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DK Shivakumar: कर्नाटक में बीते कई महीनों से कांग्रेस में तकरार छिड़ी है. सीएम कुर्सी को लेकर तय हुए समय के मुताबिक सिद्धारमैया का टाइम पूरा हो गया है. वहीं डीके शिवकुमार के समर्थक उन्हें सीएम बनाने की मांग कर रहे हैं. ये बात अब कर्नाटक से निकलकर पूरे देश की राजनीति में चर्चाओं में है, इन दोनों नेताओं के बीच चल रही खींचतान के बीच पार्टी के अंदर तीसरा मोर्चा एक्टिव हो गया है. अब अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और लिंगायत समुदायों के विधायकों ने बेंगलुरु में अलग-अलग मीटिंग शुरू कर दी हैं. जिसने नई सियासी चर्चा छेड़ दी है. 

तीसरे मोर्चे की बैठक
लिंगायत विधायकों की मीटिंग सोमवार रात इंडस्ट्रीज मिनिस्टर एमबी पाटिल की लीडरशिप में हुई, जबकि SC और ST विधायकों की मीटिंग मंगलवार शाम को होम मिनिस्टर जी परमेश्वर के घर पर हुई. यह घटनाक्रम मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच चल रही पावर की खींचतान के बीच हुआ है, यह खींचतान करीब एक साल से चली आ रही है.

शिवकुमार के समर्थकों ने कही ये बात
शिवकुमार के समर्थकों का कहना है कि मुख्यमंत्री के मिड-टर्म बदलाव पर सहमति बनी है, लेकिन सिद्धारमैया के समर्थकों ने इस दावे से इनकार किया है. यह मामला कई बार कांग्रेस हाईकमान के सामने उठाया गया है और झगड़े को रोकने की कोशिश की गई है. पॉलिटिकल जानकारों का कहना है कि बातचीत का यह नया दौर संख्या में अपनी ताकत दिखाने और सरकार में ज्यादा रिप्रेजेंटेशन के लिए दबाव बनाने के मकसद से है, जिसमें कैबिनेट में बदलाव और शायद मुख्यमंत्री का पद भी शामिल है.

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क्या बोले सियासी जानकार
हालांकि, पार्टी के कुछ अंदरूनी लोगों का कहना है कि पाटिल और परमेश्वर दोनों को सिद्धारमैया का करीबी माना जाता है और इन मीटिंग्स का मकसद शिवकुमार कैंप के बढ़ते असर का मुकाबला करना भी हो सकता है. शिवकुमार वोक्कालिगा कम्युनिटी से हैं, जो राज्य का दूसरा सबसे बड़ा सोशल ग्रुप है, जबकि लिंगायत सबसे बड़ा ग्रुप है, SC और ST विधायकों के साथ, वे मिलकर असेंबली में काफी ताकत रखते हैं, जिससे उभरते हुए गठबंधन को और पॉलिटिकल वजन मिलता है. अटकलों का जवाब देते हुए, पाटिल ने कहा कि लिंगायत विधायकों की मीटिंग रूटीन थी और इसका किसी लीडरशिप बदलाव से कोई लेना-देना नहीं था, उन्होंने कहा कि समुदाय के 34 MLA सिर्फ सरकार में सही रिप्रेजेंटेशन चाहते थे. इस नई एक्टिविटी ने एक बार फिर लीडरशिप के सवालों को सामने ला दिया है, जिससे पता चलता है कि कर्नाटक कांग्रेस के अंदर का मंथन अभी सुलझने से बहुत दूर है.