
Ramadan 2026: रमजान के महीने में मुस्लिम समाज के लिए 2 बड़ी खबर है. इसमें से एक अच्छी और दूसरी बुरी खबर है. गुड न्यूज ये है कि तेलंगाना की सरकार ने सभी सरकारी मुस्लिम कर्मचारियों को रमजान का तोहफा दिया है. रमजान के महीने में तेलंगाना के सरकारी दफ्तरों में मुस्लिम कर्मचारियों की छुट्टी 1 घंटे पहले ही हो जाएगी यानी एक घंटे कम काम करना होगा. वहीं बैड न्यूज महाराष्ट्र से है जहां फडणवीस सरकार ने रमजान से पहले मुस्लिम समुदाय को दिए गए 5% आरक्षण को औपचारिक रूप से खत्म कर दिया है.
सरकार ने खत्म किया आरक्षण
महाराष्ट्र सरकार ने प्रशासनिक आदेश जारी करके 2014 में लागू किए गए आरक्षण को पूरी तरह से खत्म कर दिया है. नए सरकारी आदेश के अनुसार, स्पेशल बैकवर्ड कैटेगरी के तहत शामिल सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े मुसलमानों के लिए सरकारी अर्ध-सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थाओं में जो पांच प्रतिशत रिजर्वेशन लागू करने का फैसला लिया गया था उसे पूरी तरह से रद्द कर दिया गया है. इस फैसले के बाद मुस्लिम समाज और खासकर मुस्लिम नेता गुस्से में हैं. वो सामने आकर अपने गुस्से का इजहार भी कर रहे हैं. महाराष्ट्र सरकार ने जिस मुस्लिम आरक्षण को खत्म किया है उसे साल 2014 में कांग्रेस और NCP की सरकार ने लागू करने का फैसला लिया था, लेकिन इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई. उस समय अदालत ने सिर्फ शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की अनुमति दी थी यानी जिस रिजर्वेशन को रद्द किया गया है वो तो आंशिक रूप से पहले ही रद्द हो चुका था. बावजूद इसके, इस फैसले को मुस्लिम नेता NDA सरकार की कुंठित सोच बता रहे हैं. तुष्टीकरण की राजनीति कह रहे हैं.
पिछड़ेपन के नाम पर आरक्षण
मुस्लिम आरक्षण रद्द होने का विरोध करने वाले धर्म के नाम पर मिलने वाली छूट या रियायत से कभी नाराज नहीं होते. बल्कि खुश होते हैं. तेलंगाना में जब मुस्लिम कर्मचारियों को रमजान के महीने में एक घंटे की छूट दी जाती है तब इसे मुस्लिम नेता तुष्टिकरण की राजनीति नहीं कहते, लेकिन हां हिंदू पक्ष जरूर कहता है कि ये तुष्टिकरण है. भारत का संविधान धर्म आधारित आरक्षण की अनुमति नहीं देता है, लेकिन सामाजिक पिछड़ेपन के नाम पर देश के कई राज्यों में धर्म विशेष के लिए आरक्षण का ये कैसा खेल चल रहा है?
आरक्षण बना तुष्टिकरण का टूल
तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में मुस्लिम समुदाय को 4% आरक्षण दिया गया है. ये आरक्षण पिछड़ा वर्ग के नाम पर दिया गया है. कर्नाटक में भी मुस्लिम समाज को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के नाम पर 4% आरक्षण दिया गया है. केरल में तो मुस्लिम समुदाय को अलग अलग श्रेणियों में 12% आरक्षण प्राप्त है. तमिलनाडु में भी पिछड़ा वर्ग के नाम पर मुस्लिम समुदाय को 3.5% आरक्षण मिला हुआ है. कई राज्यों में मुस्लिम समाज को OBC की श्रेणी में डालकर आरक्षण देने के आरोप भी लगते हैं. कलकत्ता हाईकोर्ट ने तो पश्चिम बंगाल में 2010 के बाद बने OBC प्रमाण पत्रों को रद्द करने का आदेश भी दिया था. ये कहा जा सकता है कि आरक्षण को राजनीतिक पार्टियों ने तुष्टिकरण का एक टूल बना लिया है. कोई पार्टी इसे देश के लिए खतरा बताती है. तो कोई इसे अल्पसंख्यकों का अधिकार बताती है, लेकिन एक सच तो ये भी है कि आरक्षण का इस्तेमाल वास्तविक विकास से ज्यादा वोट बटोरने के लिए किया जाता है.
