
UGC rules analysis: यूजीसी की नई गाइडलाइंस का देशभर में विरोध हो रहा है. एक तरफ लोग सड़कों पर उतरे हैं. दूसरी तरफ इस्तीफे हो रहे हैं. इस बीच कुछ मौकापरस्त लोग सियासी तौर पर विवाद के अग्निकुंड में घी डाल रहे है. ये मुद्दा संवेदनशील है. संवेदनशील इसलिए है क्योंकि ये छात्रों से यानी देश के भविष्य से जुड़ा है. सवाल है कि क्या आज के दिन UGC की नई गाइडलाइंस पर विवाद होना चाहिए या शिक्षा के बेहतर बनाने वाले बदलाव पर चर्चा होनी चाहिए.
‘सिस्टम से हमारे सवाल’
आज सवाल ये भी है कि जो युवा आबादी देश की सबसे बहुमूल्य संपत्ति है उसे जाति के आधार पर बांटकर आमने-सामने खड़ा करना चाहिए या उसे एकजुट कर देश के भविष्य को सुनहरा बनाना चाहिए
ये बड़े सवाल हैं. आपके-हमारे देश के भविष्य से जुड़े सवाल हैं, इसलिए आज इन सवालों का जवाब तलाशना जरूरी हैं. लेकिन सबसे पहले हम आपको UGC गाइडलाइंस से जुड़े विवाद पर आज का अपडेट बताते हैं
UGC विवाद को लेकर तीन बड़े अपडेट
पहला- मंगलवार को बजट सत्र से पहले ऑल पार्टी मीटिंग के दौरान UGC की नई गाइडलाइंस को लेकर चर्चा हुई. दूसरा- नई गाइडलाइंस को लेकर बीजेपी के कुछ नेता विरोध कर रहे है. कई नेताओं ने संशोधन की मांग की है तो कई ने इस्तीफा दे दिया है. तीसरा-नई गाइडलाइंस को लेकर मंगलवार को देश के 6 राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुआ.
मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़, दिल्ली से लेकर लखनऊ और बिहार से लेकर राजस्थान तक आज प्रदर्शन हुए. एक तरफ सवर्ण छात्र और सवर्णों से जुड़े संगठन नई गाइंडलाइंस का विरोध कर रहे हैं तो इसके समर्थन में भी आवाज उठ रही है.
ये विवाद देशव्यापी है. इसलिए ये जरूरी सवाल बनता है कि आज क्या UGC की नई गाइडलाइंस की जरूरत थी या शिक्षा को रोजगार से जोड़ने और शिक्षा की गुणवत्ता यानी क्वालिटी में सुधार पर चर्चा की जरूरत है. ये सवाल क्यों जरूरी है पहले इसे समझते हैं.
दुनिया में शिक्षा की गुणवत्ता को मापने का सबसे उच्च मानदंड वाले मॉडल का नाम है Programme for International Student Assessment. इसे संक्षेप में पीसा क्वालिटी इंडेक्स कहते हैं. 2009 में भारत आखिरी बार इस प्रोग्राम में शामिल हुआ था. साल 2009 में भारत पीसा क्वालिटी इंडेक्स में 74 देशों में 72वें स्थान पर रहा था. आज से सत्रह साल पहले भारत 74 में से 72वें स्थान पर था. मतलब दुनिया में सबसे खराब शिक्षा वाले देशों में तीसरे नंबर पर. इसी से समझ सकते हैं कि दूसरे देशों के मुकाबले हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था का हाल कैसा रहा. अब सोचिए क्या आज चर्चा और प्रदर्शन शिक्षा में सुधार के लिए नहीं होना चाहिए, क्या UGC जैसे संस्थान को शिक्षा में सुधार के लिए नियम नहीं बनाना चाहिए. लेकिन नियम बनता किस पर है जातिगत भेदभाव पर.
