इस समय देश में किताब पर राजनीति हो रही है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी पूर्व आर्मी चीफ जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब को लेकर सरकार को घेर रहे हैं. एक दिन भाजपा सांसद निशिकांत दुबे से रहा नहीं गया. उन्होंने लोकसभा में पीठासीन कृष्णा प्रसाद तेन्नेटी के टोकने और रोकने के बावजूद गरजते हुए कई किताबों का एक साथ नाम ले लिया. उन्होंने किताब की जिल्द लहराते हुए देश के पहले प्रधानमंत्री के लिए कुछ ‘गंभीर शब्द’ कहे, सत्तापक्ष के सदस्यों को शायद आनंद आया लेकिन बहस का विषय है कि पूर्व प्रधानमंत्री के लिए उस शब्द का इस्तेमाल कितना संसदीय था. उन्होंने कहा कि छपी हुई किताब अ…शी से भरी पड़ी है. उन्होंने जिस पहली किताब का नाम लिया. वो थी एडविना और नेहरू. भाजपा सपोर्टर इसे ‘काला सच’ कहने लगे. लोगों के मन में सवाल होगा कि आखिर इस किताब में ऐसा क्या लिखा है.
कैथरीन क्लैमां ने एडविना और नेहरू नाम से किताब लिखी है. इसका हिंदी अनुवाद निर्मला जैन ने किया है. पढ़िए किताब के कुछ अंश- एडविना भारत लौटने में हिचक रही थीं. एक अज्ञात भय उन्हें पीछे खींच रहा था. यह खयाल उन्हें कंपा देता था कि जहां उनके प्रेम का उदय हुआ था, वहां उन्हें शायद अब वह उत्कंठित आनंद न मिले. नेहरू से फिर मिलना होगा? उनका व्यवहार कैसा होगा?…एडविना, जो चालू अखबारों के हमलों और दरबारी घातों को जूती की नोक पर रखती थीं, अब नेहरू के मामले में उनके अपवाद-प्रसार और अफवाहों से डर रही थीं. क्या वह सचमुच नेहरू का फिर से सामना कर सकती थीं?
संबंध कैसा था साफ लिखा है
जनवरी में नेहरू ने उन्हें एक आर्ट-बुक भेजी थी जिसमें कोणार्क के सूर्य मंदिर की प्रसिद्ध युगनद्ध मूर्तियों के चित्र थे. अनजान-से-अनजान व्यक्ति भी रतिक्रीड़ा में लीन उन शरीरों की हर बारीकी देख-समझ सकता था यौन मिलन, दुलराता हुआ प्रणय-स्पर्श, मिलन के चरम आनंद का हास जिसका इन दोनों ने अपने संबंधों में वर्जन कर रखा था. नेहरू ने यह भी लिखा था कि इन चित्रों को देखकर कुछ देर तो उनकी धड़कन ही मानो रुक गई थी. ‘इन्हें जज्ब करना आसान नहीं था.’ फिर उन्होंने प्राचीन भारत की यौन स्वच्छंदता पर दार्शनिक विचार रखे थे’ और फिर मेरा दिमाग बहककर उस समाज का चित्र खींचने की कोशिश करने लगा जिसमें इस तरह की मूर्तियां गढ़ी गई थीं…’ फिर भी एडविना प्रतिरोध करती रहीं. उन्होंने फिर आग्रह किया. उनका हृदय पुनर्मिलन के लिए व्याकुल हो रहा था. एडविना दौड़कर उनसे जा मिलीं.
तीन मूर्ति भवन में रुकीं एडविना
शरणार्थियों की समस्या भी अभी हल नहीं हुई थी, और मां की संरक्षिका-संगिनी के रूप में पैमेला भी साथ गईं. स्वाभाविक ही था कि नए गवर्नर जनरल ‘राजाजी’ ने तुरंत लेडी लुई को राजभवन में रहने का निमंत्रण दिया मगर नेहरू ने उन्हें बड़ी आसानी से यह विश्वास दिला दिया कि जिस भवन में एडविना कभी मालकिन की हैसियत से रही थीं, वहां मेहमान बनकर रहना उन्हें नहीं रुचेगा. इसकी अपेक्षा यह बेहतर होगा कि उन्हें प्रधानमंत्री के नए सरकारी आवास तीन मूर्ति भवन में ठहराया जाए. यह हरियाली से भरे खूबसूरत उद्यान के बीच खड़ी हुई, औपनिवेशिक शैली की, खंभोंवाली भव्य इमारत थी; राजाजी तुरंत मान गए.
