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जिस तरह वेनेजुएला के राष्ट्रपति को सोते समय अमेरिका ने उठवा लिया, वैसा अपमान देख भारत में लोग कांग्रेस और भाजपा के एक-एक दिग्गज नेता को धन्यवाद दे रहे हैं. इन दोनों नेताओं की दृढ़ इच्छाशक्ति के दम पर वैज्ञानिकों ने देश को परमाणु ताकत बना दिया. कई लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि भारत आज अगर परमाणु शक्ति संपन्न नहीं होता तो एक बड़ा खतरा होता. कई लोगों ने लिखा कि परमाणु ताकत की दिशा में पहला बीज परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना के साथ 1948 में ही पड़ गया था. ऐसे में आज की पीढ़ी के लिए यह जानना जरूरी हो जाता है कि जब भारत ने पहला परीक्षण 1974 में और दूसरा 1998 में किया तो दुनिया में क्या चल रहा था? 

भारत सरकार के पूर्व विदेश सचिव जेएन दीक्षित अपनी किताब में ‘भारत-पाक संबंध- युद्ध और शांति में’ लिखते हैं कि स्वतंत्रता के बाद एक से ज्यादा बार अपनी क्षेत्रीय अखंडता को खतरा पहुंचाने के प्रयासों को देखते हुए भारत को एक दीर्घ स्थायी और सशक्त रक्षा क्षमता की आवश्यकता थी. भारत ने इस पर ध्यान दिया कि जब परमाणु क्षमता संपन्न राष्ट्रों पर प्रतिबंध जैसा प्रेशर पड़ता था तो ये राष्ट्र या तो खुद परमाणु शक्ति-संपन्न बनकर इन दबावों पर काबू पाते थे (जैसे- फ्रांस और चीन) या अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुककर अपनी परमाणु क्षमता को दबते या समाप्त होते देखते थे (जैसे- अर्जेंटीना, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील). भारत ने पहला विकल्प चुना. 

सच्चाई तो यह है कि 1963 में अमेरिका के परमाणु अस्त्र कार्यक्रम में भाग न लेने की वचनबद्धता के बावजूद 1964 में चीनी परमाणु अस्त्र कार्यक्रम को देखते हुए उसने अपनी परमाणु क्षमता के विकास का फैसला किया. 1964 में भारत ने एक प्लूटोनियम-प्रोसेसिंग प्लांट की स्थापना की. 1967-68 में परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया और 18 मई 1974 को पोखरण में एक शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण कर दिखाया. भारत का मैसेज साफ था कि वह परमाणु शक्ति-क्षमता प्राप्त करने की दिशा में बढ़ रहा है और इस विकल्प को खुला रखेगा. 

भारत ने महसूस किया कि अलग-अलग क्षेत्रों में कम-से-कम एक परमाणु अस्त्र-संपन्न राष्ट्र जरूर है. पहले इंदिरा गांधी ने मई 1974 में फिर भाजपा की वाजपेयी सरकार ने मई 1998 में परमाणु विस्फोट कर भारत को परमाणु संपन्न बना दिया. भारत ने खुलेआम अपनी परमाणु क्षमता का दावा किया और खुद को परमाणु अस्त्र-संपन्न देश घोषित किया. वैसे, 1995 में प्रधानमंत्री नरसिंह राव परमाणु-परीक्षण के काफी करीब पहुंच गए थे, मगर कई तरह के बाहरी और घरेलू दबावों ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया.

भारत के परमाणु ताकत बनने से क्या बदला?

1- दीक्षित अपनी किताब में लिखते हैं कि परीक्षणों ने भारत के परमाणु हथियार संपन्न देश होने की पुष्टि कर दी. 
2- भारत ने क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संतुलन कारक की रणनीतिक स्थिति हासिल कर ली. 
3- पांचों घोषित परमाणु शक्तियों के दुराग्रहों के बावजूद भविष्य में परमाणु हथियारों पर नियंत्रण की किसी भी कोशिश में भेदभाव वाले प्रतिबंधों में बदलाव करना ही होगा.

जब भारत ने परमाणु परीक्षण किए तब दुनिया ने काफी आलोचना की. हालांकि भारत ने साफ कहा कि यह टेस्ट सिर्फ भारत की सुरक्षा-चिंताओं से जुड़ा हुआ है और भारत अपनी इस क्षमता का प्रबंधन पूरी जवाबदेही और संयम से करेगा. इस कारण शांति और स्थिरता के लिए कोई खतरा पैदा नहीं होगा. 

भारत को खतरा क्या था?

