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Greater Bengaluru Authority Order: मेट्रो सिटी या टू टियर, हर शहर में आबादी और विकास योजनाओं में संतुलन जरूरी है. किसी डूब क्षेत्र में कॉलोनी खड़ी कर देने जैसे जुगाड़ से कोई बस्ती या सोसायटी नहीं बस जाती. सोसायटी बसाने में मास्टर प्लान जैसा सिस्टम काम करता है. ग्रेटर बेंगलुरू अथॉरिटी की बात करें तो शहर की नई नगरपालिका की संरचना में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के हिसाब से एक बुनियादी समस्या पैदा हो गई है. यहां किसी वार्ड में 10 हजार से कम मतदाता हैं, तो किसी में 50 हजार से ज्यादा वोटर हैं.

वार्डों में मतदाता असंतुलन का नुकसान

शहरों में बसावट का स्वरूप बदलता रहता है, जिसमें उपनगरीय फैलाव (suburban sprawl) भी शामिल होता है. जाहिर है जहां ज्यादा वोटर होंगे, उस इलाके के जनप्रतिनिधियों (पार्षद/विधायक) के साथ पुलिस-प्रशासन पर उनका अधिक दबाव होगा. इससे उनके इलाके के विकास के काम तेज गति से होंगे. वहीं दूसरी तरफ वोट बैंक पॉलिटिक्स और तुष्टिकरण जैसे सिस्टम के चलते कम मतदाताओं वाले वार्डों में जनभावनाओं की उपेक्षा होने का खतरा बढ़ेगा. वहां छोटी-छोटी समस्याओं का निस्तारण होने में ज्यादा वक्त लग सकता है.

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