
DNA: आज हम मध्य प्रदेश पुलिस के ढाका मॉडल का DNA टेस्ट करेंगे. आज ये विश्लेषण करने की आवश्यकता हमें इसलिए महसूस हुई. क्योंकि जो काम आजकल बांग्लादेश की पुलिस कर रही है. वैसा ही काम आज मध्यप्रदेश की पुलिस ने भी किया है. हम आपको पिछले कई दिनों से मध्यप्रदेश के सिहोर में रामभक्तों पर कट्टरपंथियों की पत्थरबाजी की खबर दिखा रहे हैं. लेकिन आज जब हिंदू संगठनों ने उन पर कार्रवाई की मांग की तो हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं और प्रोग्राम की कवरेज कर रहे जी मीडिया के पत्रकार और कैमरामैन की ही पिटाई कर दी गई. हमारा कैमरा छीन लिया गया. वीडियो डिलीट कर दिया गया. यानी एमपी पुलिस के ढाका मॉडल के सबूत मिटा दिये गए. लेकिन वो हमारी आवाज़ नहीं दबा पाए. हमें सच बताने से नहीं रोक पाए और आगे भी नहीं रोक पाएंगे.
हम आपसे ही नहीं बल्कि पूरे देश से पूछ रहे हैं जो पुलिस पत्थरबाजों के खिलाफ आवाज उठाने वाले हिंदुओं पर हमला करे. जो पुलिस पत्रकारों पर हमला करे, सच को मिटाने की कोशिश करे, ऐसी पुलिस की तुलना बांग्लादेश की पुलिस से होनी चाहिए कि नहीं होनी चाहिए? तो आप भी अपनी राय दीजिए. ज़ी न्यूज़ के सोशल मीडिया पेज पर जाकर बताइए कि क्या एमपी पुलिस..बांग्लादेश पुलिस बनती जा रही है? बांग्लादेश की तरह हिंदुओं पर हमला करने वाले कट्टरपंथियों पर मध्यप्रदेश की पुलिस को गुस्सा नहीं आता लेकिन उनका विरोध करने वाले हिंदू संगठनों पर मुख्यमंत्री मोहन यादव की पुलिस गर्म हो जाती है.
बांग्लादेश की पुलिस हिंदुओं की लिंचिंग करने वाले कट्टरपंथियों को बचाने के लिए कभी ईशनिंदा..कभी हिंदू के अपराधी होने की झूठी कहानियां बनाकर पेश करती है. तो मध्यप्रदेश की पुलिस कट्टरपंथियों का विरोध करने वाले हिंदुओं को ही पीटती है.
बांग्लादेश की पुलिस कट्टरपंथियों के खिलाफ लिखने वाले अखबारों के ऑफिस जल जाने देती है तो मध्यप्रदेश की पुलिस कट्टरपंथियों के उत्पात की खबर दिखाने वाले पत्रकारों को लाठियों से पीटती है. उत्पात के सबूत वाले कैमरे को छीन लेती है. और सच को डिलीट करने की कोशिश करती है.
बांग्लादेश की पुलिस कट्टरपंथियों को हिंदुओं की लिंचिंग से नहीं रोकती….तो मध्यप्रदेश की पुलिस भी धमकी देने वाले कट्टरपंथियों के सामने सरेंडर कर देती है. उन पर कठोर कार्रवाई से बचती है लेकिन हिंदू प्रदर्शनकारी और पत्रकार पर लाठी चला देती है.
बांग्लादेश की पुलिस हिंदुओं के घर जलाने से कट्टरपंथियों को नहीं रोकती तो मध्यप्रदेश की पुलिस कट्टरपंथियों को रामभक्तों पर पत्थर बरसाने से नहीं रोक पाती.
