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Supreme Court: उन्नाव रेप केस में कुलदीप सेंगर की सजा निलंबित करने के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. सीबीआई ने कहा है कि  दिल्ली हाई कोर्ट का निष्कर्ष ग़लत है कि एक  विधायक पॉक्सो एक्ट के सेक्शन 5 के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ की कैटेगरी में नहीं आता. सीबीआई के मुताबिक बच्चो के यौन शोषण के मामले में संरक्षण देने वाले पॉक्सो एक्ट जैसे अहम कानून के मर्म को समझने में  हाई कोर्ट ने भूल की है, कोर्ट ने इस कानून के मकसद और भावना को ध्यान में नहीं रखा.

हाई कोर्ट ने सेंगर को पब्लिक सर्वेंट क्यों नहीं माना था
दरअसल इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट का कहना था कि कि सेंगर के खिलाफ POCSO कानून के तहत  गंभीर यौन अपराध (Aggravated Penetrative Sexual Assault) का मामला नहीं बनता. POCSO कानून की धारा 5 में इसका उल्लेख है कि किन परिस्थितियों में किसी बच्चे के साथ किया किया सेक्सुअल असॉल्ट गंभीर माना जाएगा. इस कानून के अनुसार, अगर किसी बच्चे के साथ यह अपराध किसी पब्लिक सर्वेट, पुलिसकर्मी (अपने थाना क्षेत्र में), सशस्त्र सुरक्षा बल के सदस्य, अस्पताल के कर्मचारी या जेल कर्मचारी द्वारा किया जाता है, तो उसे गंभीर यौन हमला की श्रेणी में रखा जाता है. इस तरह के गंभीर अपराध के लिए कानून में कम से कम 20 साल की जेल की सजा का प्रावधान है, अधिकतम सजा उम्र कैद तक हो सकती है.

ऐसे में सेंगर के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के सेक्शन 5  के तहत गम्भीर यौन अपराध का मामला तभी माना जा सकता है जब कोर्ट उसे पब्लिक सर्वेंट माने, ट्रायल कोर्ट ने सेंगर को लोक सेवक (public servant) मानते हुए उसे इस अपराध के लिए उम्रकैद की सजा  दी थी लेकिन हाई कोर्ट ने कहा कि सेंगर को न तो POCSO कानून की धारा 5(c) और न ही IPC की धारा 376(2)(b) के तहत पब्लिक सर्वेंट माना जा सकता है.

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HC ने क़ानून का मर्म नहीं समझा
अब सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में CBI ने कहा है कि POCSO एक्ट के सेक्शन 5(सी) को ठीक से और समग्र रूप से देखा जाए तो  यह बात साफ हो जाती है कि  इसमे पब्लिक सर्वेट का मतलब हर उस शख्श से है, जो अपनी शक्ति, पद, अधिकार या हैसियत (चाहे वह राजनीतिक हो या किसी और तरह की)उसका गलत इस्तेमाल करते हैं, सीबीआई का कहना है कि विधायक (अपराध के वक्त कुलदीप सेंगर का पद) भी संवैधानिक है, इस पद के साथ जहां शक्ति हासिल है, वही जनता का विश्वास भी जुड़ा है, समाज और राज्य के प्रति इस पद की अपनी जिम्मेदारी होती है, ऐसे में POCSO एक्ट के तहत सेंगर को ‘पब्लिक सर्वेट’ न मानने का हाई कोर्ट का फैसला गलत है. 

पीड़ित की सुरक्षा को खतरा
सीबीआई का कहना है कि अगर कुलदीप सेंगर को रिहा किया जाता है तो यह पीड़ित की सुरक्षा के  लिए बड़ा खतरा होगा. सेंगर बेहद प्रभावशाली व्यक्ति है, जिसके पास धन और बाहुबल है. जमानत मिलने की सूरत में वह अब भी पीड़ित और उसके परिवार को नुकसान पहुंचा सकता है. 

सिर्फ जेल में लंबा वक्त रहने के चलते जमानत नहीं
सीबीआई का कहना है कि बच्चों के साथ यौन शोषण जैसे गम्भीर अपराध में सिर्फ जेल में लंबा वक्त गुजराने के चलते कोई जमानत का हकदार नहीं हो जाता, सेंगर को निचली अदालत ने उम्रकैद की सजा दी है. उम्रकैद की सजा पाए किसी शख्श की सजा निलंबित करने का फैसला तभी दिया जा सकता है , जब कोर्ट पहली नजर में इस तथ्य को लेकर सन्तुष्ट हो कि आरोपी का उस केस में दोष  ही नहीं बनता. यही नहीं हाई कोर्ट ने कुलदीप सेंगर के आपराधिक इतिहास और इस फैसले के चलते लोगों के न्यायिक व्यवस्था में भरोसे पर पड़ने वाले असर को नजरंदाज किया.