ये मुद्दा युवाओं से जुड़ा है. देश के भविष्य से जुड़ा है. सिस्टम की जिम्मेदारी बनती है कि युवाओं के लिए अच्छी शिक्षा व्यवस्था हो. लेकिन सिस्टम क्या कर रहा है. उन्हें जाति के नाम पर बांट रहा है. इस सिस्टम ने युवाओं के लिए कैसी शिक्षा व्यवस्था बनाई है उसे समझने के लिए एक और रिपोर्ट आपसे शेयर कर रहे हैं. ये शिक्षा पर ग्लोबल कंपटेटिव रिपोर्ट है. 2017 -18 की इस रिपोर्ट में
उच्च शिक्षा और ट्रेनिंग में भारत 75वें स्थान पर है. यानी अगर दुनिया में हाइर एजुकेशन से जुड़ी कोई नौकरी आती है तो हमारे देश के नौजवानों को 75वें नंबर पर ये नौकरी मिलेगी. स्कील फिट यानी नौकरी के लिए योग्यता के मामले मे भारत 37वें नंबर पर है. यानी योग्यता के मानदंड पर नौकरी मिले तो भारत में 100 में से 63 लोगों को नौकरी नहीं मिलेगी. गणित और विज्ञान की पढ़ाई की गुणवत्ता में भारत 37वें नंबर पर है. स्कूल में इंटरनेट एक्सेस के मामले में भारत 49 वें स्थान पर है. वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स 2025 में IIT बॉम्बे 118वें और IIT दिल्ली 150वें नंबर पर हैं
शिक्षा की ये हालत एक दिन में नहीं हुई है. ये बीमारी पुरानी है. यूपीए सरकार के दौरान 2011-12 की ग्लोबल कंपटेटिव रिपोर्ट में
उच्च शिक्षा और ट्रेनिंग में भारत का स्थान 90 नंबर पर था. स्कील फिट में भारत का नंबर 100 से ऊपर था. गणित और विज्ञान की पढ़ाई की गुणवत्ता में भारत का 60वें नंबर पर था. स्कूल में इंटरनेट एक्सेस के मामले में भारत 120 नंबर पर था.
यानी पिछले कुछ साल में हम थोड़ा सा ऊपर हुए लेकिन प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक किसी भी इंडेक्स में हम टॉप फाइव में नहीं है. टॉप-5 तो छोड़िए टॉप-10 में नहीं हैं. हम कहां हैं. कभी 74 में से 72 वें नंबर पर. कभी 75 वें नंबर पर. सोचिए गणित और विज्ञान जैसे विषय तो छात्रों की सोच को वैज्ञानिक नजरिया देते हैं. उन्हें जाति-धर्म के संकुचित दायरे से बाहर निकलते हैं वहां भी हम टॉप 10 में नहीं हैं.
इसलिए समान्य तर्क प्रणाली से सोचना चाहिए की इस वक्त की बड़ी जरूरत क्या है. छात्रों को OBC-SC-ST और जनरल के खांचे में बांटनेवाली गाइडलाइन या शिक्षा का स्तर सुधारने वाली गाइडलाइन. हमें आज शिक्षा के मामले में टॉप 5 देशों में शामिल होने के लिए गाइडलाइन लाना चाहिए या छात्रों को जाति में विभाजित करनेवाली गाइडलाइन लानी चाहिए.
आगरा में बीजेपी के पूर्व सभापति ने खून से खत लिखकर संशोधन की मांग की है. रायबरेली में बीजेपी किसान मोर्चा के मंडल अध्यक्ष श्यामसुंदर त्रिपाठी ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. औरैया में बीजेपी के पूर्व जिला अध्यक्ष ने तो UGC को खत्म करने की ही मांग कर दी है.
बीजेपी के राज्यसभा सांसद मनन मिश्रा ने भी UGC के नए नियमों का खुलकर विरोध कर दिया है. लखनऊ में बीजेपी के 11 पदाधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया है.
आर्थिक सर्वे की रिपोर्ट से समझिए असल दिक्कत कहां है?
शिक्षा हमें आत्मनिर्भर बनाती है, ना कि जाति के नाम पर लड़ाती है. इसलिए ये भी जानना जरूरी है कि देश के सिस्टम ने शिक्षा का जो ढांचा बनाया है क्या वो वाकई देश के भविष्य कहे जाने वाले नौजवानों को आत्मनिर्भर बना रहा है. हमारा एजुकेशन सिस्टम युवाओं को रोजगार से जोड़ रहा है या नहीं. इसकी जानकारी आपको साल 2024-25 के आर्थिक सर्वे की रिपोर्ट के हवाले से देते हैं.