बचपन का शहर दिखाने इलाहाबाद ले गए
पहली बार, एडविना अपने प्रियतम की छत के तले सोईं. नेहरू अपने बचपन का शहर दिखलाने के लिए एडविना को इलाहाबाद ले गए. वहां उन्होंने संगम और विशाल पहाड़ी पीपल देखे. फिर कलकत्ता ले गए जहां उन्होंने हुगली नदी देखी. फिर वे पंजाब गए जो वैसे ही उनका जाना-पहचाना था. उन्होंने साथ-साथ अस्पतालों के विभागों के उद्घाटन किए, शैक्षिक संस्थाओं के दौरे किए और कैंपों का मुआयना किया. नेहरू की विराट परियोजनाओं के स्थलों पर उन्होंने मजदूरों के साथ मूंगफलियां खाईं और हर जगह गेंदे की मालाओं से उनका स्वागत हुआ.
कभी-कभी पहाड़ों में उन्होंने भालूवालों को भालू नचाते देखा. एक बार तो दो नन्हे भालू उन्हें उपहार में पेश भी किए गए. एडविना नुकीली ऊंची एड़ीवाली जूती पहनतीं और भारतीय नर्तकियों की तरह हमेशा बालों में फूल लगाया करती थीं. जब भीड़ बहुत बढ़ जाती और धक्का-मुक्की होने लगती तो दोनों हंसते-हंसते एक-दूसरे का हाथ पकड़ लेते थे. किसी को भी इसमें कोई हर्ज नहीं दिखाई देता था. उनके जीवन का फैसला चूंकि नेहरू ने लिया था, इसलिए वे कुछ समय उनके साथ रहने के लिए लौटी थीं. इन दिनों का विस्तार अनंत हो चला था. उनका आनंद भी संपूर्ण होता यदि सरोजिनी नायडू इसी समय दुनिया से विदा लेने का फैसला न कर लेतीं…
अचानक सरोजिनी नायडू का निधन हुआ
सुबह-सुबह पांच बजे नेहरू ने एडविना को जगाया. सरोजिनी नायडू अभी-अभी गुजर गई थीं. अगली सुबह होनेवाले अंतिम संस्कार के लिए वे हवाई जहाज से लखनऊ पहुंचे. अंतिम संस्कार में लगभग उतने ही लोग एकत्रित हो गए थे जितने महात्माजी की मृत्यु पर. शवयात्रा तीसरे पहर चार बजे शुरू हुई. तिरंगे में लिपटी सरोजिनी की देह को स्वयं नेहरू ने उठाकर तोपगाड़ी पर रखाय उसे गोमती के किनारे ले जाया गया जहां बाद में लाकर उनका स्मारक खड़ा किया गया था. गांधी के दाह-संस्कार की स्मृतियों को एडविना ने फिर से जिया – देह को निगलती हुई लपटें, काली चिनगारियां, चिता की भयावनी और मधुर शांति.
एडविना ने कहा, मेरा शरीर समुद्र में दफनाया जाएगा
लंबे समय से भारी-भरकम शरीर में कैद, सरोजिनी की कवि-आत्मा अंततः फिर से आकाश से जा मिली. बहुत संभव है कि एडविना ने नेहरू से स्वयं अपने अंतिम संस्कार की भी बात की हो, बताया हो कि कैसे उनका शरीर थैले में बंद करके समुद्र में दफनाया जाएगा. हो सकता है कि नेहरू ने इस बात का जवाब कविता में दिया हो, जैसे वे अक्सर देते थे.
