
कांग्रेस आए दिन भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार पर चुनावों को लेकर तमाम तरह की गड़बड़ियों का आरोप लगाती रही है. इस दौरान सोशल मीडिया पर आजाद भारत के पहले लोकसभा चुनाव 1952 को लेकर कई कहानियां वायरल होती हुई दिखाई दे रही हैं. वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने एक प्राइवेट न्यूज चैनल पर 1952 में रामपुर लोकसभा सीट पर हुए चुनाव को लेकर की गई धांधली के बारे में बताया है. वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि साल 1989 में हुए लोकसभा चुनाव में हुई कांग्रेस की शिकस्त को लेकर राजीव गांधी अपनी हार स्वीकार करने को तैयार नहीं थे.
दरअसल 1984 में जहां कांग्रेस ने 400 से भी ज्यादा सीटें जीतीं थीं वहीं अगले ही चुनाव में उन्हें शिकस्त का सामना करना पड़ा. यही वजह थी कि राजीव गांधी इस हार को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे. उन्होंने इसके पीछे तर्क दिया था, ‘ये कैसे हो सकता है मैं तो इस रिजल्ट को मान ही नहीं सकता हूं. 1984 में भारतीय जनता पार्टी को 8 प्रतिशत वोट मिले और 2 सीटें मिली थीं और इस चुनाव में बीजेपी का वोट प्रतिशत 12 प्रतिशत हुआ और इनको 85 – 86 सीटें मिल गईं तो उन्होंने कहा कि ये तो एडेप्ट नहीं करता है इसको मैं मानने को तैयार नहीं हूं.’ इसके बाद वरिष्ठ पत्रकार ने आगे बताया कि कैसे साल 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में मौलाना अबुल कलाम के चुनाव हारने के बावजूद रिजल्ट को बदल दिया गया था.
‘मौलाना चुनाव नहीं जीते तो आप भी मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे’
साल 1952 में पहला आम चुनाव हुआ था जिसमें रामपुर लोकसभा सीट से मौलाना अबुल कलाम आजाद चुनाव लड़ रहे थे और वो चुनाव हार गए थे. वहां पर उनके विपक्ष में लड़ने वाले नेता विशन चंद्र सेठ लगभग 20 हजार वोट से चुनाव जीत चुके थे. विपक्षी दल जश्न मनाने के लिए जुलूस निकालने की तैयारी कर रहा था. डीएम और रिटर्निंग ऑफिसर ने इस जीत का ऐलान भी कर दिया था. इस बीच वायरलेस से जवाहर लाल नेहरू को इस बात का पता चला तो उन्होंने सीधे तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को फोन किया और कहा, ‘मौलाना आजाद को चुनाव हारने नहीं चाहिए.’ तो इस पर मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘अब तो रिजल्ट घोषित हो चुका है’ तो पंडित नेहरू ने कहा कि ‘ये मैं नहीं जानता हूं. अगर मौलाना अबुल कलाम चुनाव नहीं जीतेंगे तो आप मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे.’
तत्कालीन सूचना निदेशक शम्भूनाथ टंडन ने अपनी किताब में किया खुलासा
ये बात उस समय के डायरेक्टर इंफर्मेशन शम्भूनाथ टंडन ने अपनी किताब लिखी है. टंडन ने अपनी किताब में इस बात का जिक्र किया है कि पंडित नेहरू का फोन आने के बाद पंत जी ने कैसे उस चुनाव परिणाम को बदलवा दिया था. पंत जी ने उनसे कहा टंडन जी से कहा कि आप डीएम से बात कीजिए और इस चुनाव परिणाम बदलवा दीजिए. तब उन्होंने खुद डीएम को फोन किया तो डीएम ने कहा ये कैसे हो सकता है मैं खुद लिखित तौर पर चुनाव परिणाम घोषित कर चुके हैं. इस पर टंडन जी ने कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो न पंत जी की नौकरी रहेगी, न मेरी नौकरी रहेगी और आपकी भी नौकरी नहीं रहेगी.
ऐसे हुई थी वोटों की धांधली, फिर जीते थे मौलाना अबुल कलाम आजाद
वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि उस समय पोलिंग का तरीका जो था उसके मुताबिक हर उम्मीदवार का एक वोटिंग का बक्शा होता था. इस बक्शे पर कोई सिंबल नहीं होता था, कोई निशान नहीं होता था और कोई सिंबल भी नहीं होता था. इस बक्शे में उम्मीदवार को वोट करने वाले मतदाता अपनी पर्ची उस बक्शे में डाल देते थे. तो जब डीएम के आदेश पर दोबारा गिनती शुरू हुई तो विशन चंद्र सेठ के बक्शे से वोटिंग पर्ची उठाकर मौलाना अबुल कलाम आजाद के बक्शे में डाल दिए गए थे. बस और कुछ तो करना नहीं था अब जब दोबारा वोटों की गिनती की गई तो मौलाना अबुल कलाम आजाद चुनाव जीत गए. ये पूरी बात उस किताब में लिखी हुई है.
यह भी पढ़ेंः ‘ये ट्रेंड बन चुका है’, हिमंत बिस्वा सरमा शूटिंग विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

