
Maharashtra BMC Election 2026: आज राजनीति में ठाकरे शब्द ट्रेंड कर रहा है. इस ट्रेंडिंग की वजह विजय नहीं बल्कि ऐतिहासिक पराजय है. महाराष्ट्र के निकाय चुनाव के आज नतीजे आए हैं. 29 में से 25 नगर निगम में बीजेपी की अगुवाई वाले गठबंधन आगे है. बीजेपी ने नई और लंबी लकीर खींच दी है. बीजेपी खेमे में जश्न का माहौल है, लेकिन मातोश्री में आज उदासी है. जो ठाकरे सत्ता में ना होते हुए भी महाराष्ट्र की राजनीति की धुरी हुआ करते थे, जो ठाकरे केंद्र और राज्य के पावर सेंटर से दूरी के बावजूद सियासत और शक्ति के शिखर पर रहते थे. वो आज शून्य पर सिमट गए हैं. जिस ठाकरे की एक आवाज पर मुंबई ठहर जाती थी. आज उसी ठाकरे को मुंबई ने ही किनारे कर दिया. देश की सबसे शक्तिशाली और धनवान नगरपालिका से भी ठाकरे की विदाई हो गई है. ठाकरे परिवार का सबसे मजबूत राजनीतिक किला आज ढह गया, जो ठाकरे कभी बीएमसी, राज्य और केंद्र की सत्ता में रहते थे, उनके पास अब सिर्फ मातोश्री ही बचा है.
मुंबई से क्यों खत्म हुआ ठाकरे राज?
आज हम आपको बताएंगे कि उद्धव के अति महात्वाकांक्षी फैसले ने क्या वाकई मुंबई से ठाकरे-राज को खत्म कर दिया? बालासाहेब ठाकरे ने जो आभामंडल तैयार किया था, वो कैसे और क्यों मिटता जा रहा है? किसी भी तरह कुर्सी बचाने के लिए उद्धव-राज ने जो भाईचारा दिखाया था, वो भी क्यों मुंबई वालों को पसंद नहीं आया? 20 साल बाद राज ठाकरे की शिवसेना परिवार में वापसी के बावजूद 30 साल की सत्ता क्यों नहीं बच पाई? और ऐसा क्यों हुआ कि आज उद्धव ठाकरे के पास दिखाने और बताने को मातोश्री के अलावा और कुछ नहीं बचा. महाराष्ट्र की 29 में से 25 महानगरपालिकाओं पर बीजेपी की अगुवाई वाली महायुति आगे है. पहली बार बीएमसी पर बीजेपी का कब्जा हुआ है. 30 सालों में पहली बार ठाकरे परिवार बीएमसी से बाहर हुआ है. उद्धव और राज ठाकरे का भाईचारा काम नहीं आया और मुस्लिम बहुल इलाकों में AIMIM का असर दिखा है.जो हुआ उसका सारांश ये है कि 30 साल में पहली बार ठाकरे परिवार पूर्ण रूप से सत्ताविहीन हो गया है. ठाकरे परिवार के पास मुंबई में कुछ नहीं बचा. जिस बीएमसी की बदौलत वो कभी कांग्रेस, NCP और अब बीजेपी से टकरा रहे थे, वो आखिरी आधार भी चला गया. जो ठाकरे परिवार बाला साहेब के रहते एक नहीं हुआ, वो एक हो गया. मराठी मान, मुंबई की पहचान और स्थानीय अधिकार को चुनाव से जोड़ा. बाहरी बनाम स्थानीय का भावनात्मक मुद्दा बार-बार उठाया, लेकिन कुछ काम नहीं आया. जब नतीजा आया तो मुंबई की राजनीति पूरी तरह से बदल गई.
