India’s Thorium dream: 1947 में बनी पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार हो या वर्तमान की नरेंद्र मोदी सरकार, सभी का जोर एनर्जी सेक्टर में भारत को आत्मनिर्भर और अग्रणी बनाने पर रहा है. देश की विकास यात्रा में सोलर एनर्जी से लेकर न्यूक्लियर एनर्जी तक भारतीय वैज्ञानिकों की अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हुए देश को लक्ष्य तक ले जाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है. हम सभी जानते हैं कि परमाणु ऊर्जा का अनंत आकाशगंगा की तरह कोई ओर-छोर नहीं है. इस कड़ी में थोरियम को लंबे समय से भारत के एनर्जी भविष्य के तौर पर देखा जा गया है.
थोरियम ही क्यों?
थोरियम को देश के एनर्जी फ्यूचर से जोड़कर इसलिए देखा जाता है क्योंकि धरती पर इसकी भरपूर मौजूदगी है. यूरेनियम के मुकाबले थोरियम ज्यादा साफ-सुथरा तत्व है. कई दशकों से थोरियम को फ्यूल यानी ईंधन के ऐसे विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है जो भारत की इम्पोर्टेड एनर्जी पर निर्भरता को कम कर सकता है.
पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के सलाहकार रह चुके डॉ. सृजन पाल के मुताबिक दुनिया के खनिज तत्वों में मौजूद कुल एनर्जी, अकेले भारत के थोरियम में मौजूद एनर्जी के बराबर है. वहीं डॉ. कलाम ने भी थोरियम का इस्तेमाल करने की बात की थी. उनसे पहले, डॉ. होमी भाभा ने भी इस प्रोजेक्ट में गहरी दिलचस्पी दिखाई थी, जिसकी वजह यही थी कि भारत, दुनिया का सबसे ज्यादा थोरियम की उपलब्धता वाला देश है.
डॉक्टर भाभा की सोच
इसी विश्वास ने भारत की न्यूक्लियर रणनीति को दिशा दी. भाभा के तीन-चरणों वाले परमाणु कार्यक्रम में शुरू में सीमित यूरेनियम का इस्तेमाल करने और आखिरकार कमर्शियल बिजली के लिए भारत के बड़े थोरियम भंडार का इस्तेमाल करने पर जोर दिया गया. 2025 खत्म हो गया लेकिन दशकों की प्लानिंग, रिसर्च और तमाम एक्सपेरिमेंट के बावजूद, भारत के पास अबतक व्यावसायिक स्तर पर इस्तेमाल होने वाला थोरियम-बेस्ड न्यूक्लियर फ्यूल नहीं है.
यानी करीब 70 सालों की तैयारी और अरबों रुपये की लागत लगने के बावजूद भारत अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया है. इस बीच एक विदेशी कंपनी ने भारत का सपना तोड़ते हुए ये मुकाम हासिल कर लिया है. बिजनेस वर्ल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, ये उपलब्धि अमेरिकी प्राइवेट कंपनी, क्लीन कोर थोरियम एनर्जी (CCTE) ने हासिल की है.
जिसके प्रोडक्ट को एडवांस्ड न्यूक्लियर एनर्जी फॉर एनरिच्ड लाइफ (ANEEL) नाम दिया गया है. जिसे प्रेशराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर में इस्तेमाल करने के लिए तैयार किया गया है. आपको बताते चलें कि ये उस तरह के रिएक्टर हैं जिनका निर्माण और संचालन भारत ने कई दशकों पहले शुरू कर दिया था.
भारत ने कई दशक पहले प्रेशराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWR) बनाकर उनका संचालन शुरू कर दिया था. हाल ही में अस्तित्व में आई अमेरिकी फर्म ने अपने प्रोडक्ट ANEEL को खास तौर पर उन रिएक्टरों के इस्तेमाल के लिए तैयार किया है, जो भारत में पहले से चलन में हैं. यानी भारतीय रिएक्टर में भी विदेशी फर्म के प्रोडक्ट का इस्तेमाल हो सकता है.
देश का दुर्भाग्य!
यानी भारत ने जिस साइंटिफिक प्रोजेक्ट का आइडिया ईजाद किया, रिएक्टर डिजाइन किए और क्लोज्ड फ्यूल साइकिल को वैलिडेट किया. लेकिन जब उस कवायद को मार्केट (कारोबार) के लिए तैयार सॉल्यूशन में बदलने का वक्त आया, तो कामयाबी भारत को नहीं बल्कि एक विदेशी फर्म को मिली. डॉक्टर सिंह ने ये भी कहा, ‘जब भारत के पास दुनिया में थोरियम का सबसे बड़ा भंडार है. हमें पहले इसका इस्तेमाल करना चाहिए था, लेकिन कामयाबी किसी और को मिली’.
‘भारत की थोरियम यात्रा वैज्ञानिकों की विफलता नहीं’
भारत की थोरियम यात्रा विज्ञान की विफलता नहीं रही है. थोरियम ऑक्साइड फ्यूल पिन का परीक्षण प्रेशराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर में किया गया था. कल्पक्कम मिनी रिएक्टर (KAMINI) ने थोरियम से बने यूरेनियम-233 का इस्तेमाल करके सफलतापूर्वक काम किया. यानी तकनीकी रूप से, प्रोजेक्ट की कामयाबी का रास्ता दिख गया था.
