
JNU Anti Goverment Protest: बांग्लादेश फिलहाल कट्टरपंथ की आग में झुलस रहा है. जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व में कट्टरपंथी बांग्लादेश का चरित्र बदलने की साजिश रच रहे हैं. कट्टरपंथियों का ये वैचारिक वैश्विक नेटवर्क एक सूत्र में बंधकर काम करता है. जरूरी नहीं की ये आपस में कनेक्टेड हों. हां ये वैचारिक तौर पर जरूर जुड़े रहते हैं, इनका लक्ष्य एकदम साफ होता है. पहले ये सद्भाव, भाईचारे, शांति की मीठी-मीठी बातें करते हैं. और जैसे ही अपने अनुकूल मौका देखते हैं बांग्लादेश जैसा नरसंहार करते हैं. इतिहास में इसके कई उदाहरण हैं. अब हम ऐसे ही कट्टरपंथी शाब्दिक छल की वैचारिक मरम्मत करेंगे. देश में एक संगठन है जमीयत उलेमा-ए-हिंद. देवबंदी विचारधारा से जुड़ा ये संगठन खुद को मुस्लिम उलेमा यानी इस्लामी विद्वानों का संगठन बताता है. देशभर में इसके मदरसे हैं. देवबंदी विचारधारा से जुड़े संगठन की सोच कैसी होती है आप समझ सकते हैं. इस संगठन के मुखिया अरशद मदनी ने महाराष्ट्र में एक कार्यक्रम में नफरत की राजनीति को देश के लिए खतरा बताया.
मौलाना का विवादित बयान
एक तरफ मौलाना कह रहे हैं कि नफरत की राजनीति देश के लिए खतरा है, लेकिन उसके बाद यही मौलाना ये भी कह रहे हैं कि मजहब के नाम पर जान देना शहादत है. मौलाना अरशद मदनी नफरत की राजनीति के खिलाफ जो हुंकार भर रहे हैं वो शुद्ध शाब्दिक छल है, ये बौद्धिक प्रपंच है. मौलाना नफरत को देश के लिए खतरा बता रहे हैं, लेकिन मजहब के नाम पर शहादत की बात कर लोगों को भड़का रहे हैं. इसे नफरत फैलाना ही कहते हैं. मौलाना शांति और भाईचारे की बात कर रहे हैं लेकिन धर्म के नाम पर मरने मारने की बात भी कह रहे हैं. इसे भी नफरत का प्रचार करना ही कहा जाता है. अल्पसंख्यक खतरे में हैं, अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित नहीं है. ये कहना आजकल सबसे बड़ा फैशन है, खुद को कथित प्रोग्रेसिव दिखाने के लिए आजकल ये नारा जोर-शोर से बुलंद किया जाता है. लेकिन जिस मंच से मौलाना अरशद मदनी से नफरत को देश के लिए खतरा बताया उसी मंच से कैसे उन्होंने देश के बहुसंख्यक समुदाय को धमकी दी.