और जिस जी मीडिया संवाददाता प्रमोद शर्मा पर बांग्लादेश में हिंदुओं की आवाज बनने पर हमला करने की हिम्मत यूनुस की पुलिस नहीं कर पाई उसको मध्यप्रदेश में मोहन की पुलिस इसी वजह से पीट देती है. जब हिंदू पर हमले हो रहे थे बांग्लादेश में तब..प्रमोद शर्मा ढाका जाकर रिपोर्टिंग कर रहे थे. लेकिन तब वहां कुछ नहीं हुआ लेकिन यहां एमपी पुलिस की बर्बरता ने उन्हें नहीं बख्शा.
MP की पुलिस बांग्लादेश की पुलिस बनती जा रही है?
इसीलिए हमें आज सवाल पूछना पड़ रहा है क्या मध्यप्रदेश की पुलिस बांग्लादेश की पुलिस बनती जा रही है? आज आपको भी जानना चाहिए मध्यप्रदेश पुलिस की इस कार्यप्रणाली की वजह क्या है? आखिर क्यों बीजेपी की सरकार में हिंदू संगठनों के प्रदर्शन की खबर दिखाने वाले पत्रकारों को लाठियां खानी पड़ रही हैं? बदसलूकी झेलनी पड़ रही है. आज हम आपको पत्रकारों की पिटाई करने वाले अधिकारियों और सिपाहियों की फॉर्च्यूनर वाली हनक का विश्लेषण भी करेंगे. ये पुलिस वाले आजकल कट्टरपंथियों की खबर दिखाने से आग बबूला मध्यप्रदेश पुलिस के नए पोस्टर ब्वॉय हैं. यकीन मानिए इनकी राजसी शान देखकर आप भी चकाचौंध हो जाएंगे. लेकिन सबसे पहले आप देखिए..बांग्लादेश और मध्यप्रदेश के कट्टरपंथियों और पुलिस में कौन कौन सी समानता दिखाई दे रही है.
मध्य प्रदेश में दिखी बांग्लादेश में प्रेस पर हमले की तस्वीरें
बांग्लादेश में पत्रकारों के साथ क्या हो रहा है? आपको वो तस्वीर भी याद होगी. बांग्लादेश में कट्टरपंथियों के खिलाफ खबरें छापने वाले अखबारों को साजिश के तहत कट्टरपंथियों की भीड़ आग के हवाले कर देती है और बांग्लादेश की पुलिस खड़े होकर तमाशा देखती रहती है. दो सबसे बड़े और प्रतिष्ठित अखबारों प्रोथोम आलो और द डेली स्टार के आफिस जला दिए जाते हैं. बड़ी मुश्किल से पत्रकार खुद को जिंदा जलने से बचाते हैं. ये तस्वीरें आप भी नहीं भूले होंगे लेकिन मध्यप्रदेश की पुलिस भी बांग्लादेश की पुलिस को पूरी टक्कर दे रही है. पहले सिहोर में रामभक्तों पर पत्थरबाजी और फिर कार्रवाई से बचने के लिए कट्टरपंथियों के शक्ति प्रदर्शन की खबर दिखाने वाले जी मीडिया संवाददाता प्रमोद शर्मा और उनके कैमरामैन रजत दुबे पर मध्यप्रदेश के आष्टा थाने की पुलिस लाठियां लेकर टूट पड़ती है. सोचिए ये हाल…उस पत्रकार का है..जो राज्य से मान्यता प्राप्त है…ये हाल उस पत्रकार का है..जिसके हाथ में देश के सबसे प्रतिष्ठित न्यूज चैनलों में शामिल जी न्यूज का माइक है. ये हाल उस पत्रकार का है जिसे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री भी जानते हैं उस पर लाठियां भांजी गई आप जानते हैं ऐसा क्यों किया गया? सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने कट्टरपंथियों की धमकी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हिंदू संगठनों के विरोध प्रदर्शन की कवरेज की किस तरह कार्रवाई से बचने के लिए दबाव बना रहे कट्टरपंथियों पर एक्शन में देरी हो रही है.
कट्टरपंथियों के दबाव में आ गई एमपी पुलिस?