समय के साथ खाली हुई ठाकरे की सियासत
मुंबई की राजनीति की पहचान रहा भगवा वहीं है, लेकिन उसपर बालासाहेब का टाइगर नहीं है. राजनीतिक जीत के भगवा पताके में अब कमल दिखने वाला है. एक पूरी पीढ़ी जिसने बीएमसी में सिर्फ शिवसेना का शासन ही देखा है, वो अब नई व्यवस्था देखेगी और बड़ी बात ये है कि 3 दशक बाद ठाकरे परिवार को बीएमसी से उसी बीजेपी ने विदा किया है, जिसकी मदद से या कहिए जिसे छोटा भाई बनाकर शिवसेना ने पहली बार वहां एंट्री की थी. यही कारण है कि मुंबई में बीजेपी बहुत बड़ा जश्न मना रही है. ऐसा जश्न इससे पहले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में ही दिखा था. एक प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक हुए फ्रेडरिक नीत्शे. उन्होंने कहा कि ‘जिससे सबसे ज्यादा निकटता होती है, उसी से मिला प्रतिशोध सबसे गहरा जख्म छोड़ता है.’ यकीनन ठाकरे परिवार के साथ यही हुआ है. आज ठाकरे परिवार को सबसे ज्यादा दर्द हो रहा होगा. 1990 की शुरुआत में बीजेपी ने ठाकरे की ऊंगली पकड़कर मुंबई में अपनी राजनीति को आकार दिया था. आज उसी मुंबई में बीजेपी ने खुद को विस्तार देकर ठाकरे परिवार को मातोश्री में समेटकर रख दिया है. इसमें कहीं से भी कोई दो राय नहीं है कि आज ठाकरे परिवार के लिए सबसे बड़े दुख का दिन है, लेकिन इसके लिए स्वयं उद्धव ठाकरे ही जिम्मेदार हैं. शिवसेना के उद्धव-काल में शिखर से शून्य तक के सफर को 2 हिस्सों में देखना आवश्यक है. एक अध्याय बीजेपी के साथ वाला है, जबकि दूसरा अध्याय बीजेपी के बाद वाला है. सबसे पहले हम आपको बताना चाहेंगे कि जब शिवसेना बीजेपी के साथ थी, तब ठाकरे परिवार का राजनीतिक सामर्थ्य क्या था? बाला साहेब ठाकरे ने शिवसेना बनाई। शिवसैनिक बनाए. शिवसेना को उन्होंने ऐसा वटवृक्ष बनाया जिसकी जड़ें गली-गली में थी। शिवसैनिक बाला साहेब के नाम की शपथ लेते थे. 1966 में पार्टी बनाकर बाला साहेब ने 1967 में ही शिवसैनिकों को चुनाव लड़वाया था। लेकिन पार्टी नहीं जीत पाई। फिर 1970, 1971, 78, 84, 85 और हर चुनाव में शिवसैनिक लड़ते थे. 1989 के चुनाव में मराठी अस्मिता और हिंदुत्व की साझा राजनीति शुरू हुई. तब पहली बार दो भगवा पार्टियों का मिलन हुआ. बीजेपी और शिवसेना मिलकर चुनाव लड़ी, हार गई, लेकिन 1995 में बीजेपी की मदद से शिवसेना ने महाराष्ट्र में सरकार बना ली. फिर एक के बाद एक बीजेपी और शिवसेना बीएमसी से लेकर केंद्र तक सत्ता साझेदार रहे.1989 से लेकर 2019 तक बीजेपी और शिवसेना साथ-साथ थी. इस दौरान ठाकरे परिवार के पास काफी सियासत थी.
लुढ़कता गया ठाकरे का ग्राफ
1995 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एक शिवसैनिक मनोहर जोशी थे, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से सरकार ठाकरे परिवार चला रहा था. सत्ता का केंद्रबिंदु मातोश्री हुआ करता था. 1997 में बीएमसी पर भी शिवसेना का कब्जा हुआ और ठाकरे परिवार ने जिसे बीएमसी का मेयर बनाया वही सत्तासीन रहा. फिर उसके ठीक एक साल बाद यानी 1998 में शिवसेना और बीजेपी ने मिलकर केंद्र में सरकार बना ली। तब केंद्र में भी शिवेसना के मंत्री हुआ करते थे. बीजेपी के बड़े-बड़े नेता बाला साहेब से मंत्रणा करने मातोश्री जाते थे. जब नरेंद्र मोदी का युग शुरू हुआ तब भी 2014 में केंद्र सरकार में शिवसेना के मंत्री थे। और वो मंत्री ठाकरे परिवार ने ही तय किया था. इतना ही नहीं 2017 से 2022 के बीच महाराष्ट्र के 15 नगरपालिकाओं पर शिवसेना बीजेपी का कब्जा हुआ करता था. कुल मिलाकर आप कह सकते हैं कि जब बीजेपी के साथ शिवसेना थी तब वार्ड सदस्य से लेकर केंद्र तक में शिवसेना की हनक थी, लेकिन तब ठाकरे परिवार किंग नहीं बल्कि किंगमेकर बनने में विश्वास करता था. ये बाला साहेब ठाकरे का स्टाइल था, जो अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता का संचालन करते थे, जिन्होंने स्वयं कभी चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन किसी को भी चुनाव लड़वाकर जितवा देते थे. मंत्री और मुख्यमंत्री भी बनवा देते थे. लेकिन शिवसेना में उद्धव-युग की शुरुआत होने के बाद किंगमेकर वाली सोच से ‘मेकर’ निकल गया. किंग पर अटक गया. अप्रत्यक्ष शासन की बजाय उद्धव में प्रत्यक्ष शासन की महत्वाकांक्षा जगी करीब 30 साल पुरानी दोस्ती को तिलांजलि दे दी. बीजेपी से अलग होकर वो मुख्यमंत्री भी बन गए, लेकिन उसके बाद ही ठाकरे परिवार का ग्राफ नीचे की ओर लुढकता चला गया. 