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DNA Analysis: अफवाह के कट्टरपंथी टूल का सबसे ताजा शिकार जयपुर शहर हुआ है. जयपुर के चौमूं कस्बे में मस्जिद के पास 45 साल से सड़क किनारे पड़े पत्थर को हटाने के लिए जब प्रशासन की टीम पहुंची तो कट्टरपंथियों ने अफवाह नाम के हथियार का इस्तेमाल किया. कुछ कट्टरपंथियों ने अफवाह फैला दी कि प्रशासन की टीम मस्जिद तोड़ने आई है. उससे आगे का काम पत्थरबाजों को करना था. अफवाह और पत्थर के कट्टरपंथी कॉकटेल से ऐसा उन्माद खड़ा किया गया जिसे हम आप हिंसा का नाम देते हैं. सर्द रात में हाथों में पत्थर लिए सैकड़ों लोग सड़क पर उतर आए. पुलिस प्रशासन पर पत्थरों की बरसात शुरू हो गई. 

उन्मादी बेकाबू
एक दिन पहले ही रास्ते पर पड़े पत्थरों को हटाने की सहमति बनी थी, लेकिन अफवाह और कट्टरपंथ के मिश्रण वाले जहरीले रसायन ने लोगों के दिमाग को हाईजैक कर दिया. एक अफवाह ने जयपुर के चौमूं कस्बे को झुलसा दिया. हाथों में पत्थर लिए कट्टटरपंथियों का हुजूम सड़क पर आया और तांडव शुरू हो गया. मस्जिद के पास सड़क किनारे पत्थर बड़े थे. इन पत्थरों की वजह से रोज ट्रैफिक जाम हो रहा था. लोगों को परेशानी हो रही थी. मस्जिद कमेटी और प्रशासन के बीच पत्थरों को हटाने की सहमति बन गई थी. लेकिन जब टीम पत्थर हटाने पहुंचे तो ये अफवाह फैला दी गई कि मस्जिद पर एक्शन होनेवाला है. ये सुनते ही उन्मादी बेकाबू हो गए. उपद्रवियों ने पुलिस को निशाना बनाकर पत्थरबाजी की. उपद्रवियों को कंट्रोल करने के लिए कई थानों को पुलिस को चौमूं में तैनात किया गया. फिलहाल हालात कंट्रोल में है. अफवाह पर कंट्रोल करने के लिए चौमूं में कल सुबह 7 बजे तक इंटरनेट सर्विस बैन कर दी गई है.

पुलिस का एक्शन 
प्रसिद्ध विद्वान वर्जिल ने कहा है कि अफवाह बढ़ती जाती है. सोचिए किसी ने अफवाह उड़ा दी और उन्मादियों ने हाथ में पत्थर उठा लिया. अफवाह एक से दूसरे तक पहुंची और कौम एकजुट हो गई. हम कौम क्यों कह रहे हैं इसे समझिए. हम कौम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इस अफवाह के केंद्र में एक मस्जिद थी. अफवाह मस्जिद पर बुलडोजर चलाने की उड़ाई गई. किसी ने पूछा नहीं, सोचा नहीं, सच जानने की कोशिश नहीं की, बस हाथ में पत्थऱ उठाया और चल पड़े, इसलिए अब ये आरोप भी लग रहे हैं कि पत्थरबाजों की कौम होती है. पत्थरबाजों की इस कौम के उन्मादी बुखार का इलाज पुलिस ने शुरू कर दिया है. पुलिस पत्थरबाजी में शामिल संदिग्धों को गिरफ्तार कर रही है. जब पुलिस का एक्शन शुरू हुआ तो ये खुद को बेकसूर और पाक-साफ बताने लगे.

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जयपुर में योगी मॉडल
प्रसिद्ध विद्वान विल रोजर्स ने कहा है कि अफवाह तेजी से चलती है, लेकिन सच्चाई जितना स्थायी नहीं रहती. जयपुर वाली अफवाह भी स्थाई नहीं रही. आप इस अफवाह को सामान्य घटना मत समझिए. बांग्लादेश में दीपू चंद्र दास की हत्या भी कट्टरपंथियों ने एक अफवाह के बाद ही की थी. अफवाह फैलाई गई कि दीपू ने ईशनिंदा की है. इस अफवाह की आड़ में कट्टरपंथियों ने दीपू की लिंचिंग कर दी. सोचिए जयपुर में अगर प्रशासन सतर्क नहीं होता तो क्या होता. अगर उन्मादियों की संख्या ज्यादा होती तो क्या होता. दीपू की तरह ही किसी पुलिसवाले की लिंचिंग हो सकती थी, हो सकता था कि उपद्रवियों की पत्थरबाज़ी में किसी की जान चली जाती. सोचिए ये कैसी आस्था है जो उपद्रव के लिए उकसाती है. जो क्रिसमस की रात मस्जिद के नाम पर मजहबी उत्पात मचाती है. मतलब, क्या जहां मन होगा, वहां पत्थर उठाकर फेंक देंगे. धार्मिक आस्था, मज़हब के नाम पर कहीं भी पत्थर बरसाने लगेंगे. धार्मिक विश्वास के नाम पर अराजकता की हर सीमा को लांघ देंगे. इसलिए अब जयपुर में भी योगी मॉडल लागू करने की मांग हो रही है. मांग हो रही है कि जिन्होंने पत्थर उठाए हैं, उनके घर पर बुलडोजर चलना चाहिए.

