नई दिल्ली: दुनिया भर में कोरोना वायरस (Coronavirus) का कहर जारी है. भारत में कोरोना महामारी की दूसरी लहर (Corona Second Wave India) बेकाबू है. रोजाना नए संक्रमित मरीजों का आंकड़ा साढ़े तीन लाख के पार जा रहा है. वहीं 1 मई को देश में चार लाख से ज्यादा नए कोरोना केस सामने आए थे. 

भारत में कोरोना संक्रमण से हो रही मौतों का आंकड़ा भी डरा रहा है. ऐसे में आखिर कहां चूक हुई जो देश को इसकी इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी. इस सवाल के जवाब में कहा जा रहा है कि अगर वैज्ञानिकों की सलाह मानी गई होती तो कोरोना की इस खतरनाक लहर में हालात इतने नहीं बिगड़ते

‘साइंस’ की चौकाने वाली रिपोर्ट

दरअसल मशहूर साइंस वेबसाइट नेचर डॉट कॉम (Nature.com) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत और ब्राजील की सरकारों ने वैज्ञानिकों की सलाह नही मानकर बड़ी गलती की जिसकी कीमत उसने अपने लोगों को खोकर चुकाई. वहीं इसी के साथ इन देशों ने कोरोना पर काबू पाने का बढ़िया मौका भी खो दिया.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 12 अप्रैल को देश में भारत में 1.68 लाख नए कोरोना वायरस के मामले दर्ज हुए थे. तब देश में कुल कोरोना केस की संख्या 1.35 करोड़ यानी दुनिया में नंबर दो पर थी. यानी पिछले महीने ही भारत ने ब्राजील को पीछे छोड़ा है, तब ब्राजील में 1.34 करोड़ कोरोना के केस थे और भारत में 1.35 करोड़ यानी हालात और तेजी से बिगड़े तो दुनियाभर से भारत की मदद के लिए हाथ बढ़ें. इस दौरान ऑक्सीजन, ऑक्सीजन कंसट्रेटर्स, रेमडेसिवर, वेंटिलेटर्स और आईसीयू बेड्स की सप्लाई शुरू की.

‘या तो सलाह नहीं मानी या मानने में देरी कर दी’

नेचर जर्नल के मुताबिक भले ही भारत और ब्राजील हजारों किलोमीटर दूर हों लेकिन दोनों जगह कोरोना को लेकर एक ही समस्या है. दोनों देशों के नेताओं ने वैज्ञानिकों की सलाह या तो मानी नहीं या फिर उन पर देरी से अमल किया. जिसकी वजह से लाखों लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा. 

यहां हुई चूक

गौरतलब है कि ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो ने लगातार कोविड-19 को सामान्य वायरस और छोटा फ्लू कहकर बुलाते रहे. उन्होंने न तो खुद वैज्ञानिकों की सलाह मानी और न ही अपने लोगों को कोरोना गाइडलाइंस का पालन करने के लिए कड़ाई की. भारत में सरकार ने वैज्ञानिकों की सलाह पर समय पर एक्शन नहीं लिया, जिसकी वजह से देश में कोरोना के मामले तेजी से बढ़े और हजारों लोगों की जान चली गई. 

गौरतलब है कि भारत में पिछले 24 घंटे के दौरान सामने आए कोरोना वायरस संक्रमण के 3,82,315 नए मामलों में से 71 प्रतिशत मामले महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और दिल्ली समेत 10 राज्यों से आए हैं. मंत्रालय से जारी आंकड़ों के मुताबिक नए मामले सामने आने के बाद देश में कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या बढ़कर 2,06,65,148 हो गयी है. अप्रैल में बात बिगड़ी तो बिगड़ती चली गई.

‘आंकड़ो ने बताया यूं बिगड़े हालात’

भारत में भी लाखों लोग चुनावी और धार्मिक आयोजनों में शामिल हुए. इन गलतियों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है. वेबसाइट Nature.com के मुताबिक भारत में पिछले साल सितंबर में कोरोना पीक पर था. तब रोजाना 96 हजार लोग संक्रमित हो रहे थे. इसके बाद हालात सुधरे तो नए साल में मार्च की शुरुआत में मामले कम होकर 12 हजार तक पहुंच गए थे. शायद इन आंकड़ों की वजह से देश की सरकार ‘निश्चिंत’ हो गई थी. हालांकि देश में कोरोना गाइडलाइंस का पालन होने की बात तो लगातार कही गई लेकिन पाबंदिया और सख्ती खत्म कर दी गई. 

‘हालात से बचा जा सकता था’

लोग मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना कम कर चुके थे. देश के चार राज्यों और एक केंद्र शाषित प्रदेश में चुनावी रैलियां, धरने-प्रदर्शन और धार्मिक आयोजन हो रहे थे. वहीं कुछ जगह पंचायत चुनाव भी कराए गए. ये सब लगातार जारी रहा. जिसकी वजह से कोरोना की रफ्तार बेकाबू हो गई और लोग त्राहिमाम करने लगे.

विदेशी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में एक बड़ी समस्या ये भी है कि यहां सभी वैज्ञानिक आसानी से कोविड-19 रिसर्च के डेटा को एक्सेस नहीं कर पाते. इस कारण सही भविष्यवाणी नहीं समय पर नहीं हो पातीं. ये भी सच है कि दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन प्रोग्राम चला रहे भारतम में अभी तक बड़े पैमाने पर जीनोम सिक्वेंसिंग संभव नहीं हो पाई है.  

रिपोर्ट में लिखा गया है कि शोधकर्ताओं और सरकारों के बीच हमेशा एक कठिन रिश्ता रहा है. लेकिन कोरोना महामारी के दौर में दोनों के बीच सहजता होनी चाहिए ताकि सही समय पर सही कदम उठा कर जनहानि को रोका जा सके. यानी साफ-साफ कहा गया है कि अगर देश में इतनी ढ़ील नहीं दी जाती तो शायद आज श्मशान घाटों पर इतनी बुरी स्थिति नहीं होती.  

LIVE TV