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Noida Techie Drowning Case: जो सिस्टम नोएडा में 80 मिनट तक जान बचाने की जगह बहाना बनाता रहा वही सिस्टम और ऐसे ही कर्मचारी अगर सरहद पर देश की सुरक्षा के लिए पहुंच जाएं तो दुश्मन देश के सैनिक भारत में 7 किलोमीटर अंदर आकर कब्जा कर सकते हैं. अगर ऐसे ही लोगों के जिम्मे हवाई व्यवस्था आ जाए तो 3 हजार उड़ानें रद्द हो जाएंगी और एयरलाइंस कंपनियों को 8 सौ से डेढ़ हजार करोड़ रूपये का नुकसान तत्काल होगा. इसके अलावा यात्रियों को भारी असुविधा और अर्थव्यवस्था का जो नुकसान होगा वो अलग.   अगर बैंकिंग सिस्टम में ऐसे-ऐसे लोग हों और गड़बड़ी होने पर 80 मिनट तक ऐसे बहाने बनाते रहें तो 8 हजार करोड़ रूपये तक का नुकसान हो सकता है और अगर 80 मिनट तक स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह बाधित हो जाए तो आफत आ जाएगी. आर्थिक नुकसान से कहीं ज्यादा मानवीय त्रासदी होगी. 

अधिकारियों को कितना फर्क पड़ा? 

लापरवाहों की संयुक्त टोली ने कितना बड़ा अपराध किया है. इसलिए इसे सिर्फ एक युवक की मौत की तरह मत देखिए. लापरवाही की तीव्रता को समझिए. यहां सिर्फ युवराज नहीं डूबा है बल्कि हमारा वर्तमान और भविष्य भी डूबा है. विश्वास डूबा है. उम्मीद डूबी है. प्रतीक्षा डूबी है, मानवता डूबी है और पूरी की पूरी व्यवस्था डूबी है. इतना सबकुछ डूब गया उस पानी में. शायद एक चुल्लू पानी और होता. क्या ही फर्क पड़ता है? किसे फर्क पड़ता है? सरकार को? सिस्टम को? अधिकारी को? कर्मचारी को? समाज को? जहां आधी रात में एक लड़के को डूबता देखकर कर्मचारियों को फर्क नहीं पड़ा. वहां उनके अधिकारियों को कितना फर्क पड़ा है वो जानते हैं. युवराज की इस हत्याकांड में नोएडा अथॉरिटी ने एक जूनियर इंजीनियर को बर्खास्त किया है. पुलिस ने 2 रियल एस्टेट डेवलपर कंपनियों के खिलाफ FIR दर्ज की है. अन्य संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं, ताकि पता चले कि सुरक्षा व्यवस्थाओं में चूक क्यों हुई? और अब जिंदगी छीनने वाले गड्डों को ईर्द-गिर्द लाइटें भी लगा दी गई है. बस, इतना ही फर्क पड़ा है. नोएडा अथॉरिटी ने एक जूनियर इंजीनियर पर कार्रवाई करके लिपापोती करने की कोशिश की तब जाकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संज्ञान लिया. उन्होंने नोएडा अथॉरिटी के CEO डॉक्टर लोकेश एम को सबसे पहले हटाया. उन्हें प्रतीक्षा सूची में डाल दिया गया है. ये वही लोकेश एम है, जिन्होंने सिर्फ एक कैलेंडर पर फोटो छापने के कारण एक्शन ले लिया था. 

