Opinion: जिन्ना की सियासत का मूल क्या था? कहा जाता है कि उसे सत्ता की भूख थी, नंबर वन बनने की जिद और महात्मा गांधी के कद से टकराने की बेचैनी. वही अहंकार एक कौम की किस्मत से भिड़ गया. नतीजा यह हुआ कि एक ऐसी रियासत वजूद में आई जो 78 वर्षों में न खुद सुकून हासिल कर सकी और ना ही आस-पड़ोस को चैन से जीने दे रही है. उससे भी बड़ा तो यह कि इस्लाम के नाम पर बनी यह रियासत आज दुनिया भर के मुसलमानों की छवि को खराब करने के लिए भी जिम्मेदार है.
1940 का लाहौर में मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत को दो हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव रखा, यही वो पल था जब एक साझा देश के सीने पर वैचारिक चाकू चल गया. साथ ही कहा कि ‘हिंदू और मुसलमान दो अलग कौमें हैं. अगर संयुक्त भारत रहा तो मुसलमान ‘राजनीतिक गुलामी’ में चले जाएंगे. जिन्ना ने डर बेचा और उस डर को सुरक्षा का नाम दिया गया. जिसके नतीजे में लाखों लोगों की जान गई, करोड़ों लोग बेघर हुए और अनगिनत मां-बहनों की इज्जत लुटी.
1946 का डायरेक्ट एक्शन डे उस जहर का पहला खुला विस्फोट था. कलकत्ता की सड़कों पर 4 हजार से ज्यादा लाशें गिरीं. फिर नोआखाली, बिहार और पंजाब हर जगह नफरत की आग में आम लोग जले. ये सिर्फ दंगे नहीं थे, बल्कि ये उस सियासत का रिहर्सल थे जो मजहब को सत्ता की सीढ़ी बनाकर चढ़ रही थी. जिन्ना ने जिस ‘सुरक्षा’ का वादा किया गया, उसने सबसे पहले इंसानियत को असुरक्षित कर दिया.
फिर 11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की संविधान सभा में जिन्ना ने ऐलान किया,’यहां (पाकिस्तान में) धर्म एक निजी मामला होगा, हर शहरी के पास बराबर हक होगा.’ सुनने में ये भले ही सेक्युलर और उदार लगता हो लेकिन जिन्ना के वादे पर शायद उन लोगों ने भी यकीन नहीं किया होगा, जो सभा में बैठे हुए थे. भला जिस मुल्क की बुनियाद ही मजहब, नफरत और डर पर टिकी हुई हो, वहां ये बात खोखली क्यों न लगे?
कितना इस्लामी था जिन्ना?
जिन्ना खुद पश्चिमी तालीम और लाइफस्टाइल का प्रतीक था, लंदन में पढ़कर बैरिस्टर बना, निजी जीवन मजहबी सीमाओं से बिल्कुल बाहर था. हालांकि किसी की निजी जिंदगी पर सवाल नहीं उठाना चाहिए लेकिन जो खुद को कौम का लीडर मानकर चल रहा हो उससे ये सवाल पूछे जाने चाहिए. जिन्ना ने अपनी जिंदगी को धर्म से ऊपर रखकर करोड़ों लोगों की तकदीर धर्म के नाम पर ही बांट दिया. यही दोहरापन बताता है कि मसला आस्था का नहीं, सत्ता का था.
पाकिस्तान कितने सैन्य तानाशाह थे?
14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान वजूद में आया, तब से लेकर आज तक पाकिस्तान में लोकतंत्र की जड़ें हरी ना हो सकीं. शुरू से ही फौज और नौकरशाही ने सत्ता की जकड़न कमजोर नहीं होने दी. जो आज तक जारी है. 1958 में अय्यूब खान, 1977 में जिया-उल-हक, 1999 में परवेज मुशर्रफ. आधे से ज्यादा इतिहास तानाशाही के साए में गुजरा. आज भी चेहरे सिविल हैं, ताकत वर्दी में ही है.
पाकिस्तान को वजूद में आए 78 वर्ष हो चुके हैं और वहां की अवाम आज तक उस पाकिस्तान को ढूंढ रही होगी जिसका ख्वाब जिन्ना ने दिखाया था. जिन लोगों ने पाकिस्तान को बनते हुए देखा वो बेचारे तो इंतेजार करते-करते कब्र में जाकर सो गए. शायद मरते दम भी उनको जिन्ना का दिखाया गया जन्नत जैसा ख्वाब परेशान कर रहा होगा, लेकिन ऐसा कैसे हो सकता था. वो ‘बेचारे’ अगर कुछ देख पाए तो थी उनके मुल्क की लुटती इज्जत, वो भी उन्हीं लोगों के जरिए जिन्होंने वो सुनेहरे ख्वाब दिखाए थे. आज अवाम के हाथ में कुछ है तो आतंक का खौफ, गरीबी, कर्ज और बेरोजगारी. साथ ही अपने लीडरों को IMF और वर्ल्ड बैंक के दरवाजे पर सिर झुकाकर खट-खट करते हुए देख रहे होंगे.