चंद कट्टरपंथी? 
सिडनी में हुए आतंकी हमले को अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने इस्लामिक आतंकवाद कहा था. यानी ट्रंप ने आतंकवाद को मजहब से जोड़ा था और अब भारत में पत्थरबाजी को भी मजहब से जोड़ा जा रहा है. मित्रो क्या भारत में कौम के पत्थरबाजों का नेटवर्क नहीं बन गया है. ये सवाल क्यों है, इसे समझिए. आपको उत्तर प्रदेश का संभल याद है. वही संभल जहां नवंबर 2024 में सर्वे टीम पर पत्थरबाज़ी हुई थी. हम कौम वाले पत्थरबाजों के नेटवर्क की बात क्यों कर रहे हैं, इसे समझने के लिए संभल और चौमूं में हुए पथराव के पैटर्न की समानता को समझते हैं. संभल में कोर्ट के आदेश पर मस्जिद का सर्वे हो रहा था. चौमूं में प्रशासन के आदेश पर अतिक्रमण हटाया जा रहा था
लेकिन दोनों जगह पत्थरबाजों के नेटवर्क ने इसे धार्मिक मुद्दा बना दिया. संभल में अफवाह के बाद पत्थरबाजी और आगजनी हुई थी. निशाने पर पुलिसकर्मियों की टीम थी. चौमूं में भी अफवाह के बाद पत्थरबाजी हुई, यहां भी निशाने पर पुलिस की टीम ही थी. संभल और चौमूं दोनों जगह अफवाह कट्टरपंथियों ने ही फैलाई थी. पत्थरबाजों की कौम होती है या पत्थरबाज कौम से ही होते हैं. इस तरह का आरोप लगाने वाले पर सवाल उठाए जा सकते हैं लेकिन इन आरोपों को चंद कट्टरपंथी ही मजबूत कर रहे हैं. 

क्यों हो रही पत्थरबाजी? 
DNA के 22 दिसंबर के एडिशन में हमने आपको मध्य प्रदेश के सीहोर की खबर बताई थी. सीहोर में चंद कट्टरपंथियों ने जय श्रीराम का जयघोष करने वालों पर पथराव किया था. ये पथराव भी मस्जिद से हुआ था. आज उसी सीहोर में उन्हीं चंद सरफिरे कट्टरपंथियों के समर्थन में हुजूम सड़क पर उतरा. ये वही लोग हैं, जो कह रहे थे कि ये तो मुस्लिम मोहल्ला है यहां जय श्री राम का क्या काम. इन्हीं कट्टरपंथियों ने सीहोर में आज जुमे पर शक्ति प्रदर्शन किया. प्रशासन को ज्ञापन देने के नाम पर भारी भीड़ जुटाई गई. कट्टरपंथियों के वैचारिक संरक्षक शायद जताना चाहते थे कि मुस्लिम मोहल्ला तो उन्होंने बना लिया है. अब तैयारी आगे की है. ये शायद बताना चाहते थे कि बेशक भारत धर्मनिरपेक्ष देश है लेकिन उनके मुस्लिम मोहल्ले में शरियत ही सबकुछ है. यहां जय श्रीराम का जयघोष वर्जित है. इसलिए रामभक्तों पर पथराव करनेवालों पर कार्रवाई नहीं की जाए. 21 दिसंबर को जय श्रीराम का नारा लगाने वालों पर पथराव करनेवाले कट्टरपंथियों की संख्या थोड़ी कम थी. आज उनके वैचारिक समर्थकों और संरक्षकों ने सड़क पर उतर कर जताया कि वो अकेले नहीं है. रामभक्तों पर पत्थर बरसानेवालों के समर्थन में उतरी भीड़ का नेतृत्व शहर काजी कर रहे थे. 

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कार्रवाई को रोकने का प्रयास

ऐसे समझिए कि आज शक्ति प्रदर्शन की कमान मुस्लिमों के स्थानीय धार्मिक नेतृत्व के हाथ में था. सोचिए अब ऐसा होगा तो कौम को पत्थरबाजी से जोड़ने वालों को मजबूती नहीं मिलेगी. जरूर मिलेगी. लेकिन शहर काजी को इसकी फिक्र नहीं है. वो रामभक्तों पर पत्थर बरसानेवालों को बचाने के लिए नई थ्योरी गढ़ रहे हैं. पथराव में जो पीड़ित हैं उन्हें ही दोषी बता रहे हैं. समझिए पहले रामभक्तों पर पत्थर बरसाए गए, अब अपनी ताकत दिखाकर उन्हीं रामभक्तों पर कार्रवाई का दवाब बनाया जा रहा है. सिर्फ दवाब ही नहीं बनाया जा रहा है. ये धमकी भी दी जा रही है कि अगर कार्रवाई नहीं हुई तो अगली बार, इससे भी बड़ी भीड़ बुलाई जाएगी, समझ रहे हैं, ऐसा क्यों हो रहा है. ऐसा रामभक्तों पर पत्थर बरसाने वालों पर हो रही कार्रवाई को रोकने के लिए हो रहा है. इसे ही चोरी और सीनाजोरी कहा जाता है. पहले कट्टरपंथियों ने रामभक्तों पर पथराव किया. कार्रवाई शुरू हुई तो कट्टरपंथियों के वैचारिक संरक्षक अपनी ताकत दिखाने सड़क पर उतर आए. इस शक्ति प्रदर्शन को ये सोचकर अनदेखा नहीं किया जा सकता कि ये एक छोटे शहर की घटना है. समझिए आज जो तस्वीर सीहोर में दिख रही है. कल वैसी ही तस्वीर देश के दूसरे शहरों में भी दिख सकती है और कई बार दिखती भी हैं. हो सकता है, अगली बार आपके शहर में दिखे. ऐसा इसलिए है क्योंकि कट्टरपंथियों और उनके वैचारिक संरक्षकों को एक डोर मजबूती से जोड़ती है.