अधिकारियों की लापरवाही ने ली जान 

इसी महीने के पहले हफ्ते में नोएडा मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के वार्षिक कलैंडर में बिना अनुमति अधिकारियों की फोटो छाप दी गई थी. इस पर  NMRC के एक्टिंग डायरेक्टर और नोएडा ऑथोरिटी के OSD महेंद्र प्रसाद को तत्काल पद से हटा दिया गया था.  इन्हें लखनऊ मुख्यालय से अटैच कर दिया गया था, जबकि कैलेंडर विमोचन में खुद नोएडा ऑथोरिटी के सीईओ लोकेश एम भी थे, लेकिन एक लड़के मौत हो गई. इस सिर्फ कार्रवाई के नाम पर रस्मअदायगी कर रहे थे.  इसीलिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया है. सीएम के निर्देश पर घटना की जांच के लिए मंडलायुक्त मेरठ के नेतृत्व 3 सदस्यीय SIT बनी है, जो 5 दिनों में रिपोर्ट देगी. नोएडा के सेक्टर 150 में ये हादसा हुआ उसे लोटस ग्रीन नाम के बिल्डर को अलॉट किया गया था. जिस लोटस ग्रीन नाम के बिल्डर को ये जमीन स्पोर्ट्स सिटी बसाने के लिए आवंटित किया गया था उसने इसे 24 अलग-अलग बिल्डर कंपनियों को सबलीज करके दे दिया, जिन्हें लीज पर मिला वो इसमें कॉमर्शियल कंस्ट्रक्शन करने लगे. जिस जमीन पर हादसा हुआ है, वहां पर अर्थ बिल्डर कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स का निर्माण कर रहा था. कोरोना से पहले ही उस पर अथॉरिटी ने रोक लगा दी थी. 6 साल हो गए, लेकिन वहां पर ना तो लाइट की व्यवस्था थी. ना ऊंची दीवारें थी और ना ही ऐसा कोई इंतजाम किया गया था जिससे हादसा ना हो.  इस मौत वाली लापरवाही के लिए नोएडा ऑथोरिटी के CEO लोकेश एम के बाद उनके असिस्टेंट करुणा करुणेश पर कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए? प्रोजेक्ट के जीएम एके अरोरा से क्यों नहीं पूछा जा रहा है कि इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हुई? जिसे नोएडा का सबसे पॉश इलाका कहकर लोगों को करोड़ों में घर बेचा गया, वहां सड़क किनारे इतना बड़ा जानलेवा गड्ढा क्यों था?

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80 मिनट में भी नहीं बचाया जा सका युवक 

नोएडा अथॉरिटी के डीजीएम विजय रावल पर इस बात की कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए कि निर्माण स्थल को चारों तरफ से क्यों नहीं ढंका गया था. बेसमेंट खोदकर छोड़ दिया गया इसकी जवाबदेही इनकी ही बनती है. विजय रावल के नीचे जो सीनियर मैनेजर हैं उन्हें क्यों नहीं जिम्मेदार ठहराया जा रहा है? जो अर्थ बिल्डर प्रोजेक्ट डेवलप कर रहा है, उसके मालिक को क्यों नहीं जेल भेज देना चाहिए था? लेकिन क्या हुआ है? बिल्डर पर केस दर्ज हुआ है. जिन घोषित साहसी कर्माचारियों को ठंड लग रही थी उन्हें क्यों नहीं अब तक लिहाफ में चैन से गर्माकर सोने के लिए जेल भेज दिया गया? लेकिन नहीं। क्या फर्क पड़ता है? एक जूनियर इंजानियर को हटा दिया गया। हो गया. जिस दिल्ली में तंत्र का जाल है. सरकार है. सुप्रीम कोर्ट है. मंत्री हैं. संतरी हैं. वहां से करीब 40 किलोमीटर दूर एक लड़के को 80 मिनट में भी नहीं बचाया जा सका. सोचिए झारखंड के झुमरी तिलैया और ओडिशा के कालाहांडी में किसी के साथ कुछ हो गया तो क्या होगा? इसलिए अगर ये मान लेंगे कि नोएडा की किसी मोड़ पर घटना हुई. कोई युवराज नाम का लड़का मर गया. संवेदना और श्रद्धांजलि के दो शब्द बोल दिए. आगे सब ठीक हो जाएगा. तो फिर कुछ नहीं हो सकता. ये छोटी बात नहीं है. बिल्कुल भी नहीं है. इसे समझना होगा.