
Assam NRC: असम में बीते दिनों अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को ढाका डिपोर्ट किया गया था. अब इसको लेकर डिपोर्ट की गई असम की एक 43 साल की विधवा महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. महिला का आरोप है कि उसे गलत तरीके से अवैध प्रवासी घोषित किया गया, जबकि उसके परिवार के सभी 16 सदस्यों राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर ( NRC) में दर्ज हैं. कोर्ट ने अधिकारियों को महिला के भाई की ओर से पेश किए गए डॉक्यूमेंट्स को वेरिफाई करने का आदेश दिया है.
अवैध प्रवासी घोषित हुई महिला
गुवाहाटी हाई कोर्ट की ओर से अगस्त 2025 में अहेदा खातून की याचिका खारिज किए जाने के बाद उन्हें 30 सितंबर 2025 को डिटेंशन सेंटर ले जाया गया था. उनके वकील अदील अहमद का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में उनका मामला लंबित होने के दौरान उन्हें 19 दिसंबर 2025 को मतिला ट्रांजिट कैंप से बांग्लादेश भेज दिया गया था. खातून ने कहा कि उनका जन्म साल 1981 में भारत में ऐसे माता-पिता के घर हुआ था जो दशकों से वोटर्स के रूप में रजिस्टर्ड थे और वह नागरिकता अधिनियम की धारा 3 (1) (A) के तहत जन्म से भारतीय हैं. NRC की फैमिली लिस्ट से पता चलता है कि याचिकाकर्ता के माता-पिता और 14 भाई-बहन यानी परिवार के सभी सदस्य NRC में एक्सेपटेड लिस्ट में हैं.
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कोर्ट के आदेश को दी चुनौती
बता दें कि महिला अपने वंश का सही तरीके से प्रमाण पेश करने में असफल रही थी, जिसको लेकर ट्रिब्युनल की ओर से उसे साल 2019 में विदेशी घोषित कर दिया गया था. उसने 5 साल से अधिक की देरी के बाद हाई कोर्ट में अपील की. याचिका खारिज होने के बाद उसे हिरासत में लिया गया. महिला ने कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि मामले की योग्यता पर विचार किए बिना विलंब के कारण उनकी याचिका खारिज कर दी गई. क्योंकि महिला के भाई ने उनकी ओर से हलफनामा दायर किया है, इसलिए कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी किया और कहा,’ याचिकाकर्ता के भाई की ओर से हलफनामा दायर किए गए दस्तावेजों की प्रामाणिकता की जांच के सीमित उद्देश्य से नोटिस जारी किया जाए.’
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याचिक में क्या कहा गया?
याचिका में कहा गया,’ फॉरनर ट्रिब्युनल ने फॉरेन एक्ट, 1946 के सेक्शन 9 के तहत उस पर एक असहनीय और कानूनी रूप से अस्वीकार्य बोझ डालकर मौलिक रूप से गलती की है, क्योंकि उसने राज्य की ओर से किसी भी खंडन या विरोधाभासी साक्ष्य के बिना उसकी ओर से प्रस्तुत वैधानिक और प्रमाणित पब्लिक डॉक्यूमेंट्स को भी खारिज कर दिया.’ इसमें आगे कहा गया,’ याचिकाकर्ता ने 9 डॉक्यूमेंट पेश किए थे, जिनमें 4 लगातार वोटर लिस्ट (1965, 1970, 1985, 1997), सेटेलमेंट, म्यूटेशन ऑर्डर, रजिस्टर्ड डोनेशन डीड, स्कूल सर्टिफिकेट और गांवबुराह सर्टिफिकेट शामिल हैं. ये सभी वंश और नागरिकता के प्राथमिक प्रमाण हैं. ट्रिब्युनल को अनुमानों और अटकलों के आधार पर इन डॉक्यूमेंट्स को खारिज करने का अधिकार नहीं था, खासतौर से तब जब राज्य की ओर से कोई विपरीत साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया था.’