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अकबरुद्दीन ओवैसी ने फैलाई नफरत
भाईचारा, शांति, आपसी प्रेम ये सब शाब्दिक आडम्बर हैं. ये दिखावा है. इसी शाब्दिक आडम्बर के नीचे कट्टरपंथ की वैचारिक हिंसा को छिपाया जाता रहा है.सोचिए जो व्यक्ति नफरत को देश के लिए घातक बता रहा है वही ये भी कह रहा है कि अगर अल्पसंख्यक एकजुट हो गए तो बहुसंख्यकों का क्या होगा, अब इसे नफरत नहीं कहा जाए तो क्या कहा जाए. ये उच्च दर्जे का बौद्धिक शातिरपना है. इसका प्रमाण आज 15 मिनट वाले बयान के लिए कुख्यात रहे अकबरुद्दीन ओवैसी ने भी दिया. एक मुहावरा आम बोलचाल में अक्सर प्रयोग होता है, मुंह में राम बगल में छुरी. यानी बाहर से भला दिखना, लेकिन अंदर से कपटी और हानिकारक होना. सोचिए जो अकबरुद्दीन ओवैसी हिंदुओं के सफाए के लिए 15 मिनट की छूट मांगते हों. जो अकबरुद्दीन ओवैसी मंच पर खड़े होकर, भीड़ के सामने कहते हैं कि अगर 15 मिनट के लिए पुलिस को हटा दिया जाए तो हम 100 करोड़ हिंदुओं को अपनी ताकत दिखा देंगे. आज वो नफरत के खिलाफ भाषण दे रहे हैं. नफरत को देश के लिए हानिकारक बता रहे हैं. इस शाब्दिक आडम्बर से सावधान रहने की आवश्यकता है. शांति, भाईचारा, नफरत विरोधी अभियान ऐसे शब्द खासतौर पर अपनी कट्टरपंथी वैचारिक चालाकी को छिपाने के लिए प्रयोग किए जाते हैं. मित्रो आज हम आपसे कहेंगे कि जो भी लोग ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं पहले उनका इतिहास खंगालें. जरूर उनके अतित की किताब में कट्टरपंथ का पन्ना मिलेगा. मौलाना अरशद मदनी और अकबरुद्दीन ओवैसी जिस नफरत को हानिकारक बता रहे हैं उसी नफरत का हिंसक प्रदर्शन नेपाल के बीरगंज में उनके वैचारिक बंधुओं ने किया. यहां हालात इतने बिगड़े कि धारा 144 लगानी पड़ी.
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नेपाल में प्रदर्शन
जानते हैं पत्थरबाजी वाले इस नफरत का सार्वजनिक प्रदर्शन क्यों हुआ, क्योंकि किसी ने सोशल मीडिया पर एक विवादित वीडियो डाल दिया था. वीडियो में मस्जिद में तोड़फोड़ की अफवाह थी. इससे पहले कि प्रशासन जांच करता, घटना की सच्चाई सामने आती, हाथों में पत्थर लिए कट्टरपंथियों की हिंसक भीड़ सड़क पर उतर आई. जो पथराव कर रहे हैं वो मुस्लिम हैं, नेपाल में अल्पसंख्यक हैं. सोचिए एक अफवाह पर ये शहर को जलाने पर उतारू हो गए. ये कट्टरपंथी अगर बहुसंख्यक होते तो क्या होता इसका प्रमाण बांग्लादेश से मिल रहा है. हमारे देश में भी ऐसी घटनाएं थोड़े दिन के अंतराल में होती रहती हैं. कट्टरपंथ सिर्फ धार्मिक नफरत का ही बाईप्रोडक्ट नहीं है. ये वैचारिक नफरत और वैचारिक हिंसा का भी हथियार है. देश की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी जेएनयू में इसी वैचारिक कट्टरपंथ और नफरत का घृणित प्रदर्शन हुआ. दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में सोमवार रात कुछ कथित उदारवादी छात्रों ने अपने विरोध को स्वर देने के लिए मर्यादा की लकीर लांघ दी. टुकड़े-टुकड़े गैंग के वैचारिक वंशजों ने देश के प्रधानमंत्री के लिए बहुत ही आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया. जेएनयू के छात्र अपनी बौद्धिक और तार्किक शक्ति के लिए देशभर में जाने जाते हैं. लेकिन उसी यूनिवर्सिटी में विरोध के नाम पर जो कुछ हुआ वो वैचारिक नफरत का साक्ष्य बन गया. वैसे ये पहली बार नहीं है जब JNU में लोकतांत्रिक अधिकार और प्रदर्शन के नाम पर नफरत का प्रदर्शन हुआ है. आपको याद होगा इसी JNU टुकडे-टुकड़े गैंग ने भारत विरोधी नारेबाजी की थी. भारत के टुकड़े-टुकड़े करने की गूंज इसी जेएनयू में सुनाई दी थी और टुकड़े गैंग के इस देश विरोधी चरित्र को ZEE NEWS ने ही दुनिया के सामने उजागर किया था. वैचारिक विविधता लोकतंत्र को जीवंत बनाती है. लेकिन जब ये विविधता कट्टरपंथ का शिकार हो जाए, दिग्भ्रमित हो जाए और कथित उदारवादी सोच से संक्रमित हो जाए तो वही होता है जो जेएनयू में हो रहा है. इन कथित उदारवादियों ने जेएनयू को नफरत की प्रयोगशाला बना दिया है. अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर जेएनयू को देशविरोधी नारेबाजी का केंद्र बना दिया है.
