
नई दिल्ली: कहने को तो हम अपने देश की हमेशा तारीफ करते हैं लेकिन आज हम आपको अपने देश की एक ऐसी कड़वी सच्चाई के बारे में बताना चाहते हैं, जो हमें किसी भी युद्ध में जीतने नहीं देती. वो सच्चाई ये है कि हमारे देश के कुछ लोग ना तो अनुशासन में रहना चाहते हैं, ना नियमों का पालन करना चाहते हैं और ना ही किसी भी युद्ध में अपना कर्तव्य निभाना चाहते हैं.
UP और पंजाब की हैरान करने वाली तस्वीरें
पिछले एक साल से देश की सरकार, डॉक्टर्स और वैज्ञानिक यही समझा रहे हैं कि कोरोना वायरस (Coronavirus) पर रोकथाम के लिए सबसे पहली वैक्सीन है मास्क, दूसरी वैक्सीन है सोशल डिस्टेंसिंग और तीसरी वैक्सीन वो है जो आप अस्पतालों में लगवा रहे हैं. लेकिन लोग इस बात को कितना समझ पाए हैं, ये आप यूपी और पंजाब से सामने आई तस्वीरों को देखकर बेहतर समझ सकते हैं.
नियमों को क्यों नहीं मान रहे लोग?
पंजाब के संगरूर में एक बैंक के बाहर सोशल डिस्टेंसिंग के लिए बनाए गए निशानों पर जूते चप्पलें रखी नजर आईं और लोग सड़क किनारे चबूतरों पर एक साथ बैठे दिखे. ये लोग बैंक में अलग-अलग काम को लेकर वहां पहुंचे थे. यानी सोशल डिस्टेंसिंग (Social Distancing) का पालन तो इन लोगों को करना था लेकिन पालन कर रहे थे इनके जूते और चप्पल. सोचिए हमारे देश में लोगों को उनके फायदे की बात समझाना भी कितना मुश्किल होता है. आप भले ही ऐसी लापरवाही पर हैरानी जताएं लेकिन ये कई गम्भीर प्रश्न उठाती है.
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UP में दवाई पर दारू विजयी?
कड़वी सच्चाई ये है कि हमारे देश के ये लोग किसी भी युद्ध में अपना कर्तव्य नहीं निभाना चाहते हैं. इसे आप उत्तर प्रदेश के हालात से भी समझ सकते हैं. आज उत्तर प्रदेश के कुछ ज़िलों में सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक 3 घंटे के लिए शराब के ठेके खोल दिए गए और जैसे ही ये खबर लोगों तक पहुंची तो इन ठेकों के बाहर इतनी लम्बी लम्बी लाइनें लग गईं. जितनी लम्बी लाइनें आपने वैक्सीन के लिए भी नहीं देखी होंगी. यानी दवाई पर दारू आज एक बार फिर विजयी हुई और इन लोगों ने लक्ष्मण रेखा को तोड़ दिया.
विदेशी मीडिया क्यों नहीं दिखाता ये तस्वीरें?
आपने देखा होगा कि आज कल पश्चिमी देशों का मीडिया हमारे देश में कोरोना मरीजों की जलती चिताएं दुनिया को दिखा रहा है. अस्पतालों में ICU वॉर्ड्स से रिपोर्टिंग कर रहा है. आज हम पश्चिमी मीडिया से कहना चाहते हैं कि वो इन लोगों को क्यों नहीं दिखाता. वो हमारे देश के इन लोगों के बारे में दुनिया को बताए जो अपनी जिम्मेदारियों का अंतिम संस्कार कब का कर चुके हैं.
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क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं?
आज अगर देश के इन लोगों को अपनी गलती से कोरोना का संक्रमण हो भी जाए तो ये अपने अलावा हर किसी को दोष देंगे लेकिन खुद को इसके लिए कभी जिम्मेदार नहीं मानेंगे. ये लोग पहले नियमों का पालन नहीं करते और फिर जब वायरस से संक्रमित हो जाते हैं और इन्हें अस्पतालों में इलाज नहीं मिलता तो ये सरकार को भला बुरा कहते हैं. व्यवस्था में कमियां ढूंढते हैं. हम मानते हैं कि सरकार में कमियां हैं, व्यवस्था में कमियां हैं लेकिन क्या इन लोगों की अपने प्रति और देश के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है. क्या इस मानसिकता से हमारा देश कोरोना वायरस के खिलाफ युद्ध जीत सकता है?
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