परमाणु शक्ति बनने पर उठ रहे सवालों का जवाब सीधे भारत के सुरक्षा वातावरण से जुड़ा है, जो पश्चिम में डिएगो गार्सिया से लेकर पाकिस्तान तक और खाड़ी से लेकर हरमोज जलडमरूमध्य तक फैला हुआ है. इस पूरे क्षेत्र में कई देश हैं, जो परमाणु क्षमता संपन्न हैं. उनमें पाकिस्तान भी एक है जो कई बार भारत पर परमाणु मिसाइल हमले की धमकी दे चुका है. परमाणु हथियारवाले देशों- चीन और अमेरिका- से पाकिस्तान की निकटता को भारत नजरअंदाज नहीं कर सकता. 

दूसरे, भारत के लिए परीक्षण इसलिए भी आवश्यक थे कि यह अपनी क्षमताओं के बारे में निश्चित हो सके. भारत की जनता को इन क्षमताओं के बारे में जागरूक कर सके और आत्मविश्वास का भाव पैदा किया जा सके. भारत विरोधी मानसिकता के लोग इन परीक्षणों की टाइमिंग पर सवाल उठा रहे थे. क्या आप जानते हैं भारत ने 1998 में ये परीक्षण करने का फैसला क्यों किया? इसके दो कारण थे- पहला, ये परीक्षण तकनीकी और क्रियात्मक कारणों से जरूरी थे क्योंकि इसका उद्देश्य था महत्वपूर्ण खतरों के खिलाफ रोकथाम की क्षमता अर्जित करना. भारत इस प्रक्रिया में पहले ही देर कर चुका था, जिसकी वजह से उसकी सुरक्षा प्रभावित हुई थी. दूसरे, और अधिक देर करने का अर्थ था दंडात्मक और पक्षपातपूर्ण प्रतिबंधों से जकड़े जाना, जो 1999 के अंत तक सी.टी.बी.टी. के तहत क्रियान्वित हो जाता और निरस्त्रीकरण सम्मेलन में फिसिल मैटीरियल कट-ऑफ ट्रीटी पर वार्ता इस स्थिति को और भी गंभीर बना सकती थी.

ब्रिटेन, चीन, अमेरिका का गेम

दीक्षित लिखते हैं कि ब्रिटेन के पास 380 परमाणु हथियार थे. यहां तक कि यदि स्ट्रैटेजिक आर्म्स लिबरेशन ट्रीटी (एस.ए.एल.टी.) और स्ट्रैटजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी (START) लागू हो जाए तब भी अमेरिका अपने पास 2007 तक 10,000 परमाणु हथियार सुरक्षित रखेगा, जिनमें 3,500 रणनीतिक, 1,000 तकनीकी और 5,500 परमाणु मुखास्त्र होंगे, जबकि रूस के पास 11,000 हथियार होंगे, जिसमें 3,500 रणनीतिक, 2,500 तकनीकी और 5,000 परमाणु मुखास्त्र होंगे. फ्रांस, इंग्लैंड और चीन के परमाणु हथियारों में इस दौरान संख्या के लिहाज से कोई कटौती नहीं होगी. इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परमाणु हथियारों की इस स्थिति को देखते हुए भारत की सुरक्षा चिंताओं को वास्तविक कहा जा सकता है.

दक्षिण अफ्रीका को ‘धोखा’

भारत द्वारा परमाणु क्षमता हासिल करना राष्ट्रीय हितों की दृष्टि से तो तार्किक है ही, अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों के कारण भी सही है. इंग्लैंड और फ्रांस को परमाणु हथियारों की क्षमता हासिल करने की कोई आवश्यकता नहीं है. उन्हें अमेरिका और नाटो द्वारा परमाणु सुरक्षा की गारंटी मिली हुई है. इजराइल भी अघोषित परमाणु शक्ति-संपन्न है, जबकि उसे भी अमेरिका से परमाणु सुरक्षा की गारंटी हासिल है. अमेरिका की शह पर इंग्लैंड, फ्रांस और इजराइल परमाणु शक्ति-संपन्न बने हुए हैं. चीन द्वारा परमाणु हथियार हासिल करने के पीछे यह तर्क था कि शीत युद्ध को देखते हुए अपने आत्मविश्वास के लिए यह आवश्यक था. दक्षिण अफ्रीका के परमाणु कार्यक्रम को नेल्सन मंडेला के सत्ता में आने के समय तक समर्थन मिलता रहा. उसके बाद काले लोगों के बहुमतवाले लोकतंत्र पर गोरी रंगभेदी प्रिटोरियाई सरकार की तरह भरोसा नहीं किया जा सकता था. कोई भी इसे नहीं भूल सकता कि दक्षिण अफ्रीका को अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़ने के लिए न सिर्फ इसलिए मनाया गया, क्योंकि काले लोगों से शासित दक्षिण अफ्रीका एक विश्वस्त सहयोगी नहीं हो सकता था, बल्कि इसलिए भी कि इतने जटिल और परिष्कृत तकनीक को दक्षिण अफ्रीका में अफ्रीकियों के हाथों में नहीं दिया जा सकता था. 

अब वेनेजुएला के बाद अमेरिका का अगला टारगेट दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील ही माने जा रहे हैं.