बांग्लादेश की पुलिस ने हिंदू युवक दीपू को कट्टरपंथियों से बचाने की कोशिश नहीं की? दीपू को खुद कट्टरपंथियों के हवाले कर दिया. दीपू को शुरूआत में ईशनिंदा का आरोपी भी बता दिया. मध्यप्रदेश की पुलिस ने क्या किया? हमने कल आपको डीएनए में दिखाया था किस तरह सिहोर के आष्टा इलाके में कट्टरपंथियों ने रामभक्तों पर पत्थर बरसाए..फिर पुलिस कार्रवाई से बचने के लिए जुमे के दिन बड़ी संख्या में इकट्ठा होकर शक्ति प्रदर्शन किया. पुलिस को चेतावनी दी अगर कार्रवाई हुई तो और बड़ा प्रदर्शन करेंगे और जब इसके विरोध में हिंदू संगठनों ने अपनी बात रखने की कोशिश की तो पुलिस को नागवार गुजरा. आष्टा थाने की पुलिस आई और हिंदुओं को ही पीटना शुरू कर दिया. समझ रहे हैं आप बांग्लादेश में पुलिस दीपू को कट्टरपंथियों के हवाले करती है. लेकिन मध्यप्रदेश में पुलिस खुद ही हिंदुओं पर लाठी लेकर टूट पड़ती है. जी न्यूज़ की टीम जब इसका कवरेज करती है तो राज्य से मान्यता प्राप्त पत्रकार और कैमरामैन को भी पीटा जाता है.
जी न्यूज के कैमरामैन से छीना कैमरा
इस कवरेज से मध्यप्रदेश पुलिस क्रोधित हो गई. जी न्यूज के कैमरामैन से कैमरा छीन लिया गया. संवाददाता प्रमोद शर्मा का फोन छीन लिया गया. अपराधी की तरफ पुलिस वैन में बिठाकर प्रमोद शर्मा और कैमरामैन रजत दुबे को थाने आष्टा थाने लाया गया. वैन से उतरने नहीं दिया गया. पुलिस वाले पत्रकारों को धमकाते रहे. जब खबर टीवी पर आई तो कैमरा वापस किया गया लेकिन सारी फुटेज डिलीट कर दी गई थी. आज आपको जी न्यूज को कैमरा वापिस करने वाला वीडियो भी ध्यान से देखना चाहिए.
पत्रकार ने सुनाई एमपी पुलिस के जुल्मों की दास्तां
आपने इस वीडियो को ध्यान से देखा होगा किस तरह कैमरा वापिस करते हुए भी बिना वर्दी वाला ये पुलिसकर्मी पहले हमारे कैमरामैन का फोन छीनने की कोशिश करता है. लेकिन संवाददाता प्रमोद शर्मा वीडियो बना रहे थे. इसलिए कैमरा वापिस कर देता है लेकिन सारी फुटेज को खराब करके अपने खिलाफ सबूतों को मिटाकर. मध्यप्रदेश के आष्टा थाने की पुलिस इतनी ज्यादा काबिल है कि घटना स्थल पर मौजूद सीसीटीवी के डीवीआर तक जब्त कर लिए गए. ताकि पत्रकारों और हिंदू संगठनों पर हमले का कोई सबूत न बचे. जिन लोगों ने मौके पर वीडियो बनाए थे. पुलिस ने उनके फोन भी छीन लिए. सोचिए जब हिंदू संगठनों पर एक्शन करना था. जब पत्रकारों को पीटना था. तब मध्यप्रदेश पुलिस कितनी ज्यादा सतर्क थी. अगर ऐसी सतर्कता कट्टरपंथियों पर एक्शन के दौरान भी बरती जाती तो शायद रामभक्तों को मध्यप्रदेश में पत्थर नहीं खाने पड़ते. आज आपको खुद प्रमोद शर्मा के मुंह से सुनना चाहिए कि उनके साथ क्या क्या हुआ?