1971 ने जिन्ना के इस ‘इस्लामी एकता’ के भ्रम को पूरी तरह तोड़ दिया. पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बना. लाखों मौतें हुईं, करोड़ों लोग बेघर फिर बेघर हुए. धर्म साझा था, फिर भी देश टूट गया. बांग्लादेश ने धर्मनिरपेक्ष संविधान, महिलाओं की भागीदारी और निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था चुनी, आज उसकी प्रति व्यक्ति आय पाकिस्तान से आगे है. फिलहाल वहां भी उथल-पुथल है और वो भी पाकिस्तान के नक्शेकदम पर चलता दिखाई दी रहा है.
पाकिस्तान में सैन्य तानाशाही
78 वर्षों में 33 साल तो तानाशाहों ने राज किया, बड़ी विडंबना देखिए कि आज तक कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया. बलूचिस्तान-सिंध में विद्रोह और राजनीति जो कभी जेल तो कभी जनरल हाउस में कैद रहती है. ये सब किसी साजिश का नहीं, उसी नफरत की खेती का नतीजा है जो खुद बोने वाले को खा रही है.
खुद के लिए ही खतरा बन गया पाकिस्तान
पाकिस्तान ने जिन आतंकी और सैक्टेरियन संगठनों को कभी रणनीतिक जरूरत समझकर पनाह दी थी, वही अब उसके लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं. इसका ताजा उदाहरण हाल ही में हुआ शिया मस्जिद धमाका है, जहां नमाज के दौरान आत्मघाती हमला किया गया. इस धमाके में दर्जनों नमाजियों की मौत हुई और 100 से भी ज्यादा घायल हैं. पाकिस्तान में शिया मस्जिदों, इमामबाड़ों और धार्मिक जलसों को निशाना बनाना कोई नई बात नहीं है, लेकिन फर्क यह है कि अब यह हिंसा किसी बाहरी मोर्चे पर नहीं, बल्कि पाकिस्तान के अपने शहरों, अपने नागरिकों और अपनी इबादतगाहों तक पहुंच चुकी है. जिन ताकतों को कभी बाहर इस्तेमाल किया गया, आज वही अंदर से पूरे मुल्क को असुरक्षित बना रही हैं.
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4 मार्च 2022: पेशावर की किस्सा ख्वानी बाजार शिया मस्जिद में ISIS-K सुसाइड अटैक, जुमे की नमाज के दौरान 63 मारे गए, 196 घायल.
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13 जुलाई 2018 को मास्किपिंडा के जाटलान में इफ्तार के दौरान सुसाइड बॉम्बिंग हुई, जिसमें 149 से ज्यादा लोग मारे गए.
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16 दिसंबर 2014 को पेशावर का आर्मी पब्लिक स्कूल हमला कोई कैसे भूल सकता है, जहां उसी के जरिए पाले गए गए आतंक ने मासूम बच्चों को बारूद में उड़ा दिया था. इस हमले में 149 बच्चों ने अपनी जिस्मों पर गोलियां खाई थीं.
कैसे खुद के लिए खतरा बनता गया पाकिस्तान?
यही (आतंकवाद) सबसे खतरनाक विरासत है. 80 के दशक का अफगान जिहाद और ISI की प्रयोगशाला. नतीजा पूरी दुनिया ने भुगता. भारत पर हुए हमलों की लंबी कतार, अफगानिस्तान से लेकर चेचन्या और दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैली हिंसा, ये सब उस दोहरे चरित्र की देन है, जो एक तरफ खुद को पीड़ित बताता है और दूसरी तरफ आग बांटता है. ये सिर्फ पड़ोसियों के लिए नहीं, पूरी दुनिया के लिए खतरा बना.
मां-बहनों की इज्जत लुटने का जिम्मेदार जिन्ना!
एक और बात यहां समझ लेनी चाहिए कि जिन्ना सिर्फ नाकाम पाकिस्तान, उसके जरिए फैलाए जाने वाले आतंकवाद और बंटवारे के समय हिंसा में मारे गए मासूम लोगों के लिए ही जिम्मेदार नहीं है. बल्कि उस दौरान मां-बहनों की लूटी गई इज्जत का भी जिम्मेदार वही है. क्योंकि जिस इस्लाम के नाम पर उसने पाकिस्तान बनाया वही इस्लाम यह भी कहता है कि अगर आपके फैसलों या फिर आपके जरिए किए गए कामों से इंसानियत को कोई फायदा पहुंचता है तो आपको तब-तक उसका सवाब (पुण्य) मिलता रहेगा, भले ही आप मर क्यों ना गए हैं.
मरकर भी जिन्ना के पाप में हो रहा इजाफा?
लेकिन इस्लाम यह भी कहता है कि अगर आपके फैसलों या फिर आपके किए गए कामों की वजह से कोई और भी गलत रास्ते पर चलता है तो आप भी उसके गुनाह के हिस्सेदार होंगे. इस कसौटी पर देखें तो जिन्ना को सिर्फ एक देश का संस्थापक कहकर जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता. उसने जो सियासी रास्ता चुना, उसने इंसानों को मजहब के नाम पर आमने-सामने खड़ा कर दिया. उसकी कीमत लाखों लाशों, उजड़ी जिंदगियों और आज तक जिंदा नफरत के तौर पर चुकाई जा रही है. यह इतिहास का वह बोझ है, जिससे जिन्ना का नाम अलग नहीं किया जा सकता.
यहां मुज़फ़्फ़र रज़्मी साहब का एक शेर याद आ रहा है और उसी पर इस कहानी को खत्म करता हूं.
ये जब्र* भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई
जब्र= जोर-जबरदस्ती
