
Mumbai BMC Elections 2026: शिवसेना के डीएनए में आक्रामक हिंदुत्व और स्ट्रीट पॉलिटिक्स थी. हिंदुत्व के साथ साथ उद्धव ने स्ट्रीट पॉलिटिक्स को भी किनारे कर दिया. उद्धव ठाकरे पर ये लगातार आरोप लगते रहे कि वो शिवसैनिकों से सीधा संवाद नहीं करते. यहां तक कि विधायक और सांसदों को भी उनसे मिलने के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती है. वो मातोश्री से बाहर नहीं निकलते. यही कारण है कि वार्ड मेंबर से लेकर मेयर तक ने बगावत की. पार्टी का स्ट्रक्चर पूरी तरह हिल गया. कुल मिलाकर बाला साहेब आंदोलनकारी नेता थे जबकि उद्धव सिर्फ फाइलों के नेता बनकर रह गए. अब यही कारण है कि शिवसेना के पास अब सिर्फ मातोश्री ही बचा रह गया. बाकी सबकुछ खत्म हो गया.
असफल रही ठाकरे की राजनीति
उद्धव ठाकरे की नीति हर जगह असफल रही. बीएमसी चुनाव को किसी भी कीमत पर जीतने के लिए उन्होंने भाईचारा किया था. राज ठाकरे को वो साथ लेकर आए, लेकिन वो भी बैकफायर कर गया क्योंकि राज ठाकरे की पहचान यूपी-बिहार विरोधी की रही है. राज ठाकरे की उत्तर भारतीय विरोध की राजनीति उन पर भारी पड़ गई. मुंबई में उत्तर भारतीय विशेषकर यूपी और बिहार के वोटर करीब 20 से 25 प्रतिशत हैं। ये 50-60 वार्ड में निर्णायक भूमिका में हैं. राज ठाकरे ने उत्तर प्रदेश और बिहार से आए हुए लोगों के बारे में काफी तीखे और विवादित बयान दिए थे. अपशब्द कहा था. मारने की धमकी दी थी. उनके कार्यकर्ताओं पर मारपीट के आरोप भी कई बार लगे. इसका प्रत्यक्ष असर दिखा. गाली और बाहरी का ठप्पा लगाने की राजनीति ने इस वोट बैंक को पूरी तरह से बीजेपी के समर्थन में खड़ा कर दिया. 68 प्रतिशत उत्तर भारतीयों ने बीजेपी को वोट दिया। उत्तर भारतीयों का सिर्फ 19 प्रतिशत वोट ही ठाकरे को मिला. यूपी-बिहार के लोगों ने एकजुट होकर उस पार्टी को चुना जिसने उन्हें सुरक्षा और सम्मान का वादा दिया.
‘जो सबसे शक्तिशाली होता है वही नहीं बचता…’
सिर्फ उत्तर भारतीय ही नहीं, दक्षिण भारतीयों का साथ भी बीजेपी को मिला. इसमें भी बड़ा योगदान ठाकरे बर्दर्स के अपशब्दों का है. जिस तरह राज ठाकरे ने बीजेपी के नेता अन्नामलाई को तमिलनाडु की रसलमाई कहा. उसने दक्षिण भारतीयों को खफा कर दिया. 61 प्रतिशत दक्षिण भारतीयों ने बीजेपी को वोट किया. बीएमसी से ठाकरे परिवार की विदाई के बाद अब रसमलाई शब्द भी सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है. चार्ल्स डार्विन ने कहा है कि ‘जो सबसे शक्तिशाली होता है वही नहीं बचता, बल्कि वो बचता है जो बदलाव के अनुरूप खुद को ढाल लेता है.’ उद्धव ठाकरे खुद को बदलाव के अनुरूप नहीं ढाल पाए. वो राजनीति के उस मर्म को नहीं समझ पाए, जिसका संकेत स्पष्ट था और वो संकेत ये था कि महाराष्ट्र में अब उन्हें बड़े नहीं बल्कि छोटे भाई की भूमिका में आना चाहिए. भूमिका बदलने की बजाय उन्होंने गठबंधन बदल लिया और स्थिति ये हो गई कि अब उनके पास कुछ नहीं बचा है. आज जब ठाकरे राज और बदलाव की बात हो रही है तो एक शख्स की चर्चा करना आवश्यक है. वो हैं देवेंद्र फड़णवीस, जिन्होंने पिछले 12 सालों में सियासी बदलाव के अनरुप खुद को ढाला है. कभी मुख्यमंत्री बने। फिर उपमुख्यमंत्री बन गए. फिर से मुख्यमंत्री बन गए और अब उन्होंने ना सिर्फ ठाकरे को सिर्फ मातोश्री तक समेट कर रख दिया बल्कि महाराष्ट्र में भगवा राजनीति को उस ऊंचाई तक लेकर गए, जो सफलता के लिहाज से इससे पहले कभी नहीं पहुंचा. पहले देवेंद्र फड़णवीस की अगुवाई में ही पहली बार बीजेपी को विधासनसभा में 132 सीटें मिली। और अब बीएमसी पर भी पूर्ण रूप से बीजेपी ने कब्जा कर लिया है. पहली बार बीएमसी में पूर्ण बहुमत हासिल करने के बाद देवेंद्र फड़णवीस ने उद्धव पर एक और नश्तर चलाया.
फडणवीस का संदेश
फडणवीस का संदेश स्पष्ट है. महाजीत के बाद वो ये संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि जिस हिंदुत्व से उद्धव ठाकरे भटक गए हैं, उसी के आसरे बीजेपी की राजनीति आगे बढ़ रही है. महाराष्ट्र में बीजेपी की भगवा राजनीति के विस्तार में देवेंद्र फड़णवीस का महत्वपूर्ण योगदान है. महाराष्ट्र में 29 बड़ी महानगर पालिका हैं. 2014 में फड़णवीस पहली बार मुख्यमंत्री बने तो बीजेपी के पास 5 महागनरपालिका थी. नागपुर, जलगांव, अकोला, अमरावती, सोलापुर, नांदेड़. ये चुनाव फड़णवीस के मुख्यमंत्री बनने से पहले हुआ था. फड़णवीस के सीएम बनने के बाद 2017 में पहला नगरपालिका चुनाव हुआ। उसमें 13 महानगरपालिकाओं में बीजेपी ने अपने दम पर मेयर बनाया और इस बार 2026 के चुनाव में बीजेपी तो मुंबई, पुणे, ठाणे, नागपुर, नासिक समेत 25 महागनरपालिकाओं में बीजेपी अपने गठबंधन के साथ आगे है, लेकिन सबसे बड़ी जीत मुंबई की है. जहां पर लंबे समय तक ठाकरे नाम का ‘मुंबई-पास’ था. वो अब बीजेपी के पास आ चुका है और इसमें सबसे बड़ा योगदान देवेंद्र फड़णवीस का है, जिन्होंने हवा के रूख के हिसाब से समीकरण बनाया और उस समीकरण को भगवा सिद्धांत से सिद्ध भी कर दिया. बीजेपी की इस जीत पर तरह तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही है. हम आपको बीजेपी के नेता नीतेश राणे को सुनाना चाहेंगे. ठाकरे परिवार के साथ जो हुआ वो बहुत बड़ी सीख है कि किसी को गुरुर नहीं करना चाहिए. समय सबका हिसाब करता है. जिस परिवार ने मुंबई में एकछत्र राज किया हो, जिसने चार दशकों से अप्रत्यक्ष रूप से बीएमसी को चलाया हो, वो पूरी तरह सत्ताविहीन हो चुके हैं. इस सच से उनलोगों को भी सीखना चाहिए जो आज शिवसेना की दुर्गति पर अट्टाहास कर रहे हैं. उनका भी समय एक जैसा नहीं रहेगा. ये प्रकृति का नियम है. विशेषकर राजनीति में तो बिल्कुल ही नहीं कहा जा सकता है कि कौन कब कहां किस हालात में रहेगा. जीत के जश्न में आत्मसंयम बहुत जरूरी है. आत्मविश्वास को अहंकार में बदलने से बचना चाहिए.
