रंप उस अश्वेत वोटबैंक को भी अपनी तरफ खींचना चाहते हैं जिसका मूल संबंध नाईजीरिया और उस जैसे दूसरे अफ्रीकी देशों में है. ट्रंप की दिलचस्पी नाईजीरिया के तेल और खनिज भंडार में भी है ताकि अमेरिका को रेयर अर्थ मिनरल्स की कमी ना महसूस हो और ट्रंप के प्लान का चौथा हिस्सा है अफ्रीका में दोबारा अमेरिकी प्रभुत्व को कायम करना. 

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अफ्रीकी देशों की नीतियां बदली

सामरिक मामलों के जानकारों का मानना है कि अफ्रीका में अमेरिकी प्रभाव ही वो मुद्दा है जिसकी वजह से ट्रंप को अचानक नाईजीरिया की याद आई है. एक जमाना था जब अफ्रीका के कई देशों में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी तक थी लेकिन वर्ष 2020 के बाद अफ्रीकी देशों की नीतियां तेजी से बदलीं. कई देशों ने चीन से आर्थिक और रूस के साथ सामरिक रिश्तों को आगे बढ़ाना शुरु कर दिया. नतीजा हुआ कि अमेरिका समेत नाटो का दुनिया के इस हिस्से पर दबदबा लगभग शून्य होता चला गया.