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How RSS overtook the left parties: भारत की राजनीति csx 26 दिसंबर का अपना महत्व है. इसकी वजह ये है कि कि 100 साल पहले आज ही के दिन भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई थी. 26 दिसंबर 1925 को कानपुर में कम्युनिस्ट पार्टी के अलग-अलग समूह इकट्ठा हुए थे और एक अखिल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की थी. 1917 की रूसी क्रांति से प्रेरणा लेकर भारत के वामपंथी नेताओं ने CPI की नींव रखी. इस तरह आज भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी CPI के 100 साल पूरे हो गए हैं.

100 साल पहले हुई दोनों संगठनों की स्थापना

100 साल पहले एक और संगठन यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई थी. CPI की स्थापना से क़रीब 2 महीने पहले यानी 27 सितंबर 1925 को RSS अस्तित्व में आया था. यानी 100 साल पहले देश में दो विपरीत विचारधारा वाले संगठनों की नींव पड़ी थी. एक लेफ्ट तो दूसरा राइट. हालांकि CPI एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर आई और संघ एक सामाजिक संगठन के रूप में. 100 साल के दौरान इन दोनों संगठनों की यात्रा कैसे आगे बढ़ी है. आज ये दोनों संगठन कहां हैं. इसका विश्लेषण करने से पहले कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल के राजनीतिक सफर के बारे में आपको जानना चाहिए.

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1952 के पहले आम चुनाव में CPI को 16 सीट मिली और वो कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी. जबकी आरएसएस से वैचारिक ऊर्जा लेनेवाले जनसंघ को उस चुनाव में केवल 3 सीटें मिली थीं. 1957 में केरल में दुनिया की पहली लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार बनी. 

1964 में वैचारिक मतभेदों की वजह से CPI से अलग होकर एक नई पार्टी CPM बनी यानी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी. इसके बाद 1974 में तीसरी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई. जिसका नाम है भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन. इसे CPI ML भी कहते हैं. 

कई राज्यों में रही वामपंथी दलों की सरकारें

1977 में पश्चिम बंगाल में पहली बार कम्युनिस्ट सरकार बनी जो 34 साल तक चली. त्रिपुरा में भी 1978 से 1988 और फिर 1993 से लेकर 2018 तक कम्युनिस्ट सरकार रही. राष्ट्रीय स्तर पर भी 1989, 1996 और 2004 के चुनावों के बाद कम्युनिस्ट पार्टियां निर्णायक भूमिका में रहीं. 1996 में तो संयुक्त मोर्चा की सरकार में CPI के इंद्रजीत गुप्ता देश के गृह मंत्री भी बने. 2004 में UPA सरकार बनाने में कम्युनिस्ट पार्टियों की अहम भूमिका रही.

वर्ष 2008 में अमेरिका के साथ परमाणु समझौते का विरोध करते हुए लेफ्ट पार्टियां सरकार से अलग हो गईं. इसके बाद लेफ्ट पार्टियों का आधार घटने लगा. 2011 में पश्चिम बंगाल और 2018 में त्रिपुरा से लेफ्ट फ्रंट सरकार से बाहर हो गया. आज केरल को छोड़कर देश के किसी भी राज्य में कम्युनिस्ट सरकार नहीं है. आज तीनों कम्युनिस्ट पार्टियों को मिलाकर लोकसभा में सिर्फ़ 8 सांसद हैं. 

जनता की नजरों से उतरती गईं कम्युनिस्ट पार्टियां

CPI से अलग होकर बनी CPM तो अभी भी राष्ट्रीय पार्टी है लेकिन CPI राष्ट्रीय पार्टी नहीं रह गई है. यानी 100 साल के बाद न सिर्फ़ CPI बल्कि सभी कम्युनिस्ट पार्टियां सिमट गई है. वहीं दूसरी तरफ़ 100 साल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सबसे मज़बूत स्थिति में है. RSS इस वक्त दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है.

संघ से वैचारिक तौर पर जुड़ी BJP सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है. संघ से जुड़ा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद देश का सबसे बड़ा छात्र संगठन है. यहां तक कि जिन मज़दूरों का नारा देकर कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई थी, वहां भी संघ का वर्चस्व है. संघ से जुड़ा भारतीय मज़दूर संघ देश का सबसे बड़ा मज़दूर संगठन है. ताज़ा आंकड़े के अनुसार देश भर में संघ की शाखाओं की संख्या 83,129 है. शताब्दी वर्ष में संघ का लक्ष्य शाखाओं की संख्या बढ़ाकर 1 लाख तक पहुंचाना है.

देशभर में आरएसएस का बढ़ा जनाधार

कम्युनिस्ट पार्टी और संघ के प्रभाव के बीच अंतर को समझने के लिए 2 शहरों का उदाहरण भी लिया जा सकता है. जिस कानपुर में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई थी, वहां आज वामपंथ की जगह संघ मज़बूत स्थिति में है. आख़िरी बार कम्युनिस्ट पार्टी कानपुर से 1989 में जीती थी.

वहीं जिस नागपुर में संघ की स्थापना हुई थी, उसकी पहचान संघ के मुख्यालय से है. यहां संघ का मज़बूत आधार है. 2014 से बीजेपी नागपुर लोकसभा सीट जीत रही है. नागपुर से नितिन गडकरी और देवेंद्र फडणवीस जैसे संघ से जुड़े मज़बूत नेता आते हैं.

इतना ही नहीं जिस बंगाल में 34 वर्षों तक लेफ्ट पार्टियां सत्ता में रहीं, वहां भी आज संघ काफ़ी मज़बूत है. CPI और RSS दोनों वैचारिक संगठन हैं. लेकिन इसके बावजूद कम्युनिस्ट पार्टियों की तुलना में संघ काफ़ी आगे निकल गया. आपको ये भी जानना चाहिए कि संघ क्यों आगे बढ़ा और कम्युनिस्ट पार्टियां क्यों पिछड़ती चली गईं.

जनता के दिलों में कैसे छा गया आरएसएस?

इसका सबसे बड़ा कारण है विचारधारा का अंतर. संघ जहां देश के लिए समर्पित संगठन है, वहीं कम्युनिस्ट पार्टियां अनेक मौक़ों पर देश के ख़िलाफ़ भी दिखीं. 1964 में पार्टी के विभाजन का कारण यही था कि कुछ कम्युनिस्ट नेताओं ने 1962 के युद्ध के दौरान चीन का समर्थन किया था.

संघ ने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को आधार बनाकर सांस्कृतिक और सामाजिक परिवर्तन पर ध्यान दिया. वहीं कम्युनिस्ट पार्टियों ने मुख्य रूप से वर्ग संघर्ष पर ध्यान दिया. इससे वो सांस्कृतिक पहचान से दूर हो गए. RSS ने अनुशासन, सांस्कृतिक एकीकरण पर ज़ोर दिया जबकि कम्युनिस्ट पार्टियां वैचारिक कट्टरता और संगठन में विभाजन से प्रभावित रहीं.

RSS शिक्षा, सेवा और आपदा राहत के रचनात्मक मॉडल पर काम करता है जबकि कम्युनिस्ट पार्टियों का मॉडल आंदोलन, हड़ताल और धरने का है. यही वो कारण हैं जिसकी वजह से 100 साल बाद 2 संगठन आज बिल्कुल अलग-अलग स्थितियों में हैं. एक जहां सफलता के शिखर पर है, तो दूसरा पतन के कगार पर.