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DNA Analysis: कुछ लोग पहाड़ की तरफ जा रहे हैं तो कुछ लोग मैदानी भाग में देवस्थल की ओर. देश के बड़े-बड़े टूरिस्ट स्पॉट से हमारी ये ग्राउंड रिपोर्ट आज आपको जरूर पढ़नी चाहिए ताकि पता चल सके, कि मैदान या पहाड़ पार्टी डेस्टिनेशन या धार्मिक स्थल कहां भीड़ ज्यादा है. कृष्ण की नगरी वृंदावन में नए साल के आगम से पहले ही कृष्णभक्तों का सैलाब सा आया हुआ है. जहां बेहिसाब भीड़ है. ये सब यहां पहुंचे हैं श्रकृष्ण के आगे शीष झुकाकर अपने नए साल की शुरुआत करने लिए. अभी दो दिन शेष है और अभी भी यहां कुछ यूं बांके बिहारी के दर्शन को भक्त की कतारें लगी हुई हैं. देश के कोने-कोने से यहां लोग पहुंचे हैं. मंदिर से लेकर शहर की सड़कों तक पर, बेहिसाब भीड़ है. लीलाधर के दरबार में पहुंचकर नए साल का उत्सव मनाने को लेकर अह्लादित हैं. 

अपने अराध्य का दर्शन 
वृंदावन की तरह भगवान कृष्ण की प्राचीन नगरी द्वारिका में भी अभी से लोग जुटने लगे हैं. जगत मंदिर और शिवराजपुर बीच पूरी तरह हाउसफुल नजर आ रहे हैं. द्वारका के सभी होटल, गेस्ट हाउस और धर्मशालाओं में आगामी 10 जनवरी तक की बुकिंग फुल हो चुकी है.सिर्फ मंदिर में ही नहीं, शिवराजपुर बीच पर भी सैलानियों का तांता लगा हुआ है. लोग राफ्टिंग कर रहे हैं. नए साल के आगमन से पहले समुद्र तट की सफेद रेत और नीला पानी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. ये लोग नए साल का इंतजार कर रहे हैं. सिर्फ कृष्ण नगरी ही नहीं बाबा विश्वनाथ की नगरी में भी नए साल से पहले तीर्थयात्री की भीड़ उमड़ने लगी है. नए साल के स्वागत और बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए उमड़ी भीड़ ने वाराणसी की गालियों और घाटों को भर दिया है. काशी की तरह अयोध्या में भी इस साल लोगों की भारी भीड़ होने की संभावना है. 2025 में एक जनवरी को पांच लाख से ज्यादा रामभक्तों ने अपने आराध्य का दर्शन किया था. इस बार तो उससे भी अधिक भीड़ होने का अनुमान है. यही कारण है कि राम नगरी के सभी प्रमुख प्रवेश द्वारों पर सघन चेकिंग अभियान चलाया गया. 

टूरिस्ट पहुंचें पहाड़ों पर 
जिस तरह नए साल की शुरुआत करने एक लिए एक बड़ी आबादी देश के अलग-अलग धार्मिक स्थलों की ओर गई है, उसी तरह बड़ी संख्या में लोगों ने पहाड़ों का भी रुख किया है. नए साल के जश्न से पहले पहाड़ों की रानी शिमला में सैलानियों की भारी भीड़ देखने के लिए मिल रही है. शिमला के मंदिरों में भी दर्शन के लिए श्रद्धालु पहुंच रहे हैं. शिमला विंटर कार्निवाल से पहाड़ों में ख़ूब चकाचौंध भी लगी है. शिमला शहर में रोज़ाना 15 हज़ार से ज़्यादा गाड़ियों की आवाजाही हो रही है. इसके अलावा होटलों में भी 90 फ़ीसदी से ज़्यादा बुकिंग है. शिमला की तरह मसूरी में भी सैलानियों की भीड़ देखने को मिल रही है. अगले दो दिनों में और भी यहां भीड़ बढ़ने के अनुमान हैं.नए साल पर सामने आ रहे देशभर के भीड़ वाले वीडियो सिर्फ उत्सव की तस्वीरें नहीं हैं, बल्कि भारत के बदलते सामाजिक और पर्यटन व्यवहार का संकेत हैं. आंकड़े साफ बताते हैं कि नए साल मनाने का तरीका अब मूल रूप से बदल चुका है. पहले नए साल की पार्टी का मतलब हिल स्टेशन, पार्टी डेस्टिनेशन या फिर मेट्रो शहरों में क्लब, मॉल और सिटी सेंटर जैसे स्थान होते थे. साल 2005 से 2018 के बीच नए साल की भीड़ का बड़ा हिस्सा शिमला, मनाली, नैनीताल और गोवा जैसे स्थानों तक सीमित रहता था. लेकिन अब ट्रेंड बदल रहा है. 

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धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालु
2024 और 2025 के आंकड़े बताते हैं कि नए साल का केंद्र पहाड़ों से खिसककर धार्मिक मेगा डेस्टिनेशन की ओर चला गया है. धार्मिक स्थलों पर भीड़ अब पूरे साल रहती है. वहां इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे कॉरिडोर, सड़कें और सुविधाएं भी बढ़ी हैं. धार्मिक स्थलों पर व्यवस्था भी यानी भीड़ मैनेजमेंट भी पहले की तुलना में बेहतर हुआ है. इसलिए श्रद्धालुओं की संख्या भी तेजी से बढ़ी है और बढ़ती जा रही है. काशी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां कॉरिडोर बनने के बाद रोजाना दर्शन करने वालों की संख्या करीब 20 हजार से बढ़कर डेढ़ लाख से ज्यादा हो गई. इसके अलावा अयोध्या में भी एक जनवरी 2025 को 5 लाख से अधिक की भीड़ जुटी थी. इसका परिणाम ये हुआ कि अयोध्या, काशी और मथुरा में होटल किराए 20 से 40 हजार रुपये प्रति रात तक पहुंचे. शिमला और मनाली में 35000 से 50000 रुपये तक होटल का किराया था. अयोध्या, काशी में जो होटाल का किराया था उससे कहीं सस्ता गोवा के कई रिसॉर्ट थे. 

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खुद की ओर लौट रहा भारत

विदेश जाने वालों की संख्या भी काफी बढ़ी है. 2024 में 3 करोड़ से ज्यादा भारतीय विदेश गए लेकिन अकेले अयोध्या में ही इससे पांच गुना ज्यादा लोग पहुंचे. मतलब साफ है, विदेश जाना बढ़ रहा है, लेकिन नए साल की असली भीड़ अब भी देश के अंदर है. एक सच ये भी है कि नए साल मनाने का ट्रेंड पूरी तरह बदल चुका है.  नया साल केवल पार्टी नहीं है बल्कि यह आस्था, परिवार, यात्रा और अनुभव का संगम बन गया है. आप कह सकते हैं कि भारत नए साल पर कहीं और नहीं जा रहा, भारत अब खुद की ओर लौट रहा है. नए साल का असली पैसा अब भारत के अंदर घूम रहा है. इसीलिए नया साल अब कैलेंडर का नहीं, भारत की अर्थव्यवस्था का भी टर्निंग पॉइंट बन गया है.