प्रमोद बांग्लादेश और ऑपरेशन सिंदूर पर भी कवरेज कर चुके हैं
प्रमोद की रिपोर्टिंग आपने इससे पहले कई बार जी न्यूज पर देखी होगी. प्रमोद ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बॉर्डर पर थे. जान की परवाह किए बगैर पाकिस्तान की गोलीबारी की लाइव तस्वीरें आपको दिखा रहे थे. प्रमोद शर्मा हिंदुओं पर हिंसा के बाद बांग्लादेश में इसकी कवरेज करने गए…कट्टरपंथियों की हिंसा की तस्वीरें दिखाईं..बांग्लादेश के हिंदुओं की आवाज़ आपको सुनाई…लेकिन बांग्लादेश में वहां की पुलिस और कट्टरपंथियों ने भी उनके साथ वो सुलूक नहीं किया..जो आज उनके गृह राज्य मध्यप्रदेश की पुलिस ने उनके साथ कर दिया. जिस राज्य के मुख्यमंत्री का प्रमोद शर्मा इंटरव्यू लेते हैं…उसी राज्य की पुलिस प्रमोद शर्मा को लाठियों से पीटती है. आप भी आज ये देखकर हैरान होंगे क्योंकि इसकी वजह सिर्फ इतनी है जो काम करने प्रमोद बांग्लादेश में गए थे. यानी हिंदुओं की आवाज दुनिया को सुनाने की कोशिश कर रहे थे. वही काम करना मध्यप्रदेश में उनके लिए गुनाह बन गया. अगर राज्य के बड़े पत्रकार इस तरह पिट रहे हैं तो आम लोगों का ये पुलिस क्या करती होगी आप समझ लीजिए. आज हम आपको एक पत्रकार को पीटने वाले पुलिस अफसरों के इससे पहले के अचीवमेंट भी आपको दिखाएंगे. लेकिन पहले आप मध्यप्रदेश पुलिस का रिपोर्ट कार्ड देख लीजिए.
दिसंबर 2023 से दिसंबर 2024 के बीच राज्य में प्रतिदिन औसतन 4–5 हत्याएं, 18–20 बलात्कार के मामले दर्ज हुए। यह दर्शाता है कि राज्य में संगीन अपराध सामान्य होते जा रहे हैं.
महिलाओं के खिलाफ अपराध में बढ़ोतरी हुई है…2024 में 7,000 से अधिक बलात्कार दर्ज हुए और पिछले पाँच वर्षों में बलात्कार के मामलों में लगभग 19% की वृद्धि हुई है। सबसे गंभीर बात यह है कि लगभग 77% मामलों में आरोपी बरी हो जाते हैं, यानी सजा की दर बेहद कम है.
बच्चों के खिलाफ अपराध में मध्यप्रदेश काफी ऊपर है…मध्यप्रदेश लगातार पांच वर्ष तक देश में बच्चों पर अपराधों में नंबर-1 रहा.
2023 में 22,393 बाल अपराध दर्ज हुए, जो राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुनी दर है. POCSO मामलों में भी अधिकांश केस वर्षों तक लंबित रहते हैं.
मध्यप्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में SC/ST समुदाय के खिलाफ अपराध की दर 63.6 प्रति लाख रही.
जबकि राष्ट्रीय औसत लगभग 25 है. यानी मध्यप्रदेश में ढाई गुना से अधिक अपराध इस वर्क के खिलाफ हो रहे हैं.
2020–2024 के बीच मध्यप्रदेश में लव जिहाद के 283 मामले दर्ज हुए
लेकिन जिन 86 मामलों का निपटारा हुआ उनमें केवल 7 में सजा मिली. यानी लगभग 95% मामलों में कानूनी असफलता मिली इससे पुलिस जांच और अभियोजन की कमजोरी उजागर होती है.
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार जांच में लापरवाही, वीडियो रिकॉर्डिंग न होना, केस डायरी में गड़बड़ी और कानूनी प्रक्रियाओं के उल्लंघन पर मध्यप्रदेश पुलिस को फटकार लगाई है. यह संस्थागत कमजोरी को दर्शाता है.