उड़ीसा में तबीयत बिगड़ी
उन्होंने एडविना से उड़ीसा में चार दिनों की छुट्टी मनाने का वादा किया था. महिला संरक्षिकाओं की एक फौज के साथ वे रवाना हुए. ये थीं प्रधानमंत्री की पुत्री और भांजियां, लेकिन चांदनी रात में सागरतट पर लंबी-लंबी सैरों और सुबह तड़के समुद्र में तैरने के समय वे अकेले होते थे. जब वे कोणार्क में समुद्र के निकट ही रथ की आकृति में बने सूर्य मंदिर को गए तो नेहरू के उत्साह का पार न था. दीवारों पर ऊंची-ऊंची प्रस्तर पट्टिकाओं पर उत्कीर्ण आकृतियों को आसानी से देखा-समझा जा सकता था. नेहरू बताते रहे और धूप में नंगे सिर एडविना सुनती रहीं, सुनती रहीं. यहां तक कि उन्हें चक्कर आने लगे, और फिर बुखार. डॉक्टर को दिखाया गया तो उसने जोर देकर उचित सलाह दी कि वे इंग्लैंड-वापसी की यात्रा कुछ समय के लिए स्थगित कर दें.
बिस्तर पर पड़ी एडविना को अपनी बीमारी में इतना आनंद आ रहा था जितना पहले कभी नहीं आया था सिर का मीठा-मीठा भारीपन, दुखती पीठ का सुखद रूप से सुन्न पड़ जाना. नेहरू उनकी देखभाल करते थे. धूप, उड़ीसा और मंदिर ने अपना काम अच्छी तरह से कर दिखाया था.
एडविना लौटीं लंदन और…
उनके अंततः लंदन लौटने के बाद नेहरू ने उन्हें जो पहला पत्र लिखा था, वह उदासी से भरा था. उन्होंने अपनी रात बगीचे में बिताई थी, एडविना के खाली कमरे की खिड़की के तले. ‘अंधेरा और भी गहरा नजर आ रहा था इस बात का संकेत, कि पहले यहां उजाला था जो अब जा चुका है; जिंदगी मानो चुपचाप चल दी है और पीछे एक खालीपन छोड़ गई है.’ अगले दिन उनकी भूख मर गई थी. रसोइये ने बड़ी लगन से ‘चिकन काउंटेस माउंटबेटेन’ परोसा था. यह भावभरा व्यंजन मात्रा में बहुत कम था पर नेहरू ने उसे अनछुआ ही छोड़ दिया. एडविना ने उत्तर दिया था, ‘मुझे जिस-जिस बात की चाह थी, तुमने मुझे सभी कुछ दिया – खुशी, संतुलन, यहां तक कि दर्द भी पर इसका कारण हम जानते हैं और उसे हम बदलेंगे भी नहीं….
एडविना में कभी भी अपने अंग्रेज होने का सच्चा बोध नहीं जागा था. नेहरू ने उन्हें भारत से ऐसे जोड़ दिया था जैसे कोई मेमने को खूंटे से बांध दे. नतीजा यह हुआ कि वे बेघरबार हो गईं. हवाई जहाज उस इलाके पर से उड़ा जहां उनके नाना, कैसेल ने बसने का निर्णय लिया था. इंगलैंड: एक ऐसा राष्ट्र जहां न खतरा है न भावावेग. उन्होंने नेहरू को लिखा था, ‘प्रशांत, शांतिपूर्ण और ठोस इंग्लैंड अचानक ही मुझे विक्षुब्ध करने लगा है.’
इसलिए उन्होंने फिर से दुनिया का चक्कर लगाना शुरू कर दिया. जहां भी उन्हें बुलाया जाता, वे जातीं. जहां भी युद्ध या क्रांतियों में रक्तपात होता, वे रेड क्रॉस, सेंट जॉन एंबुलेंस ब्रिगेड या सेव द चिल्ड्रेन एसोसिएशन की प्रतिनिधि के रूप में हाजिर हो जातीं. इस तरह वह कहीं की भी नागरिक नहीं रही थीं और सभी जगह की थीं.