लेबोरेट्री (प्रयोगशाला) की सफलता से इतर भारत लाइसेंस्ड कमर्शियल फ्यूल तक का सफर कभी नहीं तय कर पाया. भारत ये छलांग इसलिए नहीं लगा पाया क्योंकि खास तौर पर थोरियम का इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन किया गया एडवांस्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (AHWR), दो दशक से ज्यादा समय तक चर्चा में रहने के बावजूद अबतक नहीं बन पाया.
थोरियम-यूरेनियम मिक्स्ड ऑक्साइड फ्यूल को मौजूदा PHWRs के साथ सिर्फ मामूली डिजाइन बदलावों के साथ कम्पैटिबल दिखाया गया था. हालांकि बाद में इडाहो नेशनल लेबोरेट्री में हुए एक रेडिएशन टेस्ट से ये पता चला कि ऐसा फ्यूल किसी भी ऑपरेटिंग स्ट्रेस को झेल सकता है.
भारत की हिचकिचाहट!
डॉ. सिंह ने सुझाव दिया, ‘भारत को दो मोर्चों पर थोरियम पर काम करने की जरूरत है. पहला- भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी जैसे दूसरे रिसर्च संस्थानों इस पर काम करें. दूसरी ओर प्राइवेट सेक्टर जिसमें एंटरप्राइज और स्टार्ट-अप दोनों शामिल हों के जरिए इसे एक साथ आगे बढ़ाया जाए’.
विदेशी कंपनी ने बनाई बढ़त
आपको बताते चलें कि क्लीन कोर थोरियम एनर्जी (CCTE) की स्थापना 2017 में भारतीय मूल के उद्यमी मेहुल शाह ने की थी. मेहुल ने न्यूक्लियर फ्यूल डिजाइन में अपनी काबिलियत और अनुभव का बखूबी प्रयोग किया. इस कंपनी ने जाने-माने भारतीय निवेशकों से लगभग $15.5 मिलियन डॉलर यानी अरबों रुपये का फंड जुटाया है, जो थोरियम के कमर्शियल भविष्य के लिए बहुत शुभ संकेत है.
इससे भी ज्यादा गौर करने वाली बात इस विदेशी कंपनी के सलाहकारों की टीम है, जिसमें दिग्गज भारतीयों का दिमाग लगा है. भारत के एटॉमिक एनर्जी कमीशन के पूर्व प्रमुख डॉ. अनिल काकोडकर इस फर्म के सलाहकार हैं.
हालांकि यह किसी की आलोचना नहीं है क्योंकि रिटायर्ड वैज्ञानिक अक्सर दुनिया भर में प्राइवेट कंपनियों के कंसल्टेंट बनकर उन्हें सलाह देते हैं. लेकिन जब भारत के थोरियम कार्यक्रम का कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति देश के मुख्य वैज्ञानिक संस्थानों के बाहर हुई किसी बड़ी सफलता में शामिल होता है, तो यह स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और संस्थानों के प्रदर्शन के बारे में सवाल उठता है.
हालांकि, इस बात का कोई सार्वजनिक सबूत नहीं है कि इस फर्म के भारत के AEC के साथ औपचारिक संबंध हैं. यह संबंध या तो प्रतीकात्मक हैं या महज कंसल्टेंसी से जुड़े हैं.
डॉ. सिंह ने कहा, ‘जिस कंपनी की बात हो रही है, वह खुद एक स्टार्ट-अप है. यह एक प्राइवेट कंपनी है, हार्वर्ड या फ्रैंकफर्ट या कोई सरकारी संस्थान नहीं. यह कुछ बहुत मजबूत सलाहकारों वाली एक प्राइवेट फर्म है. अगर अनिल काकोडकर अगर इससे जुड़े हैं, तो भारत को उन्हें अपने राष्ट्रीय हितों से जुड़े प्रयासों में क्यों नहीं शामिल किया जाना चाहिए. ऐसी प्रतिभाओं का इस्तेमाल भारत के थोरियम भंडार का सही इस्तेमाल करने में किया जाना चाहिए. भारत के लिए ये एक वेक-अप कॉल है. क्योंकि हम अपने थोरियम के अपने सबसे बड़े खजाने को लेकर अबतक चुप रहे हैं.’
पॉलिसी में भटकाव या तात्कालिकता में कमी?
न्यूक्लियर एक्सपर्ट काफी समय से थोरियम के विकास में हो रही देरी को लेकर आए दिन खुलकर चर्चा करते हैं. वो बताते हैं कि भारत में थोरियम को रिसर्च लैब से कमर्शियल इस्तेमाल तक ले जाने का काम कछुए की चाल जैसा सुस्त और धीमा रहा है. टेक्निकली, थोरियम अपने आप फिसाइल नहीं होता, इसे पहले यूरेनियम-233 में बदलना पड़ता है जिसके लिए एडवांस्ड रिएक्टर और रीप्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी की जरूरत होती है. भारत ने यूरेनियम-बेस्ड रिएक्टरों को बढ़ाने पर ज्यादा जोर दिया है. इसबीच पॉलिसी और प्रायोरिटी में बदलाव पर खूब चर्चा हुई है.