70 हजार की सैलरी में कहां से मिल जाती है 20 लाख की SUV
अब हम आपको मध्यप्रदेश पुलिस के उन पुलिस वालों की प्रोफाइल बताते हैं जो कट्टरपंथियों को रोकने में नाकाम रहते हैं. लेकिन पत्रकारों को पीटते हैं. ये गिरीश दुबे हैं. थाना आष्टा के प्रभारी हैं. इन्होंने ही जी मीडिया के पत्रकारों पर लाठियां भांजी हैं. इनका वेतन लगभग 70 हजार रुपये मासिक है. लेकिन वो 50 लाख की आलीशान कार से थाने में अपना रूतबा दिखाते हुए पहुंचते हैं. सोचिए, 70 हजार महीने की सैलरी वाले इंस्पेक्टर फॉर्च्यूनर से ही चलते हैं. आखिर ये चमत्कार कैसे हुआ?
पुलिस फोर्स में हवलदार के रूप में इनकी डायरेक्ट भर्ती हुई. ये भर्ती डायरेक्ट डीजीपी ने की थी. बताया जाता है इनके भाई मध्यप्रदेश की जानी मानी आईपीएस अधिकारी अनुराधा शंकर के स्टेनो रहे हैं.
2008 के आसपास कुछ बांग्लादेशी पकड़े थे…इस एचीवमेंट में इनका नाम भी लिखा गया. हालांकि इनका नाम कैसे इस लिस्ट में आया…इस पर भी सवाल उठते रहते हैं. फिलहाल इस वजह से उनको आउट ऑफ टर्म प्रमोशन मिल गया. इसके बाद ये जहां जहां गए मध्यप्रदेश पुलिस का नाम रोशन करते रहे.
सीहोर के नसरुल्लागंज थाने में नेताओं से विवाद की वजह से इनको लाइन अटैच कर दिया गया.
इसके बाद इनको मंडी थाने का प्रभारी बनाया गया…जहां पर इन्होंने जाट समाज के लोगों से बदतमीजी की..जाट समाज पर अभद्र टिप्पणी के बाद इन्हें फिर लाइन अटैच कर दिया गया
इतने विवादों के बावजूद फिर से इनको कोतवाली थाना प्रभारी बनाया गया. जहां एक पुलिस वाले का पैसे के लेन देन का ऑडियो वायरल हुआ था…इस ऑडियो में इनका जिक्र भी था, इन्हें फिर से लाइन अटैच कर दिया गया.
लेकिन इन पर कृपा बरसती रही…अब इनको आष्टा थाना मिला है तो कट्टरपंथी यहां पर उत्पात कर रहे हैं और इंस्पेक्टर गिरीश दुबे पत्रकारों को पीट रहे हैं और मध्यप्रदेश पुलिस का नाम रोशन करने में कोई कमी नहीं छोड़ रहे. अपराधी इनके काबू में नहीं हैं…और राज्य सरकार से मान्यता पात्र..विदेशों में रिपोर्टिंग कर चुके और राष्ट्रवादी पत्रकारों का चेहरा इनको पसंद नहीं है.
सोचिए मध्यप्रदेश में इतने विवादित इंस्पेक्टर को बार बार थाना मिलता है और उसको पुरस्कृत किया जाता है और इस पुलिस वाले की शान ओ शौकत तो ऐसी है. जैसी मध्यप्रदेश के डीजीपी की भी नहीं है. क्योंकि वो जिस इनोवा कार से चलते हैं उसकी कीमत लगभग 20 लाख है. शायद इसी काबिलियत को देखते हुए. मध्यप्रदेश में इतने विवादित इंस्पेक्टर को बार बार थाना दिया गया होगा.