2 साल 7 महीने तक उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री रहे, लेकिन 2022 में हाथ से वो सत्ता भी फिसल गई. 2022 में ही 56 साल पुरानी पार्टी टूट गई. जिस पार्टी को ठाकरे परिवार ने बनाया था, वो भी ठाकरे परिवार की नहीं रही. पार्टी का नाम और पहचान दोनों ठाकरे परिवार से अलग हो गया. 2024 में जब विधानसभा का चुनाव हुआ तो नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी भी नहीं मिली. और अब जब बीएमसी का चुनाव हुआ तो वहां से भी ठाकरे परिवार का कब्जा खत्म हो गया. आज की तारीख में ठाकरे परिवार ना तो केंद्र सरकार में है. ना राज्य सरकार में है. ना ही महाराष्ट्र के किसी भी नगरपालिका में है. जो कभी महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े भाई थे, वो कहीं के भी नहीं रहे. 1995 के बाद पहली बार ऐसा है जब ठाकरे परिवार के पास सिर्फ और सिर्फ मातोश्री ही बचा है. जाहिर है कि ठाकरे परिवार के लिए चिंता और चिंतन दोनों का दिन है। हम आपको सुनाते हैं कि इस हार पर ठाकरे परिवार के समर्थकों का क्या कहना है?
बालासाहेब के विचारों से उलट ठाकरे
संजय राउत ठाकरे परिवार के सबसे करीबी हैं. वो भविष्य की राजनीति का रास्ता बनाते हुए हार की तात्कालिक व्याख्या कर रहे हैं, लेकिन ठाकरे परिवार के अपने घर में भी हार की असली वजह क्या है, इसे समझने के लिए संजय राउत को टाइम रिवाइंड करना होगा. उद्धव ठाकरे को भी समझना होगा कि जब वार्ड, निकाय से लेकर राज्य और केंद्र तक वो सत्ता साझेदार थे तब उनकी ताकत क्या थी? बाला साहेब ठाकरे की शक्ति के तीन स्तम्भ थे. पहला हिंदुत्व की विचारधारा. दूसरा मराठी मानुष और तीसरा सीधा संवाद. जब शिवसेना का उद्धव युग शुरु हुआ. उद्धव की महत्वाकांक्षा ने वृहत आकार लेना शुरू किया तो ये तीनों स्तम्भ हिल गए. सबसे पहले उद्धव ठाकरे पर अपनी उस विचारधारा को तिलांजलि देने के आरोप लगे, जो शिवसेना का आधार थी. अपनी सीएम वाली जिद को पूरा करने के लिए ठाकरे ने सबसे पहले, हिंदुत्व वाली पहचान का परित्याग कर दिया. 2024 के विधानसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे ने चेंबूर जैसी मुस्लिम बहुल बस्तियों में जाकर कहा था कि ‘हमारे बीच एक दीवार थी, लेकिन अब मैं आपके सामने आया हूं.’ बीएमसी के चुनाव में भी उद्धव और आदित्य ठाकरे ने ‘मराठी-मुस्लिम’ फॉर्मूला पर जोर दिया. अपने दौर में, बाला साहेब खुलकर कहते थे कि वक्फ बोर्ड को सत्ता के समानांतर अधिकार देना गलत है, उसी वक्फ को लेकर जब नया कानून बना तो उद्धव ठाकरे मुस्लिम संगठनों की मांग के साथ खड़े दिखे. मूल सिद्धांत से भटक चुके उद्धव ठाकरे अब तक राम मंदिर भी नहीं गए हैं, जबकि 1992 में जो कारसेवा हुई थी, उसका श्रेय खुलकर बालासाहेब लेते थे. इतना ही नहीं, जिस भाई को साथ लाकर उद्धव बीएमसी का चुनाव जीतना चाहते थे वो राज ठाकरे एक बार नहीं बार-बार कह रहे थे कि वो गंगाजल नहीं पिएंगे. बीजेपी से दूरी बनाने के बाद उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस की ओर रुख किया, जो ठाकरे परिवार के लिए वैचारिक रूप से आत्महत्या जैसा था. हिंदुत्व की राह छोड़ चुके ठाकरे का कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठजोड़ करके सरकार बनाना भी मराठी मानुष को पसंद नहीं आया. इस वैचारिक यूटर्न के बाद मराठी मानुष को भी उद्धव ठाकरे पर विश्वास नहीं रहा.