JNU में नारेबाजी
कथित तौर पर 5 जनवरी 2020 को कैंपस में हुए हमले की छठी बरसी के मौके पर विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया गया था. इसी दौरान साबरमती हॉस्टल के बाहर विवादित नारेबाजी हुई. इस नारेबाजी का 35 सेकंड का वीडियो वायरल हो रहा है. जेएनयू के कथित लिबरल और टुकड़े-टुकड़े गैंग के इतिहास को देखते हुए इस विवादित नारेबाजी के तार उमर खालिद औऱ शरजील इमाम से भी जुड़ रहे हैं. समझिए सोमवार के दिन ही सुप्रीम कोर्ट ने उमर और शरजील को जमानत देने से इनकार कर दिया था. और देर रात जेएनयू में नारेबाजी हुई. जेएनयू प्रशासन ने जो आधिकारिक बयान जारी किया है उसके मुताबिक शुरुआत में यह जमावड़ा सिर्फ 5 जनवरी की बरसी मनाने तक सीमित था, लेकिन उमर खालिद और शारजील इमाम की जमानत याचिकाओं पर आए न्यायिक फैसले के बाद कार्यक्रम का लहजा अचानक बदल गया. यानी दंगे की साजिश रचनेवाले, और नार्थ ईस्ट को भारत से अलग करने का ऐलान करनेवाले उमर खालिद और शरजील इमाम के समर्थन में जेएनयू के कथित लिबरल्स ने विवादित नारेबाजी की. ये एक सोची समझी साजिश थी. जेएनयू प्रशासन की अपील पर दिल्ली पुलिस ने इस मामले में केस दर्ज किया है. विवादित नारेबाजी करनेवालों की पहचान की जा रही है. नफरत का प्रदर्शन सिर्फ जुबान पर टुकड़े-टुकड़े और हमें चाहिए आजादी के नारे लगाने वाले नहीं करते या हाथों में पत्थर लिए लोग नहीं करते हैं. कई बार कानूनी दांवपेंच और प्रशासनिक फैसलों के जरिए भी सनातन विरोधी नफरत को आकार दिया जाता है. ऐसे ही एक फैसले को आज मद्रास हाईकोर्ट ने झटका दिया. मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने मदुरै पहाड़ी पर दरगाह के पास दीपस्तंभ पर दीप जलाने की इजाजत दे दी है. जस्टिस जी जयचंद्रन और जस्टिस केके रामकृष्णन की बेंच ने दीप जलाने के सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखा, कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दीप जलाने के मुद्दे को राजनीतिक रंग दिया गया. यह लंबे समय से चली आ रही धार्मिक परंपरा से जुड़ा मामला है, कोर्ट ने कहा कि जिला प्रशासन को इस मामले को समुदायों के बीच संवाद और समन्वय के अवसर के रूप में देखना चाहिए था.
सनातन विरोधी फैसले
कार्तिगई दीपम पर्व के दौरान पहाड़ी पर बने पत्थर के स्तंभ पर दीप जलाने के सनातनधर्मियों के अधिकार पर स्टालिन सरकार ने रोक लगा दिया था. स्टालिन सरकार के फैसले के खिलाफ हिंदू संगठन कोर्ट गए, हाईकोर्ट की एकल पीठ ने सनातनधर्मियों को दीपम की अनुमति दी लेकिन स्टालिन सरकार ने कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए फैसले पर अमल नहीं किया. सनातनधर्मियों को रोकने के लिए एकल पीठ के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की गई. इतना ही नहीं सनातनधर्मियों के पक्ष में फैसला सुनानेवाले जस्टिस जीआर स्वामीनाथन को हटाने के लिए संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान महाभियोग प्रस्ताव दिया गया था.