गिरीश दुबे की सैलरी 70 हजार, इस्तेमाल करते हैं 50 लाख की SUV
जी मीडिया संवाददाता प्रमोद शर्मा को पीटने के बाद गिरीश दुबे जिस थाने में लेकर गए वहां पर एक टोयोटा फॉर्च्यूनर गाड़ी खड़ी थी..जिस पर बड़े बड़े शब्दों पर पुलिस लिखा हुआ था. फॉर्च्यूनर गाड़ी के टॉप मॉडल की कीमत लगभग 50 लाख रुपये होती है जब जी न्यूज ने पता किया तो मालूम चला इस गाड़ी का इस्तेमाल थाना प्रभारी गिरीश दुबे करते हैं. सोचिए मध्यप्रदेश पुलिस के टीआई की सैलरी 70 हजार रुपये के आस पास होती है और वो 50 लाख की कार से सफर कर रहे हैं. इसमें पेट्रोल भरवाते हैं..गाड़ी को मेंटेन करते हैं…ऐसा मध्यप्रदेश पुलिस के इंस्पेक्टर कैसे कर पाते हैं. इसकी जानकारी मुख्यमंत्री मोहन यादव को भी होनी चाहिए. इससे वो प्रदेश का बजट और अच्छे ढंग से बना सकते हैं. इस इंस्पेक्टर की संपत्तियों और कारनामों के बारे में जी मीडिया को कई और सूचनाएं मिली हैं. जिनकी जानकारी हम आपको बहुत जल्द देंगे लेकिन पहले आप थाने में खड़ी पुलिस वालों की आलीशान गाड़ियों के बीच इस टोयोटा फॉर्च्यूनर पर हमारी ग्राउंड रिपोर्ट देखिए.
मीडिया की नजर में आ गई तो कैसे फॉर्च्यूनर गाड़ी को गायब करवा दिया गया लेकिन आज आपको इस कार को खरीदने ओर मेंटेन करने के खर्च के बारे में कुछ और बातें भी जाननी चाहिए.
अगर 70 हजार की सैलरी पाने वाला अपनी सैलरी खर्च ना करें तो भी उसे फॉर्च्यूनर खरीदने में 7 साल लगेंगे
70 हजार सैलरी वाले को बैंक इतनी महंगी कार के लिए लोन नहीं देगा
और Fortuner कार चलाने का महीने का खर्च 25–30 हजार रुपये महीना है
गिरीश दुबे का पुराना वीडियो भी आया सामने
ये कमाल मध्यप्रदेश पुलिस कैसे कर रही है. मुख्यमंत्री मोहन यादव को भी पता करना चाहिए. वैसे गिरीश दुबे का एक पुराना वीडियो भी सामने आया है. आज आपको उसे भी ध्यान से देखना चाहिए. गिरीश दुबे के यहां पर आयोजन करवाने वाले चांद हाफिज की टीम से काफी अच्छे संबंध लग रहे हैं…क्या इसका पत्थरबाजी करने वालों से भी कोई संबंध है..जांच तो इसकी भी होनी चाहिए. 70 हजार की सैलरी में फॉच्यूनर कैसे चल रही है. जांच इसकी भी होनी चाहिए. इस्पेक्टर हरीश दुबे को कट्टरपंथियों का सजा दिलाने की मांग इतनी बुरी क्यों लगीजांच इसकी भी होनी चाहिए.
रिश्वत लेने के मामले में लाइन हाजिर भी हो चुके हैं
पत्रकार को लाठी मारने वाले दूसरे पुलिस वाले का नाम हरी शंकर परमार है…इनका आफिस में पैसा लेते एक वीडियो वायरल हुआ था. जिसके बाद इनको भी लाइन हाजिर किया गया था. हालांकि मध्यप्रदेश के एक सम्मानित पत्रकार पर इस तरह लाठियां बरसाने के बाद मध्यप्रदेश की मोहन सरकार और बीजेपी ने संज्ञान लिया है. इसकी जानकारी मुख्यमंत्री ने संबंधित अधिकारियों से मांगी है. लेकिन अभी भी एक विवादित और पत्रकारों पर लाठी बरसाने वाला पुलिसकर्मी एक थाने का प्रभारी बनकर बैठा है । ऐसे में सही जांच कैसे होगी और क्या ऐसे पुलिस वालों के भरोसे क्षेत्र की सुरक्षा छोड़ी जा सकती है. ये सवाल अभी बना हुआ है.
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