8 दशमलव 25 प्रतिशत ग्रेजुएट के पास ही ठीक-ठाक नौकरी है. 50% ग्रेजुएट अपनी योग्यता से कम दर्जे की नौकरी कर रहे हैं. मतलब ग्रेजुएशन करनेवाला 10th पास की नौकरी कर रहा है. क्योंकि वो ग्रेजुएशन स्तर की नौकरी करने के योग्य नहीं है. ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन करनेवाले 44% युवा बेरोजगार हैं. यानी ग्रेजुएशन करनेवाले 100 में से सिर्फ 56 युवा ही काम कर रहे हैं.
फर्क समझने के लिए शिक्षा और रोजगार से जुड़े इसी मानदंड पर दूसरे देशों के आकंड़े को भी एक बार देखते हैं.
जापान में 97% ग्रेजुएट नौकरी कर रहे हैं. नीदरलैंड्स में 93%. जर्मनी में 92%. अमेरिका में 88% और यूरोप में 85%.
फर्क समझ रहे हैं. जापान में ग्रेजुएशन करनेवाले 100 में से 97 युवाओं को रोजगार मिलता है. भारत में सिर्फ 56 नौजवानों को ही रोजगार मिलता है. उसमें से महज 4 ही अपनी योग्यता के मुताबिक काम कर रहे हैं. यानी सिस्टम ने शिक्षा का जो ढांचा बनाया है वो रोजगार नहीं दे रहा है. इसलिए इसमें बदलाव की मांग हो रही है
अब सोचिए आज के दिन गाइडलाइन किस विषय पर जारी होनी चाहिए. छात्रों को बांटने के लिए या शिक्षा में सुधार और उसे रोजगार से जोड़ने के लिए. देश और युवाओं के हित में गाइडलाइन तो एजुकेशन क्वालिटी में सुधार और उसे रोजगार से जोड़ने के लिए ही जारी होनी चाहिए थी. लेकिन गाइडलाइन जारी हुई है विवाद बढ़ानेवाली, छात्रों को जाति के आधार पर बांटने वाली.
क्या UGC जैसे आकादमिक एजेंसियों ने जो एजुकेशन सिस्टम बनाया है वो नौजवानों का सर्वांगीण विकास कर रहा है. आंकड़े तो यही बता रहे हैं कि नहीं. फिर गाइडलाइन तो इसी पर जारी होनी चाहिए थी.
विदेशों में कैसी है व्यवस्था?
जर्मनी ने व्यावसायिक शिक्षा पर फोकस किया. वहां छात्रों के लिए शिक्षा का डुअल सिस्टम है. यानी पढ़ाई के साथ ही कंपनी में ट्रेनिंग मिलती है. नतीजा ये है कि जर्मनी में 92 प्रतिशत ग्रेजुएट्स को नौकरी मिलती है.
फिनलैंड में कौशल आधारित एजुकेशन सिस्टम हैं. यहां छात्रों को थ्योरी के साथ स्किल सिखाई जाती है. इसका फायदा ये है कि फिनलैंड में 88 प्रतिशत ग्रेजुएट्स को नौकरी मिलती है. वहां कुल रोजगार का आंकड़ा 70 प्रतिशत से ज्यादा है.
सिंगापुर जैसे छोटे देश ने शिक्षा को और आधुनिक बनाते हुए इसे AI से जोड़ा है. सिंगापुर 2022 में PISA रैकिंग में नंबर 1 रह चुका है. यहां 87 प्रतिशत ग्रेजुएट्स को नौकरी मिलती है.
यानी तकनीक के विकास के साथ इन देशों ने शिक्षा में तार्किक सोच, इनोवेशन, प्रैक्टिकल लर्निंग, रिसर्च और कौशल विकास से जोड़ा.
लेकिन हमारी एजुकेशन एंजेसियों ने क्या किया. हमारे यहां अब भी फोकस थ्योरी, रोट लर्निग यानी रटंत विद्या पर ही रहा है
80 साल में जिन देशों ने शिक्षा प्रणाली में बदलाव किया वो तेज गति से आगे बढ़े. लेकिन हमारे देश में शिक्षा से जुड़ी UGC जैसी एजेंसियों ने क्या किया, और क्या कर रही हैं. रटंत विद्या को प्रोत्साहन दिया और कैंपस में विभाजन वाली गाइडलाइन जारी कर रही हैं. हम फिर ये सवाल पूछेंगे कि आज क्वालिटी एजुकेशन पर गाइलडाइन क्यों नहीं लाई जाती है.
