Unnao rape case: उन्नाव रेप केस एक बार फिर चर्चा में है. इस मामले में बीते 23 दिसंबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने दोषी करार दिए गए पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत दी थी, जिसके खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने अब सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. CBI ने सुप्रीम कोर्ट के एल.के. आडवाणी मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि विधायक या सांसद जैसे पद पर रहने वाला व्यक्ति ‘लोक सेवक’ माना जाता है. CBI ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दिल्ली हाईकोर्ट ने यह कहते हुए गलती की कि अपराध के वक्त विधायक रहे कुलदीप सिंह सेंगर लोक सेवक नहीं थे और इसी आधार पर उन्हें POCSO कानून के तहत अभियोजन से बाहर मानते हुए जमानत दे दी गई, अब CBI की इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की वेकेशन बेंच 29 दिसंबर यानी कल सुनवाई करेगी.
दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए CBI ने कहा कि जब सांसदों और विधायकों को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत लोक सेवक मानकर मुकदमा चलाया जा सकता है, तो फिर POCSO जैसे गंभीर कानून के तहत भी उन्हें लोक सेवक माना जाना चाहिए. CBI ने यह भी बताया कि दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंगर के मामले को POCSO एक्ट की धारा 5(c) के दायरे में नहीं माना था, जो ‘गंभीर यौन अपराध’ से जुड़ी है. CBI ने दाखिल की गई अपनी याचिका में दलील दी कि धारा 5(c) के तहत अपराध तब और गंभीर हो जाता है, जब यौन उत्पीड़न किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाए जो पुलिसकर्मी, सशस्त्र बल का सदस्य, लोक सेवक या किसी शैक्षणिक या चिकित्सा संस्थान से जुड़ा हो. ऐसे मामलों में सख्त सजा का प्रावधान है.
सीबीआई ने दी ये दलील
CBI ने कहा कि एक मौजूदा विधायक होने के नाते सेंगर के पास जनता का विश्वास और अधिकार होता है. यह पद समाज और राज्य के प्रति अतिरिक्त जिम्मेदारी भी लेकर आता है. हाईकोर्ट ने POCSO कानून की मंशा को सही तरीके से समझे बिना फैसला दिया, जो कानून के उद्देश्य के खिलाफ है. CBI ने दलील देते हुए कहा सुप्रीम कोर्ट ने एल.के. आडवाणी बनाम CBI केस में साफ तौर पर कहा था कि विधायक को भ्रष्टाचार कानून के तहत लोक सेवक माना जाएगा. ऐसे में POCSO जैसे ज्यादा गंभीर अपराध में भी यही सिद्धांत लागू होना चाहिए.
CBI के अनुसार, POCSO एक्ट के तहत अपराध भ्रष्टाचार से भी ज्यादा गंभीर हैं, क्योंकि यह बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा है. इसलिए कानून में सख्त सजा, विशेष प्रक्रिया और जिम्मेदारी तय की गई है. CBI ने यह भी कहा कि उम्रकैद की सजा पाए दोषी को सजा निलंबन (suspension of sentence) का लाभ तभी दिया जा सकता है, जब पहली नजर में सजा टिकाऊ न लगे और अपील में सफलता की प्रबल संभावना हो, सिर्फ लंबे समय तक जेल में रहना या अपील में देरी होना, ऐसे जघन्य अपराधों में जमानत का आधार नहीं हो सकता.
पीड़िता ने क्या कहा?
23 दिसंबर को जब दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंगर को बेल दी थी. उसे 4 शर्तों पर जमानत दी गई है. इस फैसले के बाद बीते शुक्रवार को पीड़ित परिवार और सोशल एक्टिविस्ट महिलाओं ने दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर प्रदर्शन किया. पीड़िता ने कहा, ‘मैं कुलदीप सेंगर की सजा सस्पेंड होने से डरने वाली नहीं हूं, फैसला देने वाले जज से सवाल पूछा जाए, यह मेरा और जनता का अधिकार है, क्योंकि हर जज ऐसा नहीं होता है। मुझे सुप्रीम कोर्ट पर पूरा भरोसा है.’ पीड़िता ने मीडिया से कहा कि ‘बेल के आदेश से मेरे परिवार की सुरक्षा और रोजी-रोटी खतरे में पड़ गई है, इस आदेश ने मुझे और मेरे जैसी कई महिलाओं को पिंजरे में बंद कर दिया है. यह मेरे परिवार के लिए खतरा है. मेरे पति की भी नौकरी चली गई है, हम क्या करें?’
क्या है उन्नाव रेप केस?
उन्नाव रेप केस 2017 का है. जब उन्नाव में कुलदीप सेंगर और उसके साथियों ने 2017 में नाबालिग को अगवा करके उसके साथ रेप किया था. इस मामले की शिकायत के बाद CBI ने जांच की थी. जांच के बाद दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने दोषी सेंगर को 20 दिसंबर 2019 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी और मृत्यु तक जेल में रखने के आदेश दिए गए थे. इतना ही नहीं, सेंगर पर 25 लाख रुपये जुर्माना भी लगाया गया था. इस मामले में दोषी पाए जाने के बाद कुलदीप सेंगर की विधानसभा सदस्यता भी रद्द कर दी गई थी, उसे भाजपा ने पार्टी से निकाल दिया था.
ये भी पढ़ें: दो पति, एक केस और 17 साल का इंतजार, अचानक कोर्ट रूम में पलटी बाजी, कैसे महिला के अरमानों पर फिरा पानी
