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DNA: हमने आपको शुरू में ही बताया कट्टरपंथियों के हिंसा मॉडल का एक पैटर्न है. अफवाह और अराजकता… इस मॉडल के दो घातक हथियार हैं. इसी के जरिए हिंसा की साजिश की जाती है. कट्टरपंथी हिंसा मॉडल के पैटर्न के कई चरण होते हैं. कट्टरपंथी हिंसा के तीन फेज बहुत तेजी से चलते हैं. चौथा चरण पत्थरबाजों पर पुलिस के एक्शन के बाद शुरू होता है. तमाम कथित बुद्धिजीवी, मानवतावादी, लोकतांत्रिक हितों के पैरवी करनेवाले कैमरे के सामने अवतरित होते हैं और उपद्रवियों को मासूम, निर्दोष, भटका हुआ, अफवाह के शिकार बताने लगते हैं. तुर्कमान गेट पर हुए पथराव के बाद भी तयशुदा पैर्टन के मुताबिक पत्थरबाजों को मासूम बतानेवाली टोली कैमरे के सामने अवतरित हो गई.

कट्टरपंथियों की बुद्धिजीवी ब्रिगेड उन पत्थरबाजों को मासूम बता रही है जिन्होंने 6 पुलिसवालों को लहूलुहान कर दिया. अगर पुलिस चौकस नहीं होती तो जान भी जा सकती थी. समझिए कभी जम्मू-कश्मीर में हिंसक पत्थरबाजों और यहां तक कि आतंकियों को भी ऐसे ही भटका हुआ, बरगलाया गया बताया जाता था. वो निर्दोष नागरिकों की हत्या करते थे. खून बहाते थे. और एक पूरा इकोसिस्टम उन्हें भटका हुआ बताता था. वही इकोसिस्टम आज पत्थरबाजों को भी मासूम, निर्दोष और पीड़ित बता रहा है. आज कट्टरपंथियों, उन्मादियों और पत्थरबाजों के पक्ष में शाब्दिक प्रपंच रचनेवालों को देखना चाहिए की जिन्हे ये निर्दोष बता रहे हैं उन्होंने ऐसा माहौल बना दिया है कि दिल्ली में सुरक्षा बल फ्लैग मार्च कर रहे हैं.

  • पहले फेज में अफवाह फैलाई जाती है

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  • दूसरे फेज में अफवाह से भीड़ जुटाई जाती है

  • तीसरे फेज में पथराव होता है

  • चौथे फेज में पथराव करनेवालों को मासूम बताया जाता है

ये पहली बार तुर्कमान गेट पर बुल्डोजर नहीं चला है
यहां हम इतिहास का एक पन्ना भी आपसे शेयर करना जरूरी समझते हैं. तुर्कमान गेट पर पहली बार बुलडोजर नहीं चला है. ये दूसरा बुलडोजर एक्शन है. पहला बुलडोजर एक्शन वर्ष 1976 में हुआ था…तब संजय गांधी के आदेश पर यहां बुलडोजर चला था. रिपोर्ट्स के मुताबिक फरवरी 1976 में संजय गांधी पुरानी दिल्ली घूमने गए थे. उन्होंने देखा कि तुर्कमान गेट के आसपास इतनी झुग्गियां और पुरानी इमारतें थीं कि जामा मस्जिद ठीक से दिखाई नहीं दे रही थी. उसी वक्त संजय गांधी ने अवैध अतिक्रमण हटाने का फैसला किया. अवैध अतिक्रमण हटाने के लिए अप्रैल 1976 को पहला बुलडोजर तुर्कमान गेट पहुंचा. उस समय 16 बुलडोजर दिन-रात काम कर रहे थे. तुर्कमान गेट से जामा मस्जिद के बीच आने वाली हर चीज मिटा दी गई. हजारों लोगों को दूसरी जगह शिफ्ट किया गया

तुर्कमान गेट से हटा अतिक्रमण
इस बार तुर्कमान गेट के पास किसी का घर नहीं गिराया गया. सिर्फ अवैध अतिक्रमण कर बनाए गए डायग्नोस्टिक सेंटर, बैंक्वेट हॉल और दुकानों को तोड़ा गया है. लेकिन फिर भी हंगामा हो रहा है. पथराव करनेवालों का बचाव किया जा रहा है. इतिहास का एक और पन्ना आपसे शेयर करते हैं. ये पन्ना तुर्कमान गेट के नाम से जुड़ा है. नाम सुनकर ही आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ये नामकरण प्राचीन नहीं है. हम थोड़ा विस्तार से बताते हैं. इस जगह का नाम हजरत शाह तुर्कमान बयाबानी के नाम पर रखा गया है. ये 12वी से 13वीं शताब्दी के सूफी संत थे. वे सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक की सेना के साथ दिल्ली आए थे. दिल्ली में इस्लाम के शुरुआती प्रसार में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है.

किसने बनवाया था तुर्कमान गेट?
इसलिए शाहजहां ने शहर की सुरक्षा के लिए जब दीवार बनाई तो उनके नाम पर इस क्षेत्र का नाम तुर्कमान गेट रखा. यानी इस जगह का इतिहास ही इस्लामिक कट्टरवाद से जुड़ा है. भारत में जो अक्रांता आए उनके कट्टरपंथ के भी दो मॉडल थे. एक सैनिक वाला मॉडल जिसमें तलवार के दम पर इस्लाम का प्रसार किया जाता था और दूसरा- जो तलवार से नहीं डरते थे उन्हें सूफी और मौलाना शाब्दिक पथराव से डराते थे और इस्लाम कबूल करवाते थे.

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