क्यों नहीं ऐसी गाइडलाइन लाई जाती है जो हमारे नौजवानों को रोजगार दिलाए. ऐसी शिक्षा दिलाए जिससे ग्रेजुएशन करते ही छात्रों को अच्छी जॉब मिल सके. क्यों यूनिवर्सिटी में छात्रों को बांटनेवाली गाइडलाइन लाई जाती है.
नेल्सन मंडेला ने कहा है कि शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है जिससे आप दुनिया को बदल सकते हैं. सोचिए, दुनिया को बदलने में सक्षम शिक्षा व्यवस्था ही विवाद में है. पहली नज़र में ये लग सकता है कि विवाद तो कॉलेज और यूनिवर्सिटी में हो रहा है. हमारा इससे क्या मतलब. लेकिन रुकिए. अगर आज आप इससे प्रभावित नहीं है तो कल जरूर प्रभावित होंगे. क्यों और कैसे ये समझिए.
#DNAमित्रों | UGC Vs छात्र..आज का विश्लेषण निर्णायक है, Gen Z को ‘जाति की जंग’ में किसने फंसाया?#DNA #DNAWithRahulSinha #UGC #UGCControversy #GenZ #Students @RahulSinhaTV pic.twitter.com/lMS0sbj1gK
— Zee News (@ZeeNews) January 27, 2026
भारत में करीब 30 करोड़ परिवार हैं. 90 फीसदी परिवारों के बच्चे स्कूल जाते हैं. 30 फीसदी परिवारों के बच्चे कॉलेज-यूनिवर्सिटी में पढ़ने जाते हैं.
देश के हर तीसरे परिवार का सदस्य कॉलेज या यूनिवर्सिटी में है. इसलिए ये मुद्दा देश के हर तीसरे नागरिक को प्रभावित करने वाला है. जिनके बच्चे आज कॉलेज और यूनिवर्सिटी में नहीं है वो आनेवाले दिनों में कॉलेज में जाएंगे. तो जो आज इस विवाद से प्रभावित नहीं हैं वो कल जरूर प्रभावित होंगे. इसलिए गाइडलाइंस पर हो रहा ये विवाद हम सभी से जुड़ा है.
यूजीसी ने जो गाइडलाइंस जारी किया है उसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि यूनिवर्सिटी कैंपस में भेदभाव को रोकना जरूरी है. सवाल ये है कि क्या पहले से ऐसा कोई कानून नहीं था. कानून तो था.
2001 में सुप्रीम कोर्ट ने रैगिंग को गंभीर अपराध बताया था.
2007 में राघवन कमेटी ने रैगिंग पर 24 घंटे में FIR दर्ज करने की सिफारिश की थी.
2009 में यूजीसी ने एंटी रैगिंग गाइडलाइंस जारी की थी, इसमें रैगिंग को अपराध माना गया है. रैगिंग के आरोपी को सस्पेंड करने और जेल की सजा देने का प्रावधान भी था.
मतलब भेदभाव के खिलाफ कानून था. स्वयं UGC ने नियम बनाए थे. फिर भेदभाव क्यों नहीं रुका. भेदभाव के शिकार रोहित वेमुला ने साल 2016 में आत्महत्या की थी. इसका सीधा और तर्कसंगत जवाब है भेदभाव रोकने के लिए बने कानून को सही तरीके से लागू नहीं किया गया. ये जिम्मेदारी किसकी थी. UGC की थी. यूनिवर्सिटी की थी. और बड़ा सवाल ये है कि क्या यूनिवर्सिटी कैंपस में सिर्फ जाति देखकर ही भेदभाव होता है. क्योंकि जो गाइडलाइंस है उसमें खासतौर पर जाति को रेखांकित किया गया है. विवाद भी जाति से जुड़ा है. इसलिए भेदभाव और जाति के सवाल को नए नजरिए से देखने की जरूरत है.
2009 में अमय पांडे ने रैगिंग से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी. अमय ब्राह्मण जाति से थे.
2009 में ही पंजाब के नवदीप सिंह ने रैगिंग से परेशान होकर जान दे दी. वो सामान्य वर्ग से ही थे.
