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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद भारतीय वायुसेना के जंबो जेट सी-130जे सुपर हरक्यूलस से सड़क पर लैंड किए. वीडियो देखना मिस कर गए तो नीचे जरूर देखिए. खेतों के आसपास लोग खड़े थे और दुश्मन के कलेजे को कंपाने का दम रखने वाला योद्धा गर्जना करते हुए उतरा. हाल के वर्षों में आपने सड़क पर लड़ाकू विमानों के उतरने की तस्वीरें जरूर देखी होंगी. पहले नहीं तो अब 14 फरवरी की तस्वीर देख लीजिए. असम के मोरन में नेशनल हाईवे पर एक से बढ़कर एक योद्धा उतरे तो देखने वाले भी गर्व से भर गए. हालांकि आपके मन में यह सवाल भी होगा कि जब एयरबेस है तो आम सड़कों पर लड़ाकू विमान उतारकर कैसा प्रदर्शन हो रहा है? सामरिक मामलों के एक्सपर्ट डॉ. ब्रह्मा चेलानी ने युद्ध के समय के हालात का जिक्र करते हुए इसे समझाने की कोशिश की है. 

डॉ. चेलानी ने कहा कि असम के मोरन में एक नेशनल हाईवे पर पीएम मोदी की हाई-प्रोफाइल लैंडिंग भारत के एयरपावर डॉक्ट्रिन में एक शांत लेकिन आमूलचूल बदलाव को दिखाती है. यह पूरे भारत में बन रही 28 इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी (ELF) में से एक है. इसका मकसद यह पक्का करना है कि अगर कोई दुश्मन हमारे देश के बड़े एयरबेस पर हमला करने में कामयाब हो भी जाए तो भी इंडियन एयर फोर्स लड़ाई जारी रख सके. 

तैयारी जंग के समय की है

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जी हां, यह लॉजिक एयर वॉरफेयर के एक बेसिक प्रिंसिपल को दिखाता है – हवा में लड़ाई दुश्मन के एयर डिफेंस और एयरफील्ड को बर्बाद करके शुरू होती है. fallback

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तो वैसे एयर फोर्स को सिर्फ आतंकी कैंपों पर हमला करने का सीमित लक्ष्य दिया गया था. नतीजा, जैसा कि भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ ने बाद में माना, शुरू में जो नुकसान हुआ उसे टाला जा सकता था. एक ‘टैक्टिकल गलती’ जिसे तीसरे और आखिरी दिन ही ठीक कर ली गई जब सरकार ने दुश्मन के एयर डिफेंस और बेस पर हमले की इजाजत दे दी. 

लड़ाकू विमान की गर्मी झेल सकती है सड़क

विदेश मामलों को गहराई से समझने वाले एक्सपर्ट ने कहा कि ‘रोड-रनवे’ का बढ़ता हुआ नेटवर्क यह पक्का करने के लिए डिजाइन किया गया है कि भारत को कभी मुश्किल न हो. बॉर्डर, समुद्र तट और दूसरे सेंसिटिव जोन के पास स्ट्रेटेजिक तरीके से मौजूद ये इमर्जेंसी लैंडिंग फैसिलटीज मजबूत कंक्रीट से बने हैं जो 74-टन के ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट की ताकत और फाइटर-जेट के आफ्टरबर्नर की गर्मी को भी झेल सकते हैं. इनमें बेसिक एयर ट्रैफिक कंट्रोल इंफ्रास्ट्रक्चर और पार्किंग सुविधा भी शामिल है. ऐसे में ये कम जगह में भी पूरी तरह इस्तेमाल होने वाली एयरस्ट्रिप के तौर पर काम कर सकते हैं. 

फिर सड़क पर उतरेगी सेना की टुकड़ी

डॉ. ब्रह्मा चेलानी कहते हैं कि ऐसे हाईवे की ऑपरेशनल वैल्यू काफी ज्यादा है. युद्ध के समय ये सड़कें भारतीय वायुसेना को एसेट्स को विस्तार देने और प्राइमरी बेस के नुकसान होने की स्थिति में भी ऑपरेशन जारी रखने की सुविधा देंगी. जैसे- मोरन स्ट्रिप, चाबुआ एयर फोर्स स्टेशन और डिब्रूगढ़ एयरपोर्ट के लिए सीधे बैकअप के तौर पर काम कर सकती है. जंग की स्थिति में हाईवे स्ट्रिप्स को हमेशा के लिए बंद करना बहुत मुश्किल होता है और उन्हें जल्दी ठीक करना होता है. 

ये तेजी से मोबिलाइजेशन में भी मदद करते हैं. एक C-130J लैंड कर सकता है, एक इन्फेंट्री प्लाटून या हल्के आर्मर्ड व्हीकल उतार सकता है और कुछ ही मिनटों में फिर से हवा में उड़ सकता है, जिससे हाईवे का एक हिस्सा कम समय में आगे की स्टेजिंग ग्राउंड में बदल जाता है. एक्टिवेट होने पर ये इमर्जेंसी लैंडिंग फैसिलिटी मोबाइल रडार और कम्युनिकेशन सिस्टम को भी खड़ा कर सकते हैं, जो टेम्पररी कमांड-एंड-कंट्रोल नोड्स के तौर पर काम करते हैं. इससे सर्विलांस और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर को मदद मिलेगी.

असम में 4.2 किमी लंबा यह इमर्जेंसी लैंडिंग स्ट्रिप सेना और नागरिक विमानों के लिए भी तैयार किया गया है. यह नॉर्थ ईस्ट में अपनी तरह की पहली तैयारी है. 20 मिनट के एयर शो के दौरान एयरफोर्स के राफेल, सुखोई और पीएम खुद सी-130 जे जैसे दमदार लड़ाकू विमान से उतरे.