2010 में पुणे के गौरव सदानंद ने सीनियर्स की मानसिक प्रताड़ना से परेशान होकर हॉस्टल के कमरे में फांसी लगा ली, गौरव सामान्य वर्ग से आते थे.
सच्ची शिक्षा का लक्ष्य क्या है?
लिस्ट लंबी है. परेशान करनेवाली है. इसलिए हमने सिर्फ तीन उदाहरण ही लिए है. भेदभाव रोकने के नाम पर गाइडलाइन बनाने वालों को समझना चाहिए कि रैगिंग और भेदभाव जाति के आधार पर नहीं होती है. मित्रों, रैगिंग और भेदभाव करनेवाला..जाति देखकर रैगिंग नहीं करता है. उसकी मानसिकता होती है. ये लोग किसी भी जाति के हो सकते हैं. और जिन छात्रों से भेदभाव या रैगिंग की जाती है..उनमें भी सभी जाति के छात्र पीड़ित बनते हैं. किसी एक जाति से नहीं. इसलिए जरूरी है इसके मूल पर प्रहार करना. यानी भेदभाव करनेवालों की सोच को बदलना. क्या गाइडलाइंस बना देने भर से भेदभाव खत्म हो जाएगा. सोच बदल जाएगी. इस सवाल का जवाब छात्रों के बीच भेदभाव करनेवाली गाइडलाइन बनानेवालों को देना होगा. क्या नए शब्द जोड़ने और बवाल खड़ा करने से भेदभाव खत्म हो जाएगा. इसका तार्किक जवाब गाइडलाइन बनानेवालों को देना चाहिए
प्रसिद्ध अमेरिकी विद्वान मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा है कि शिक्षा का कार्य गहराई से और गंभीर रूप से सोचना सिखाना है. बुद्धिमत्ता के साथ चरित्र. यही सच्ची शिक्षा का लक्ष्य है.
इसलिए ये सवाल है कि क्या UGC जाति देखकर छात्रों को भेदभाव से बचाना चाहता है. मतलब ये कैसी सोच है. जो छात्रों को जातिभेद की नज़र से देखती है. क्या अच्छा नहीं होता कि गाइडलाइंस के दायरे में सिर्फ छात्रों को रखा जाता. जाति वाला भेदभाव नहीं किया जाता. हम गाइडलाइंस का विरोध नहीं कर रहे हैं. सवाल सिर्फ इतना है कि सभी छात्रों को समान भाव से क्यों नहीं देखा जा रहा है.छात्रों को आपस में क्यों बांटा जा रहा है?
देश में पहले ही कितना विभाजन है. कहीं हिंदू-मुसलमान वाला विभाजन है. कहीं प्रांत वाला विभाजन है. कहीं गरीब-अमीर वाला विभाजन है. मतलब कदम-कदम पर पहले से ही भांति-भांति के विभाजन हैं. ऐसे में विभाजन की एक और दीवार खड़ी करने का क्या ही मतलब था. क्या अच्छा नहीं होता कि एक समावेशी गाइडलाइन बनाई जाती जिसमें सभी छात्रों को शामिल किया जाता.
भारत की करीब 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम उम्र की है. दुनिया इसे भारत की सबसे बहुमूल्य संपत्ति मानती है. क्योंकि नौजवान आबादी तरक्की का इंजन होती है. ये देश का भविष्य है. इनोवेशन से लेकर प्रोडक्शन तक सभी क्षेत्रों में नौजवान आगे रहते हैं. लेकिन गाइडलाइन के नाम पर उसी नौजवान आबादी को जाति के नाम पर बांटा जाता रहा है.
हम गाइडलाइन बनानेवाले नीति नियंताओं से कहेंगे की देश की सबसे बहुमूल्य संपत्ति को जाति के नाम पर धर्म के नाम पर, मजहब के नाम पर नहीं बांटे. जब तक छात्र पढ़ रहे हैं उन्हें छात्र ही रहने दिया जाए. नीति नियंताओं को समझना चाहिए की ये नौजवान ही देश का भविष्य है. उन्हें फिर मंडल-कमंडल जैसे विवाद में नहीं बांटना चाहिए. उनके लिए शिक्षा का सही इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया जाए ताकी वो देश का भविष्य संवार सकें.
